PDA के सहारे नेताजी से कैसे आगे निकल सकते हैं अखिलेश

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अजय कुमार

उत्तर प्रदेश की सियासत में मुलायम सिंह यादव का नाम हमेशा सियासत के एक बड़े खिलाड़ी के रूप में याद किया जाता है, जो एक शिक्षक के साथ अच्छे पहलवान भी थे। कुश्ती के अखाड़े से निकलकर राजनीति के मैदान में उतरे मुलायम विरोधियों को धूल चटाने का हुनर रखते थे। इटावा जिले के छोटे से गांव सैफई से निकलकर मुलायम ने यूपी और दिल्ली की राजनीति तक में अपना दबदबा बनाए रखा था, लेकिन उनकी सियासत को संभालने वाले उनके पुत्र अखिलेश यादव नेताजी की सियासत के करीब भी भटकते हुए नजर नहीं आते हैं। सियासत में 15 साल का लंबा सफर तय करने के बाद भी अपने दमखम पर समाजवादी पार्टी को कोई बड़ी विजय का स्वाद नहीं चखा पाए हैं। अखिलेश के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी दो विधानसभा और तीन लोकसभा के चुनाव लड़ चुकी है, लेकिन कुछ हद तक 2024 के लोकसभा चुनाव के अलावा किसी भी चुनाव में अखिलेश की हनक-धमक नहीं सुनाई दी, जबकि सपा को मजबूत करने के लिए अखिलेश ने कांग्रेस और मायावती तक से समझौता करने में परहेज नहीं किया, जिनका मुलायम सिंह से छत्तीस का आंकड़ा रहता था।

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समाजवादी पार्टी के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने पिछड़ों-यादव और मुस्लिम वोटरों का एक ऐसा गठजोड़ तैयार कर रखा था, जिसको तोड़ना किसी भी विरोधी के लिए संभव नहीं रहा। 1992 में मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी की नींव रखी, तब से लेकर 2022 तक, जब उनका निधन हुआ, मुलायम ने तीन बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री पद संभाला। तीन बार सीएम बनने के बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद मुलायम ने अपनी जगह बेटे को सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया। मुलायम की राजनीति हमेशा जमीन से जुड़ी रही गांव-गांव घूमना, कार्यकर्ताओं की शिकायतें सुनना, और जरूरत पड़ने पर गठबंधन की चाल चलकर सत्ता तक पहुंचना। लेकिन उनके बाद बेटे अखिलेश यादव ने जब पार्टी की कमान थामी, तो सवाल उठा कि क्या वे पिता की उस छाया से बाहर निकलकर अपनी पहचान बना पाएंगे। 2024 के लोकसभा चुनाव ने इस सवाल का जवाब कुछ हद तक दे दिया, लेकिन गहराई में उतरकर देखें तो तस्वीर और भी जटिल है।

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नेताजी मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक पारी की शुरुआत जनता दल से हुई, लेकिन 1992 में अलग पार्टी बनाकर उन्होंने पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को अपना आधार बनाया। 1996 के लोकसभा चुनाव में सपा को 16 सीटें मिलीं, वोट शेयर करीब 20 प्रतिशत। फिर 1998 में 20 सीटें और 1999 में 26 सीटें। 2004 में मुलायम के नेतृत्व में पार्टी ने अपना रिकॉर्ड बनाया 35 सीटें, वोट शेयर 26.74 प्रतिशत। उस वक्त सपा अकेले लड़ी थी, गठबंधन का सहारा कम था। मुलायम की ताकत उनके व्यक्तिगत कद में थी। वे खुद रैलियों में उतरकर भीड़ को संबोधित करते, पहलवानी वाली भाषा में विरोधियों को ललकारते। उनकी सरकारों में यादव-मुस्लिम समीकरण मजबूत रहा, लेकिन कभी-कभी आंतरिक कलह भी सामने आई। 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा को 224 सीटें मिलीं और मुलायम ने बेटे अखिलेश को मुख्यमंत्री बना दिया। यह फैसला विरासत के हस्तांतरण का था, लेकिन उसी समय परिवार में दरारें भी दिखने लगीं।

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अखिलेश यादव 2012 में मुख्यमंत्री बने, तो उनकी छवि युवा, पढ़े-लिखे और विकास-उन्मुख नेता की बनी। लैपटॉप बांटने, सड़कें बनाने और बिजली व्यवस्था सुधारने जैसे कामों से वे “लैपटॉप सीएम” कहलाए। लेकिन 2017 में सपा को भारी झटका लगा, सिर्फ 47 सीटें बचीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में तो पार्टी पांच सीटों पर सिमट गई, वोट शेयर गिरकर 18 प्रतिशत के आसपास पहुंच गया। मुलायम के निधन के बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश अकेले मैदान में उतरे। पिता का नाम अब भी ब्रांड था, लेकिन अखिलेश को खुद को साबित करना था। उन्होंने PDA पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक का नारा दिया, बेरोजगारी, पेपर लीक और महंगाई जैसे मुद्दों पर हमला बोला। 2024 आया और अखिलेश ने वो कर दिखाया, जो पिता के समय में भी नहीं हुआ। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 37 सीटें जीत लीं। यह मुलायम के 2004 के 35 सीटों के रिकॉर्ड को तोड़ने वाला प्रदर्शन था। वोट शेयर बढ़कर 33.59 प्रतिशत हो गया पार्टी के 32 साल के इतिहास में सबसे ऊंचा आंकड़ा। 2019 की तुलना में वोट शेयर में करीब 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इंडिया गठबंधन में कांग्रेस को सिर्फ छह सीटें मिलीं, जबकि सपा ने 62 सीटों पर लड़कर बहुमत से ज्यादा प्रदर्शन किया। अखिलेश खुद कन्नौज से जीते, डिंपल यादव मैनपुरी से, और परिवार के अन्य सदस्यों ने भी जीत हासिल की। लेकिन इस बार यादव उम्मीदवारों की संख्या सिर्फ पांच रखी गई, जो मुलायम के समय में असंभव लगता था। अखिलेश ने मुस्लिम-यादव के पारंपरिक एमवाई समीकरण से आगे बढ़कर PDA को व्यापक आधार दिया। ब्राह्मण, क्षत्रिय और अन्य पिछड़ी जातियों का भी समर्थन मिला, जिससे सपा यूपी में बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती बन गई। अब 2027 में अखिलेश के PDA की परीक्षा होनी है।

