
- पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान तनाव चरम पर: ‘खुली जंग’ के एलान के बाद हालात और गम्भीर
- युद्ध की स्थिति बनी तो दक्षिण एशिया में हो सकती है परेशानी, कई देशों पर पड़ेगा प्रभाव
पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच लम्बे समय से चल रहा तनाव अब खुले टकराव में बदलता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने अफ़ग़ान तालिबान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि हमारा धैर्य समाप्त हो चुका है और अब खुला युद्ध होगा। उनके इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य गतिविधियां तेज़ हो गई हैं। पाकिस्तानी सरकार का आरोप है कि अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार अपने यहां दुनिया भर से आतंकवादियों को इकट्ठा कर रही है और आतंकवाद का निर्यात कर रही है। हालांकि यह पहली बार है जब पाकिस्तान के आला-कमान ने दुनिया के सामने ऐसी बात रखी है। इससे पहले वो खुद भारत में आतंक की फैक्टरी भेजा करते थे। भारत में हुए अधिकांश हमलों की जिम्मेदारी खुले तौर पर पाकिस्तान के आतंकी संगठनों ने ली थी, उसके बाद भी उनके आला-कमान ने कोई जवाब नहीं दिया था। लेकिन अब पाकिस्तान खुद आतंक से बचने के लिए एक आतंकी संगठन के प्रतिबंध की मांग कर रहा है। भारत में साल 2001 का संसद हमला और वर्ष 2008 का मुंबई हमला जैसे मामलों में जिन संगठनों के नाम सामने आए, उनमें लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद शामिल रहे हैं। ये संगठन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित हैं। संयुक्त राष्ट्र की पाबंदियों और वैश्विक दबाव के बावजूद इन नेटवर्कों के खिलाफ पाकिस्तान की कार्रवाई अक्सर अधूरी या दिखावटी रही है।
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गौरतलब है कि पाकिस्तान लम्बे समय से अफ़ग़ान तालिबान से प्रतिबंधित संगठन तहरीक़-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई की मांग करता रहा है। हाल के महीनों में पाकिस्तान में हुए आत्मघाती हमलों के बाद यह मांग और तेज़ हो गई है। सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने दावा किया है कि पाकिस्तानी सेना ने काबुल, पक्तिका और कंधार में तालिबान के रक्षा ठिकानों को निशाना बनाया। उनके मुताबिक इन अभियानों में दो कोर मुख्यालय, हथियार डिपो, लॉजिस्टिक गोदाम, कई बटालियन और सेक्टर मुख्यालय तथा 80 से अधिक टैंक नष्ट किए गए हैं। पाकिस्तान का कहना है कि अब तक 133 तालिबान सदस्य मारे गए और 200 घायल हुए हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है।
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सेना से रिटायर और वर्तमान में उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता के मजबूत स्तम्भ कुंवर अशोक सिंह राजपुत दो टूक लहजे में कहते हैं-‘यदि आप दूसरों के लिए कांटा बोएंगे तो क्या वो आपको नहीं चुभेंगे। एक दिन ऐसा आएगा कि वो कांटे आपको भी चुभेंगे। पाकिस्तान भारत के लिए जिस तरह आतंकवादी गतिविधियों का संचालन करता था, कुछ उसी तरह अब तालिबानी उसके खिलाफ कर रहे हैं। खुद पर वार हुआ तो खुदा-खुदा चिल्लाने की क्या जरूरत?’ लंदन के इतिहासकार जॉन रोच कहते हैं कि पाकिस्तान ने दशकों तक अपनी ज़मीन का इस्तेमाल भारत-विरोधी आतंकी गतिविधियों के लिए होने दिया। कभी प्रत्यक्ष समर्थन के ज़रिए तो कभी रणनीतिक चुप्पी के माध्यम से। यह आरोप केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई बड़े आतंकी हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उठता रहा है।
