

Bharatendu Harishchandra: अब किसे याद है कि यह वर्ष भारतेंदु हरिश्चंद्र की 175वीं जयंती का वर्ष है? यह प्रश्न केवल साहित्यकारों से नहीं, पूरे समाज से पूछा जाना चाहिए। भारतेंदु की 175वीं जयंती पर उन्हें याद करने का सबसे सार्थक तरीका यही होगा कि उनकी रचनाओं को केवल इतिहास का अध्याय न मानकर वर्तमान के आइने की तरह पढ़ा जाए। हमारी स्मृति ऐसी उलझनों और तात्कालिकताओं में फंस गई है कि उत्तर-आधुनिक समय में आधुनिक हिंदी की पहली सशक्त कलम को याद करने की भी फुरसत नहीं बची। विडंबना यह है कि जिस लेखक ने हिंदी को आधुनिक चेतना, राष्ट्रीय आत्मबोध और सार्वजनिक संवाद की नई भाषा दी, उसी की जयंती हमारे सांस्कृतिक कैलेंडर में लगभग मौन होकर गुजर रही है।
यह केवल एक साहित्यकार को भूल जाना नहीं है । यह अपनी आधुनिक बौद्धिक परंपरा की जड़ों से दूर हो जाने का संकेत है। भारतेंदु को याद करना किसी मूर्ति का पूजन नहीं है। एक ऐसी रचनात्मक ऊर्जा, वैचारिक साहस और सांस्कृतिक दृष्टि को पुनः खोजने का प्रयास है, जिसने आधुनिक हिंदी साहित्य को नया तेज दिया। भारतेंदु को आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह माना जाता है।
इनके साहित्य का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य उसकी विविधता है। यह विविधता केवल भावों, संवेदनाओं और विषयों तक सीमित नहीं है, साहित्यिक विधाओं और अभिव्यक्ति-शैलियों तक फैली हुई है। उन्होंने भक्ति, श्रृंगार, देशभक्ति, सामाजिक आलोचना, व्यंग्य, प्रकृति, लोकजीवन और समकालीन यथार्थ जैसे अनेक विषयों पर समान अधिकार के साथ लेखन किया। कविता के अतिरिक्त नाटक, निबंध, पत्रकारिता, यात्रावृत्त, अनुवाद और आलोचना जैसी अनेक विधाओं में भी उनका योगदान हिंदी साहित्य को बहुआयामी बनाता है। यद्यपि उनका जीवन बहुत छोटा रहा।
ये भी पढें
कई दशकों बाद नौतनवां नगर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के नवनिर्माण को मिली मंजूरी
भारतेंदु के बाद हिंदी कविता का विकास अनेक महत्वपूर्ण दिशाओं में हुआ, किंतु धीरे-धीरे उसमें विषयगत और शैलीगत विशिष्टताओं के साथ-साथ एक प्रकार का वैचारिक केंद्रीकरण भी दिखाई देने लगा। द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता, इन सभी धाराओं ने हिंदी कविता को नई ऊंचाइयां दीं, पर प्रत्येक आंदोलन ने अपने-अपने आग्रहों के कारण कविता की संभावित विविधता को कुछ सीमा तक एक विशेष दिशा में केंद्रित भी किया।
परिणामस्वरूप भारतेंदु जैसी व्यापक और बहुरंगी रचनात्मकता अपेक्षाकृत दुर्लभ होती गई। आज जब साहित्य में विविधता, बहुलता और संवाद की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है, तब भारतेंदु की रचनाशीलता नए सिरे से प्रेरक दिखाई देती है। भारतेंदु के समय की समस्याएं थीं, देश का धन विदेश जाना, अत्यधिक कर, सरकारी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सामाजिक विषमता और जनता की दुर्दशा। उन्होंने इन सबको निर्भीकता से अपनी कविता में दर्ज किया। भारतेंदु की ‘नए जमाने की मुकरी’ न केवल इन समस्याओं को लोक चेतना का हिस्सा बनाती है ,बल्कि शासन पर प्रहार भी करती है।
