उत्तराखंड के जौनसार में धूमधाम से मनाया जा रहा है बूढ़ी दीवाली का पर्व

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नया लुक ब्यूरो

देहरादून। जौनसार के 200 से अधिक गांवों में पौराणिक बूढ़ी दीवाली का तीन दिवसीय जश्न शुरू हो गया है, जहां भगवान राम के लौटने की खबर देर से मिलने की मान्यता के चलते, ग्रामीण हाथों में जलती मशालें लेकर नाचते-गाते हुए, लोकनृत्य (हारुल) और पारंपरिक ढोल-दमाऊ के साथ पर्व मना रहे हैं। जौनसार के कालसी और चकराता ब्लॉक के करीब 200 गांवों, खेड़ों, मजरों में गुरुवार से बूढ़ी दीवाली का जश्न शुरू हो गया है। गरुवार को खत देवघार और खत शैली में दीपावली मनाई गई। सुबह मंदिरों में देव दर्शन के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण उमड़े। चकराता, कालसी ब्लॉक के गांवों में पौराणिक बूढ़ी दीवाली की अलग ही रंगत रहती है। ग्रामीणों ने देव दर्शन कर पर्व की शुरुआत की। ग्रामीण पंचायती आंगन में सामूहिक रूप से नृत्यों से सबको लुभाते रहे। नृत्य के दौरान सितलू मोडा की हारुल के बाद कैलेऊ मैशेऊ की हारुल गाई। सभी गांवों में सुबह चार बजे ग्रामीण हाथों में भीमल की मशालें लेकर नाचते-गाते हुए होलियात लेकर बाहर निकले। यहां होलियात जलाकर पर्व का जश्न मनाया गया। हर गांव में ढोल दमाऊं, रणसिंघे के साथ पंचायती आंगनों में लोक संस्कृति का दौर चला। जैसे-जैसे रात बढ़ती गई, वैसे-वैसे लोक संस्कृति का रंग चढ़ता गया।

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जौनसार के सभी गांवों में बूढ़ी दीवाली पर देव दर्शन को मंदिरों में तांता लगा रहा। कहीं पर ग्रामीणों ने महासू देवता तो कहीं पर शिलगुर विजट और चुड़ेश्वर महाराज तो कहीं पर भगवान परशुराम के दर्शन कर घर परिवार की खुशहाली की मन्नतें मांगी। पुरातत्व महत्व के प्राचीन शिव मंदिर लाखामंडल में भी देवदर्शन को लोग उमड़े। प्राचीन शिव मंदिर लाखामंडल, प्राचीन परशुराम मंदिर डिमऊ, शिलगुर विजट मंदिर सिमोग, महासू मंदिर लखवाड़, थैना, बुल्हाड़ में आस्था का सैलाब उमड़ा। बूढ़ी दीवाली का जिक्र रामायण से जुड़ा है। कहा जाता है कि भगवान राम के लौटने में देरी हुई, इसलिए हिमालय में अलग तिथि मनाई गई। हिमाचल प्रदेश की कुछ कथाओं में भगवान परशुराम का भी उल्लेख है। राजा बलि की भक्ति के कारण उनका प्रतीक दहन किया जाता है।

पूरे देश में दीवाली की चमक एक माह पहले थम चुकी है। जौनसार बावर और हिमाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में दीवाली का जश्न एक महीने बाद आज से शुरू होगा। यहां इसे बूढ़ी दीपावली या पुरानी दीवाली कहा जाता है। हर साल पर्व नवंबर के अंत या दिसंबर की शुरुआत में मनाया जाता है। यह त्योहार सर्द रातों में अलाव की गर्माहट और पारंपरिक नृत्य से सजा होता है। पटाखों के बजाय मशालों की रोशनी और लोकगीतों की धुन इसकी खासियत है। जौनसार में गुरुवार को बूढ़ी दीपाली की होलियात पर ग्रामीण हाथों में मशालें लेकर होलियात के रूप में नाचते गाते हुए गांव से बाहर गए। जहां जलती मशालें एक-दूसरे पर फेंकने लगे। वापस पंचायती आंगन में लौटने के बाद गांव स्याणा ने मकान की छत से भिरुड़ी के रूप में अखरोट को प्रसाद के तौर फेंका। इसे पाने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। इसी बीच बाजगी समुदाय के लोगों ने पुरुषों और महिलाओं के कानों पर हरियाड़ी लगाई। इस पर्व को लेकर मान्यता है किजब प्रभु श्रीराम अयोध्या लौटे तो हिमालयी इलाकों में बर्फबारी के कारण यह खबर एक माह के बाद मिली। इसके बाद जौनसार क्षेत्र में दीवाली का त्योहार मनाया गया। इस वजह से यहां दीवाली की जगह बूढ़ी दीवाली मनाई जाती है।

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