जनसंख्या परिवर्तन का टाइम बम, आजादी से अब तक का सच

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संजय सक्सेना

देश के कुछ हिस्सों में जनसंख्या का जो बदलाव पिछले सात दशकों में हुआ है, वह महज आंकड़ों की हेरफेर नहीं है। यह एक सुनियोजित परिवर्तन की कहानी है, जिस पर देश के बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन और नीति-निर्माता चिंता जता रहे हैं। गत दिवस तमिलनाडु के राज्यपाल रहे आरएन रवि ने गांधीनगर स्थित राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में असम, पश्चिम बंगाल और पूर्वांचल के कुछ हिस्सों में हो रहे जनसंख्या परिवर्तन को एक टाइम बम की संज्ञा देते हुए चेतावनी दी कि यदि इन प्रवृत्तियों को नजरअंदाज किया गया, तो ये भविष्य में राष्ट्रीय एकता के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। उनका सवाल था, क्या किसी ने बीते 30-40 वर्षों में इन इलाकों में हुई जनसंख्या की प्रवृत्तियों पर ध्यान दिया है और क्या आने वाले 50 वर्षों में यह परिवर्तन देश के लिए विभाजनकारी साबित नहीं होगा? आजादी के समय असम एक ऐसा राज्य था, जहां अलग-अलग समुदाय और जनजातियाँ सदियों से साथ रहती थीं। लेकिन 1951 की पहली जनगणना में असम में मुस्लिम आबादी 22.6 प्रतिशत थी। 1971 में यह बढ़कर 24.6 प्रतिशत, 1991 में 28.4 प्रतिशत, 2001 में 31 प्रतिशत और 2011 की जनगणना में 34.2 प्रतिशत हो गई। यानी साठ वर्षों में असम में एक खास समुदाय की आबादी में लगभग 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगली जनगणना में यह आंकड़ा 40 प्रतिशत का आंकड़ा भी पार कर सकता है। इस वृद्धि की असली वजह केवल स्वाभाविक जन्मदर नहीं है। 1961 से 2011 के बीच, यानी पाँच दशकों में देश में मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर 194.38 प्रतिशत रही, जबकि असम में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर 286.16 प्रतिशत रही, जो राष्ट्रीय औसत से लगभग डेढ़ गुना अधिक है। इस अंतर की व्याख्या केवल प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि से नहीं की जा सकती।

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असम के मुख्यमंत्री हिमंता विश्व शर्मा ने स्पष्ट रूप से कहा है कि असम की कुल मुस्लिम जनसंख्या में से मात्र 3 प्रतिशत ही मूल असमिया आबादी है, शेष बांग्लादेश से आए लोग हो सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि बांग्लादेश से लगी सीमा पर बसे जिलों में यह समस्या और भी गंभीर है। 2001 की जनगणना में असम में छह मुस्लिम बहुल जिले थे, जो 2011 तक बढ़कर 11 हो गए। उधर, पश्चिम बंगाल की स्थिति असम से कम चिंताजनक नहीं है। बांग्लादेश के साथ इस राज्य की लंबी सीमा है और 1971 से लगातार सीमावर्ती जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठ होती रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की हिस्सेदारी 2001 में 25.2 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 26.94 प्रतिशत हो गई और इस दौरान मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर 21.81 प्रतिशत रही।