भीतर भीतर सब रस चूसै।
हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै।
जाहिर बातन में अति तेज।
क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेज॥
यह मुकरी अंग्रेज़ी शासन का चरित्र तार-तार कर देती है। यहां ‘भीतर भीतर सब रस चूसै’ केवल आर्थिक शोषण का संकेत नहीं है, बल्कि भारत की संपदा, श्रम, उद्योग और सांस्कृतिक शक्ति के सुनियोजित दोहन का संकेत है। ‘हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै’ में शासन की वह नीति दिखाई देती है जो सभ्यता, न्याय और सुधार के मुखौटे के पीछे आम नागरिकों का तन, मन और धन, सब कुछ लूटती है। ‘जाहिर बातन में अति तेज’ आज के संदर्भ में करारी व्यंजना है। अंग्रेजों की लुभावनी भाषा, प्रशासनिक कौशल और आधुनिकता और विकास के दावों से है, जबकि अंतिम पंक्ति, ‘क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेज’, तीखा व्यंग्य है। अर्थात जो ऊपर से सज्जन दिखाई देता है, वही भीतर सबसे बड़ा फरेबी है।
ये भी पढें
गंडक की बाढ़ से मुजफ्फरपुर-छपरा NH-102 बंद, रेवा घाट के पास चार फीट पानी
अंग्रेज राज सुख साज, सबै विधि भारी।
पै धन विदेश चलि जात, यहै अति ख्वारी।।
यह पंक्ति ब्रिटिश शासन के सबसे बड़े अंतर्विरोध को उजागर करती है। भारतेंदु ने नोटिस किया कि अंग्रेजी शासन ने जो रेल, डाक, तार, शिक्षा और प्रशासन जैसी सुविधाएं दी हैं वे ‘सुख साज’ हैं। किंतु इन सुविधाओं की वास्तविक कीमत भारत की आर्थिक लूट थी। “पै धन विदेश चलि जात” में उस आर्थिक प्रक्रिया की ओर संकेत है जिसे बाद में दादाभाई नौरोजी ने “धन-निकासी सिद्धांत” के रूप में व्यवस्थित ढंग से प्रतिपादित किया। भारतेंदु ने इसे किसी अर्थशास्त्री की भाषा में नहीं, बल्कि एक कवि की संवेदना से बहुत पहले पहचान लिया था।
धन लेकर कछु काम न आव। ऊँची नीची राह दिखाव।
समय पड़े पर साधै गुंगी। क्यों सखि सज्जन नहिं सखि चुंगी॥
यह मुकरी केवल ब्रिटिशकालीन चुंगी व्यवस्था तक सीमित नहीं है। आज भी जब नागरिक कर देते हैं, लेकिन बदले में गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाएं, पारदर्शिता या समय पर प्रशासनिक सहायता नहीं मिलती, तब भारतेंदु का यह व्यंग्य उतना ही प्रासंगिक प्रतीत होता है। ये पंक्तियां केवल कर-व्यवस्था की आलोचना नहीं, बल्कि ऐसी शासन-व्यवस्था की आलोचना हैं जो जनता से संसाधन तो लेती है, पर उत्तरदायित्व निभाने में विफल रहती है।
ये भी पढें
Flydubai को-पायलट पर बड़ा खुलासा, ओमान ने पहले ही उड़ान भरने से रोक दिया था
तीन बुलाए तेरह आवैं। निज निज बिपता रोइ सुनावैं।