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खैर, लाख टके का सवाल यही है कि अखिलेश की राजनीति नेताजी मुलायम सिंह की राजनीति से कितना भिन्न भी थी, तो कहा जा सकता है कि 2024 तक अखिलेश को मुलायम सिंह जैसी कामयाबी नहीं मिल रही थी। दरअसल, मुलायम अक्सर खुद को केंद्र में रखते थे। 2004 में सपा ने यूपीए का साथ दिया था, फिर भी सीटें 35 ही रहीं। मगर अखिलेश ने 2024 में गठबंधन का फायदा उठाया, अपनी रणनीति से सीटें बढ़ाईं। उन्होंने टिकट बंटवारे में यादवों को सीमित रखकर संदेश दिया कि पार्टी अब एक जाति विशेष तक नहीं सिमटी। सपा के 86 प्रतिशत सांसद पिछड़े, दलित और मुस्लिम वर्ग से आए, जो PDA फॉर्मूले की सफलता दिखाता है। मुलायम के समय में पार्टी की सरकार होने पर भी इतनी सीटें लोकसभा में नहीं मिली थीं। अखिलेश ने विरोध में रहते हुए रिकॉर्ड बनाया। उनकी रैलियां युवाओं से भरी रहती हैं, सोशल मीडिया का इस्तेमाल वे बेहतर तरीके से करते हैं। पिता की तरह वे भी सड़क पर उतरकर जनता से जुड़ते हैं, लेकिन भाषा ज्यादा संयमित और मुद्दों पर केंद्रित रखते हैं। फिर भी गहराई में चुनौतियां बाकी हैं। मुलायम का व्यक्तिगत कद इतना बड़ा था कि वे परिवार की कलह को भी अपने अनुभव से संभाल लेते थे। 2016-17 में जब अखिलेश और चाचा शिवपाल के बीच तनाव बढ़ा, मुलायम ने खुद बीच में आकर मामला सुलझाने की कोशिश की। अखिलेश को अब बिना पिता की उस छाया के काम करना पड़ रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव करीब हैं, जहां सपा को सत्ता हासिल करने का सपना है। यादव-मुस्लिम वोट बैंक में कभी-कभी बिखराव की खबरें आती हैं। अखिलेश ने 2024 में यादव उम्मीदवार कम रखे, जो बहुलतावादी छवि देता है, लेकिन कोर वोटर नाराज भी हो सकता है। मुलायम ने कभी पार्टी को एक परिवार की तरह चलाया, अखिलेश को अब संगठन को और मजबूत करना है।

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अखिलेश की राजनीति मुलायम से ज्यादा आधुनिक लगती है। वे विकास के एजेंडे को पुरानी समाजवादी विचारधारा के साथ जोड़ते हैं। 2012-17 में मुख्यमंत्री रहते उन्होंने युवाओं को आकर्षित किया, अब उसी को आगे बढ़ा रहे हैं। 2025-26 में भी अखिलेश 2027 के लिए तैयारी कर रहे हैं महिलाओं के लिए आर्थिक मदद, किसानों के लिए बेहतर मुआवजा, और सामाजिक न्याय के मुद्दे। मुलायम की ताकत मसल और जमीन से जुड़ाव में थी, अखिलेश की रणनीति में संगठन और समीकरण बनाने की कला है। 2024 के नतीजे बताते हैं कि उन्होंने पार्टी को पुनर्जीवित किया है। सपा अब देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। लेकिन सियासी सफर लंबा है। मुलायम ने सपा को जन्म दिया, अखिलेश को उसे नई ऊंचाई देनी है। दोनों के बीच अंतर साफ है। मुलायम की राजनीति में “धोबी पछाड़” जैसी चालें थीं, अखिलेश ने PDA दांव से विरोधियों को चौंकाया। पिता की विरासत में भावनात्मक जुड़ाव था, बेटे की में युवा ऊर्जा और आधुनिक रणनीति। फिर भी अखिलेश को मुलायम की तरह जनता के बीच गहरा विश्वास कमाना है। साइकिल का पहिया घूम रहा है, लेकिन इसे और तेज गति देना अखिलेश की चुनौती है। उत्तर प्रदेश की राजनीति अब देख रही है कि यह नया अध्याय कितना मजबूत और दूर तक जाएगा। मुलायम की छाया अब भी सैफई से लखनऊ तक महसूस होती है, लेकिन अखिलेश ने साबित कर दिया कि वे अपनी रोशनी भी बना सकते हैं।

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