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जिलेवार आंकड़े और भी चौंकाने वाले हैं। मुर्शिदाबाद में मुस्लिम आबादी 69.5 प्रतिशत, मालदा में 53.3 प्रतिशत, उत्तरी और दक्षिणी दिनाजपुर में 42.8 प्रतिशत, बीरभूम में 39.6 प्रतिशत और उत्तरी व दक्षिणी 24 परगना में 36.1 प्रतिशत हो चुकी है। इन सीमावर्ती आठ जिलों में हिन्दू जनसंख्या में प्रत्येक दशक में 3 प्रतिशत तक की कमी भी दर्ज की गई है। राजनीतिक आरोपों की बात करें तो 1977 से 2011 तक 34 साल सत्ता में रही वाममोर्चा सरकार पर आरोप है कि उसने घुसपैठियों को मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड और आधार कार्ड उपलब्ध कराए। इसकी एवज में 2006 तक वाममोर्चे को एकमुश्त वोट मिलता रहा, लेकिन 2007 के नंदीग्राम हिंसा के बाद यह वोट तृणमूल कांग्रेस की ओर चला गया। यह आरोप लगाने वाले केवल विरोधी दल के लोग नहीं हैं। कोलकाता में रहने वाले पूर्व नौकरशाह और तृणमूल कांग्रेस के सह-संस्थापक सदस्य दीपक कुमार घोष का कहना है कि वाममोर्चा ने अपने वोट बैंक के लिए मुस्लिम शरणार्थियों को शरण दी, जबकि तृणमूल ने इन अवैध घुसपैठियों को सत्ता तक में स्थान दिया। उत्तर प्रदेश और बिहार के पूर्वी हिस्से, यानी पूर्वांचल में जनसंख्या परिवर्तन की बात कुछ अलग किस्म की है। यहाँ प्रश्न केवल बाहर से आने वाली जनसंख्या का नहीं, बल्कि समुदाय-विशेष की प्रजनन दर का भी है। उत्तर भारत और पूर्वी भारत के राज्यों जैसे बिहार और उत्तर प्रदेश में कुल प्रजनन क्षमता दर चार से ज्यादा है, जबकि दक्षिण भारत में यह 2.1 के आसपास है, जो कि स्थिर स्तर माना जाता है। यह असंतुलन न केवल संसाधनों पर दबाव डालता है, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक समीकरण भी बदल रहा है।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठन लंबे समय से इस मुद्दे पर चेताते आए हैं। विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल सहित अनेक सामाजिक संगठनों ने सीमावर्ती इलाकों में जनसंख्या परिवर्तन को लेकर बार-बार राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है। असमिया साहित्य सभा जैसे सांस्कृतिक संगठनों ने असम की अस्मिता और संस्कृति पर मंडराते खतरे को लेकर आवाज उठाई है। इतिहासकार और लेखक नृपेन्द्र मिश्र जैसे विद्वानों ने सीमावर्ती इलाकों की जनसांख्यिकी पर गहन अध्ययन प्रस्तुत किए हैं। पाञ्चजन्य पत्रिका सहित अनेक प्रकाशनों ने इस जनसांख्यिकी परिवर्तन को न केवल आंकड़ों में, बल्कि असम के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने पर पड़ रहे असर के रूप में भी दर्ज किया है। वहीं दूसरी ओर, अनेक उदारवादी बुद्धिजीवी और अल्पसंख्यक संगठन इस पूरे विमर्श को सांप्रदायिक रंग देने का आरोप लगाते हैं। उनका तर्क है कि जनसंख्या परिवर्तन को एक समुदाय की साजिश बताना मुस्लिम नागरिकों के खिलाफ नफरत फैलाना है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे संगठन मानते हैं कि यह मुद्दा वोट की राजनीति के लिए हवा दिया जाता है। देश के विभाजन के समय जो सीमाएं खींची गई थीं, वे भौगोलिक रेखाएं थीं, लोगों के दिलों में नहीं। बंगाल का विभाजन हुआ, असम का एक हिस्सा पाकिस्तान से सटा रह गया। यह समस्या 1979 में ही सामने आ गई थी और इसे नेहरू काल की गलत नीतियों का नतीजा बताया जाता है। उस दौर में बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से आने वाले शरणार्थियों को पुनर्वास दिया गया, लेकिन 1971 के बाद भी यह सिलसिला थमा नहीं। बल्कि एक खास वर्ग के लिए वोट बैंक की राजनीति ने इसे और गति दी। बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर 252.95 प्रतिशत रही, वहीं ओडिशा में 323.40 प्रतिशत और झारखंड में 340.35 प्रतिशत रही, जो राष्ट्रीय औसत से कई गुना अधिक है। ये आंकड़े केवल प्रजनन दर से नहीं समझाए जा सकते। विशेषज्ञ मानते हैं कि बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ इसका बड़ा कारण है।

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बहरहाल, यह केवल राजनीतिक विमर्श नहीं है, यह उन लाखों लोगों की जिंदगी से जुड़ा सवाल है, जो असम की जमीन पर पीढ़ियों से रहते आए हैं, जो बंगाल में अपनी संस्कृति और भाषा के साथ जीते हैं। जब किसी जिले में एक समुदाय का अनुपात तेजी से बढ़ता है, तो सत्ता का संतुलन, जमीन का वितरण, शिक्षा और रोजगार सब कुछ प्रभावित होता है। इतिहास गवाह है कि जनसांख्यिकी परिवर्तन ने दुनिया में कई बार सीमाओं को फिर से खींचा है। कुल मिलाकर राज्यपाल रवि का वह सवाल आज भी हवा में गूंज रहा है कि क्या हम अंदाजा लगा सकते हैं कि अगले 50 वर्षों में यह परिवर्तन देश के लिए क्या परिणाम ला सकता है? यह सवाल जितना असुविधाजनक है, उतना ही जरूरी भी। इसका जवाब खोजे बिना न तो इन इलाकों का भला होगा और न ही देश का।

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