दो टूक : कहां हैं संयुक्त राष्ट्र संगठन और सुरक्षा परिषद?

     राजेश श्रीवास्तव

इन दिनों दुनिया एक ऐसे सठियाये और सनकी नेता का सामना कर रही है, जिसकी सनक ने चहुओंर आतंक मचा रखा है। चाहे कोई भी देश हो भले ही सुंदरता और अच्छे वातावरण के लिए जाना जाने वाला दुबई हो या फिर सऊदी अरब। अमेरिका का राष्ट्रपति ट्रंप जिस तरह की सनक हर दिन दिखा रहा है अभी तक टैरिफ का आतंक मचाने वाला यह ट्रंप अब किसी भी देश के राष्ट्रपति को सोते समय पत्नी समेत उठा लेता है तो किसी पर देश पर हमला करके उसके सर्वोच्च नेता को परिवार समेत मार देता है तो किसी देश के उस स्कूल पर बमबारी कर देता है जिसमें 2०० बच्चियां पढ़ रही होती हैं। आज इसकी सनक के चलते ही दुनिया के सारे मुल्क परेशान हैं चाहे वह युद्ध में शामिल हों या नहीं, चाहे उनका दूर-दूर तक वास्ता हो या न हो। तो फिर सवाल यह उठता है कि आखिर इस ट्रंप पर कोई नकेल कसने वाला है या नहीं, वह भी तब जब खुद अमेरिकी जनता भी उससे अब त्राहिमाम करने लगी है। ऐसे में बस एक ही नाम याद आता है संयुक्त राष्ट्र संगठन और उसकी सुरक्षा परिषद ।

ऐसे संकट में उम्मीद की जाती है कि ये हस्तक्षेप और मध्यस्थता करे। युद्ध की आशंका को कम करे या फिर रोकने में प्रभावी भूमिका निभा युद्ध की त्रासदी और पीड़ा से मुक्ति दिलाए, लेकिन पिछले कुछ सालों में चाहें यूक्रेन-रूस का युद्ध हो या अब ईरान-अमेरिका की हालिया जंग, इनकी भूमिका पर सवाल उठ रहा है। ईरान-अमेरिका संघर्ष से तीसरे महायुद्ध की आशंका के बीच सुरक्षा परिषद मूकदर्शक बनी हुई है। 2०22 से चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष में सुरक्षा परिषद कोई ठोस कार्रवाई करने में असमर्थ रही है, क्योंकि रूस स्वयं इसका स्थाई सदस्य है। हालांकि, सुरक्षा परिषद का मूल उद्देश्य महायुद्धों को रोकना था, जिसे उसने शीत युद्ध के दौरान और बाद में कुछ हद तक पूरा किया, लेकिन वर्तमान भू-राजनीतिक तनाव ने इसकी क्षमता को बहुत सीमित कर दिया है। ईरान-अमेरिका युद्ध के बढ़ते दायरे के बीच संयुक्त राष्ट्र संगठन और उसकी सुरक्षा परिषद की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं। किसी भी वैश्विक संकट के समय उम्मीद की जाती है कि यह संगठन हस्तक्षेप और मध्यस्थता करे। युद्ध की आशंका को कम करे या फिर रोकने में प्रभावी भूमिका निभा युद्ध की त्रासदी और पीड़ा से मुक्ति दिलाए। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में रूस—यूक्रेन युद्ध, गाजा संघर्ष या ईरान-अमेरिका के ताजा टकराव मामले में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका प्रतीकात्मक ही नजर आती है।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 1919 में दुनिया के कुछ देशों ने लीग ऑफ नेशन की स्थापना की थी, लेकिन यह संगठन दूसरा विश्वयुद्ध रोकने में नाकाम रहा। दूसरे विश्वयुद्ध घाव काफी गहरे थे। इसमें पहली बार अणु बम का इस्तेमाल हुआ। नागासाकी और हिरोशिमा पर गिराए गए इन बमों से हुई असंख्य मौतों और विकिरण के दुष्परिणामों से समूची मानवता विचलित हो गई थी। इस महायुद्ध की अकथनीय पीड़ा ने सीख-सबक दिया कि विवादों-समस्याओं के निदान के लिए युद्ध नहीं शांति का रास्ता खोजना होगा। सवाल था यह कैसे मुमकिन हो? जरूरत महसूस की गई कि इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रभावशाली मंच हो। इसी मंशा से 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र संगठन की स्थापना की गई थी।