आँखौ फूटे भरा न पेट। क्यों सखि सज्जन नहिं ग्रेजुएट॥
यह मुकरी आज भी अर्थवान है। आज भी अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं में कुछ पदों के लिए लाखों आवेदन आते हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी बड़ी संख्या में युवा बेरोजगारी, अल्परोजगार और अवसरों की कमी से जूझते हैं। इसलिए भारतेंदु का यह व्यंग्य केवल उन्नीसवीं शताब्दी का ही आइना नहीं है , बल्कि आज की शिक्षा और रोजगार व्यवस्था पर एक खांटी और खरी टिप्पणी है।
मतलब ही की बोलै बात। राखै सदा काम की घात।
होले पहिने सुंदर समला। क्यों सखि सज्जन नहिं सखि अमला॥
यह व्यंग्य आज भी प्रासंगिक प्रतीत होता है। जब सरकारी तंत्र में लालफीताशाही, अनावश्यक विलंब, स्वार्थ, भ्रष्टाचार या दिखावटी औपचारिकता दिखाई देती है, तब भारतेंदु की यह मुकरी याद आती है। इसलिए यह रचना केवल उन्नीसवीं शताब्दी की नौकरशाही की आलोचना नहीं, बल्कि किसी भी ऐसे प्रशासनिक तंत्र पर लागू होती है जहाँ सेवा-भाव के स्थान पर स्वार्थ और अवसरवाद हावी हो जाए।
रूप दिखावत सरबस लूटै। फंदे में जो पड़ै न छूटै।
कपट कटारी जिय में हूलिस। क्यों सखि सज्जन नहिं सखि पुलिस॥
यह मुकरी ऐतिहासिक संदर्भ में ब्रिटिश पुलिस-तंत्र की आलोचना है, लेकिन इसका मूल प्रश्न आज भी विचारणीय है, क्या पुलिस जनता की सुरक्षा और न्याय के लिए कार्य कर रही है, या कहीं-कहीं शक्ति, भय और दुरुपयोग का माध्यम बन जाती है? जब भी पुलिस सुधार, जवाबदेही, मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता पर बहस होती है, भारतेंदु की यह मुकरी नए अर्थों के साथ पढ़ी जा सकती है।
ये भी पढें
AI फोटो से मचा हड़कंप, मगरमच्छ की तलाश में जुटे अधिकारी; शख्स पर केस
नई-नई नित तान सुनावै। अपने जाल में जगत फँसावै।
नित-नित हमैं करै बल-सून। क्यों सखि सज्जन नहिं कानून॥
इस मुकरी का मर्म आज भी प्रासंगिक है। जब कानून अत्यधिक जटिल हो जाए, न्याय पाने में वर्षों लग जाएँ, या कानूनी प्रक्रिया स्वयं दंड जैसी प्रतीत होने लगे, तब भारतेंदु का यह व्यंग्य याद आता है। यह मुकरी हमें यह भी याद कराती है कि कानून का वास्तविक उद्देश्य सत्ता की रक्षा नहीं, बल्कि न्याय, समानता और नागरिक अधिकारों की रक्षा होना चाहिए। भारतेंदु हरिश्चंद्र की व्यंग्य रचना ‘बानर सभा’ की आरंभिक पंक्तियों से ही उनकी तीक्ष्ण राजनीतिक दृष्टि, सत्ता की विडंबनाओं को पहचानने की क्षमता और निर्भीक व्यंग्यकार का व्यक्तित्व सामने आ जाता है। पंक्तियां है :
आना राजा बन्दर का बीच सभा के,
सभा में दोस्तो बन्दर की आमद आमद है।
गधे औ फूलों के अफसर जी आमद आमद है।
मरे जो घोड़े तो गदहा यों बादशाह बना।
उसी मसीह के पैकर की आमद आमद है।