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अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने पुष्टि की कि पाकिस्तान ने काबुल, पक्तिका और कंधार में बमबारी की है। लेकिन दावा किया कि इन हमलों में कोई हताहत नहीं हुआ। तालिबान का आरोप है कि पाकिस्तान ने आम नागरिकों के घरों और एक धार्मिक स्कूल को निशाना बनाया, जिसमें महिलाओं और बच्चों समेत कम से कम 18 लोग मारे गए। तालिबान के सैन्य प्रवक्ता वहीदुल्लाह मोहम्मदी के अनुसार, जवाबी ऑपरेशन स्थानीय समयानुसार रात आठ बजे शुरू किया गया। तालिबान का दावा है कि उसने कई पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और कुछ को बंदी बना लिया, जबकि पाकिस्तान ने इन दावों से इनकार किया है।
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समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक, काबुल में तड़के लड़ाकू विमानों की आवाज़ और ज़ोरदार धमाकों की गूंज सुनी गई। स्थानीय लोगों ने रात करीब 1:50 बजे से 2:30 बजे तक गोलियों और विस्फोटों की आवाज़ें सुनने की बात कही। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर बिना उकसावे के हमला करने का आरोप लगा रहे हैं। पाकिस्तान का कहना है कि उसने काउंटर स्ट्राइक की, जबकि तालिबान का कहना है कि उसने पहले हुए हमलों के जवाब में बड़े पैमाने पर कार्रवाई की। अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने पाकिस्तानी हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान के लोग अपनी धरती की रक्षा करेंगे और आक्रामकता का साहस के साथ जवाब देंगे। वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात काबू में नहीं आए तो यह टकराव व्यापक क्षेत्रीय अस्थिरता का कारण बन सकता है। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक अविश्वास, सीमा विवाद और उग्रवाद के मुद्दे मिलकर इस संकट को और जटिल बना रहे हैं। पिछले वर्ष अक्तूबर में दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम (सीज़फायर) पर सहमति बनी थी, लेकिन हालिया घटनाओं ने उस समझौते को कमजोर कर दिया है। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नज़र इस पूरे घटनाक्रम पर है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयास तेज़ होते हैं या सैन्य टकराव बढ़ता है, यह दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए बेहद अहम साबित होगा।
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क्या है डूरंड लाइन विवाद?
इस पूरे तनाव की पृष्ठभूमि में 133 साल पुराना ‘डूरंड लाइन’ विवाद भी है। 1893 में ब्रिटिश भारत के अधिकारी सर हेनरी मोर्टिमर डूरंड और अफ़ग़ान अमीर अब्दुर रहमान ख़ान के बीच 2,640 किलोमीटर लंबी सीमा तय की गई थी। यह सीमा आज पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वा, बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान के 12 प्रांतों से अलग करती है। पाकिस्तान इस रेखा को आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है, जबकि अफ़ग़ानिस्तान की कई सरकारों ने इसे औपनिवेशिक समझौता बताते हुए पूर्ण मान्यता देने से इनकार किया है। पश्तून आबादी के पारंपरिक रिश्तों और सांस्कृतिक निकटता के कारण यह सीमा हमेशा संवेदनशील रही है। यही ऐतिहासिक विवाद समय-समय पर सैन्य तनाव को हवा देता रहा है।
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लंदन में रह रहीं कश्मीर की पत्रकार याना मीर कहती है पाकिस्तान की सुरक्षा नीति में रणनीतिक गहराई की अवधारणा ने अहम भूमिका निभाई। इस सोच के तहत, गैर-राज्य तत्वों को क्षेत्रीय समीकरणों में एक उपकरण की तरह देखा गया। कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर जीवित रखने और भारत पर दबाव बनाने की नीति में उग्रवादी संगठनों की मौजूदगी को कई बार अनदेखा किया गया। हालांकि, यह रणनीति अंततः पाकिस्तान के लिए ही उलटी साबित हुई। जिन समूहों को कभी ‘एसेट’ समझा गया, वे बाद में देश के भीतर अस्थिरता का कारण बने। तहरीक़-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) जैसे संगठनों ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और नागरिकों को ही निशाना बनाया। पेशावर स्कूल हमला इस त्रासदी का सबसे भयावह उदाहरण रहा।