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संगठन स्थापना की पहल मित्र राष्ट्रों के प्रमुखों ने की थी। 1945 की सैन फ्रांसिस्को कॉन्फ्रेंस में 5० देशों ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर किए थे। इस चार्टर के मुख्य उद्देश्यों में अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, सदस्य देशों के मध्य सहयोग बढ़ाना, मानवाधिकारों की रक्षा और आर्थिक- सामाजिक विकास को बढ़ावा देना शामिल हैं। संस्था की सबसे महत्वपूर्ण इकाई सुरक्षा परिषद बनाई गई, जिसे युद्ध और शांति के प्रश्नों पर निर्णय लेने की शक्ति दी गई। सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्यों में 5 स्थायी सदस्य हैं बनाए गए, जिन्हें वीटो पावर दी गई। ऐसे पांच देश अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, फ्रांस और चीन को मिली शक्ति का यह परिणाम है कि किसी प्रस्ताव का इनमें एक भी विरोध कर दे तो वह प्रस्ताव पास नहीं हो सकता। दूसरे विश्वयुद्ध के विजेता देशों की संगठन में प्रभावी भूमिका के लिए सौंपी गई यह अतिरिक्त शक्ति आगे चलकर संगठन की कमजोरी का कारण बन गईं। जल्द ही संयुक्त राष्ट्र संघ वीटो प्राप्त महाशक्तियों की राजनीति का मंच बन गया। सोवियत संघ ने 1946-1991 के बीच लगभग 12० बार अपने समर्थक देशों के लिए इस अधिकार का उपयोग किया। अमेरिका ने भी अपने गुट के लिए यही रास्ता अपनाया। नतीजतन कई अंतरराष्ट्रीय संकटों के समय संयुक्त राष्ट्र किसी प्रभावी हस्तक्षेप की स्थिति में नहीं रहा।

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1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान सुरक्षा परिषद ने इराक के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को मंजूरी दी। हर्जेगोविना, कोसोवो, ईस्ट टाइमोर शांति अभियानों में भी उसकी भूमिका प्रभावी रही। लेकिन 1994 के रवांडा नरसंहार जिसमें लगभग 8 लाख लोग मारे गए, संयुक्त राष्ट्र कुछ नहीं कर सका। 1995 में बोस्निया के स्रेब्रेनिका नरसंहार में भी यही स्थिति रही जब संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना हजारों नागरिकों की हत्या रोकने में विफल रही। इन असफलताओं ने संगठन की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुंचाया। 2००3 में इराक पर अमेरिकी हमले ने संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता पर गहरे सवाल खड़े किए। सुरक्षा परिषद से इजाजत न होने पर भी अमेरिका ने इराक पर हमला किया। संदेश साफ था कि महाशक्तियां चाहें तो संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार कर सकती हैं। सीरिया और यूक्रेन संकट भी संयुक्त राष्ट्र संघ की लाचारी सामने आई। 2०11 में शुरू सीरिया के गृहयुद्ध के मुद्दे पर रूस और चीन द्बारा कई बार वीटो के प्रयोग के कारण सुरक्षा परिषद विभाजित रही। 2०22 से रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में भी सुरक्षा परिषद कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं कर सकी।

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खाड़ी देशों में विध्वंस की आग दूर तक धधक रही है। तीसरे महायुद्ध की आशंका से दुनिया डरी हुई है। संयुक्त राष्ट्र इसे रोकने का कोई प्रभावी मंच बन सकता है, इसकी संभावना नहीं दिखती। एक बार फिर सवाल हो रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्र आज भी वैश्विक शांति का प्रभावी मंच है? क्या संयुक्त राष्ट्र अप्रासंगिक हो गया है? शायद इसका उत्तर इतना आसान नहीं है। हाल के कई युद्धों के समय यह संगठन जितना कमजोर दिखा है, उसके कारण उसमें बड़े सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसके लिए सुरक्षा परिषद के विस्तार, वीटो शक्ति पर नियंत्रण और भारत जैसी नई वैश्विक शक्तियों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता प्रदान किया जाना जरूरी माना जा रहा। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने किसी मौके पर कहा था, संयुक्त राष्ट्र दुनिया का प्रतिबिब है। अगर दुनिया विभाजित है तो संगठन भी विभाजित होगा। इस वास्तविकता को समझना होगा कि दुनिया बहुध्रुवीय बन चुकी है. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र की संरचना में सुधार किए बिना इसके प्रभावी होने की गुंजाइश कम नजर आती है। सवाल फिर वही लाख टके का तो फिर इस सनकी ट्रंप को कौन रोकेगा।

 

 

 

 

 

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