यहाँ ‘बन्दर’, ‘गधा’ और ‘मरा हुआ घोड़ा’ केवल पशु नहीं हैं, बल्कि तत्कालीन औपनिवेशिक शासन और उसके संरक्षण में फलते-फूलते अयोग्य, चाटुकार और अवसरवादी लोगों के प्रतीक हैं। ‘मरे जो घोड़े तो गदहा यों बादशाह बना’ पंक्ति विशेष रूप से इस बात का संकेत करती है कि जब योग्य और सक्षम लोग हटा दिए जाते हैं, तब अयोग्य व्यक्ति सत्ता के शिखर पर बैठ जाता है। ‘गधे औ फूलों के अफसर जी’ कहकर भारतेंदु उन अधिकारियों पर तीखा व्यंग्य करते हैं जो योग्यता से नहीं, बल्कि सत्ता की कृपा और चापलूसी के बल पर ऊंचे पद प्राप्त करते हैं। भारतेंदु की व्यंग्य रचना ‘बानर सभा’ आज पढ़ते हुए लगता है कि समय नहीं बदला है । ‘आमद-आमद है’ की पुनरावृत्ति जिस दरबारी संस्कृति का उपहास करती है, वह इक्कीसवीं सदी में भी अनेक रूपों में दिखाई देती है। अंतर केवल इतना है कि राजमहलों की जगह अब राजनीतिक मंचों, सरकारी आयोजनों, कॉरपोरेट समारोहों, टेलीविजन स्टूडियो और सोशल मीडिया ने ले ली है। इन आरंभिक पंक्तियों की श्रृंखला की अंतिम दो पंक्तियां हैं:
“हैं खर्च-खर्च तो आमद नहीं खर-मुहरे की,
उसी बिचारे नए खर की आमद आमद है।”
‘यहां ‘खर्च-खर्च’और ‘आमद’ का द्वंद्व केवल आर्थिक लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि शासन की उस विडंबना का रूपक है जहाँ संसाधनों का अपव्यय तो दिखाई देता है, पर उसके अनुरूप कोई सार्थक उपलब्धि या जनकल्याण नहीं दिखता। ‘खर-मुहरे’ और ‘नए खर’ के माध्यम से भारतेंदु ऐसे लोगों पर व्यंग्य करते हैं जो व्यवस्था पर बोझ तो बनते हैं, किंतु हर बार नए चेहरे के रूप में उनका स्वागत किया जाता है।
यदि इन पंक्तियों को इक्कीसवीं सदी के संदर्भ में पढ़ें, तो वे अनेक प्रश्न खड़े करती हैं। क्या आज भी ऐसा नहीं होता कि बड़े-बड़े आयोजनों, प्रचार अभियानों और तामझाम पर भारी खर्च होता है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, और जनहित के मूल प्रश्न पीछे छूट जाते हैं? ‘बानर सभा’ का दूसरा पद भारतेंदु हरिश्चंद्र की व्यंग्य-दृष्टि को और अधिक तीखा तथा नाटकीय बना देता है । पंक्तियां हैं:
ये भी पढें
तेल संकट के बीच G7 की बड़ी पहल, इमरजेंसी स्टॉक से 10 करोड़ बैरल तेल-डीजल होगा जारी
‘पाजी हूँ मैं कौम का बन्दर मेरा नाम।
बिन फुजूल कूदे फिरे मुझे नहीं आराम।।
सुनो रे मेरे देव रे दिल को नहीं करार।
जल्दी मेरे वास्ते सभा करो तैयार।।
लाओ जहाँ को मेरे जल्दी जाकर ह्याँ।
सिर मूड़ैं, गारत करैं, मुजरा करैं यहाँ।।’
यहाँ ‘बंदर’ स्वयं अपना परिचय देता है। वह बिना किसी संकोच के स्वीकार करता है कि उसका स्वभाव निरर्थक उछलकूद करना है। यह आत्मस्वीकृति ही भारतेंदु के व्यंग्य का सबसे बड़ा हथियार है। ‘बिन फुजूल कूदे फिरे मुझे नहीं आराम’ केवल एक पात्र का कथन नहीं, बल्कि उस मानसिकता का चित्र है जो शोर, प्रदर्शन और लगातार सक्रिय दिखाई देने को ही उपलब्धि समझती है। ‘जल्दी मेरे वास्ते सभा करो तैयार’ सत्ता की उस बेचैनी का संकेत है जिसे हर समय मंच, भीड़ और सार्वजनिक प्रदर्शन चाहिए। सभा यहाँ केवल विचार-विमर्श का स्थान नहीं रह जाती, बल्कि शक्ति-प्रदर्शन का माध्यम बन जाती है। उसके बाद ‘सिर मूड़ैं, गारत करैं, मुजरा करैं यहाँ’ में व्यंग्य और अधिक तीखा हो जाता है। यह उस संस्कृति पर प्रहार है जहाँ स्वतंत्र व्यक्तित्व का सम्मान नहीं, बल्कि समर्पण, आत्मसमर्पण और चाटुकारिता को प्रतिष्ठा मिलती है। ‘मुजरा’ यहाँ केवल नृत्य नहीं, बल्कि विवेक के समर्पण का प्रतीक बन जाता है।
यदि इन पंक्तियों को इक्कीसवीं सदी के संदर्भ में पढ़ें, तो वे कई प्रश्न उठाती हैं। क्या आज सार्वजनिक जीवन में वास्तविक काम से अधिक प्रदर्शन पर ज़ोर नहीं है? क्या हर क्षेत्र में निरंतर दृश्यता, प्रचार और आयोजन सफलता का पर्याय नहीं बनते जा रहे? क्या अनेक संस्थाओं में स्वतंत्र विचार की अपेक्षा सहमति और प्रशंसा को अधिक महत्व नहीं मिलता? क्या डिजिटल युग में भीड़ जुटाने, नारे गढ़ने और छवि बनाने की कला कई बार गंभीर विचार-विमर्श पर भारी नहीं पड़ती?
ये भी पढें
भारतेंदु का व्यंग्य किसी विशेष काल या शासन तक सीमित नहीं है। वह सत्ता की उस मनोवृत्ति की पहचान करता है जो हर युग में नए रूप धारण कर लेती है। इसलिए ‘बानर सभा’ आज भी केवल उन्नीसवीं शताब्दी का दस्तावेज नहीं, बल्कि हमारे समय का आईना है। उसके ‘बंदर’ बदलते रहते हैं, पर उनकी ‘फुजूल कूद’, उनका प्रदर्शन-प्रेम और अपने लिए ‘सभा तैयार’ कराने की उत्कंठा बार-बार लौट आती है।
यही भारतेंदु की दूरदृष्टि है। उन्होंने व्यक्तियों का नहीं, प्रवृत्तियों का चित्र बनाया था। इसीलिए उनका व्यंग्य समय के साथ पुराना नहीं पड़ता; हर नया समय उसमें अपना चेहरा देख लेता है।
मगर आज? आज भी हम आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई, करों के बोझ और सामाजिक विषमता की चर्चा करते हैं। अंतर यह है कि भारतेंदु के समय कविता और साहित्य इन प्रश्नों से सीधे टकराते थे; आज का साहित्य अपेक्षाकृत अधिक निजी अनुभवों, पहचान, स्मृति और व्यक्तिकेंद्रित विषयों में व्यस्त दिखाई देता है। यह नहीं कि समकालीन साहित्य में सामाजिक प्रश्न नहीं हैं, लेकिन वे वैसी व्यापक राष्ट्रीय चेतना और जन-जागरण के स्वर में कम दिखाई देते हैं जैसी भारतेंदु के यहां मिलती है। इसीलिए आज यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठता है कि यदि आज भी धन, भ्रष्टाचार, करों का बोझ और बेरोजगारी जैसी समस्याएं मौजूद हैं, तो क्या हमारे साहित्य में भारतेंदु जैसी निर्भीक सामाजिक दृष्टि और जनपक्षधर आवाज मुखर है?
नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
Google Play Store: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.app.nayalooknews
गंडक की बाढ़ से मुजफ्फरपुर-छपरा NH-102 बंद, रेवा घाट के पास चार फीट पानी
Flydubai को-पायलट पर बड़ा खुलासा, ओमान ने पहले ही उड़ान भरने से रोक दिया था
AI फोटो से मचा हड़कंप, मगरमच्छ की तलाश में जुटे अधिकारी; शख्स पर केस

