
गुलदस्ता पत्रकारिता का स्वर्णकाल: खबरें गईं, बुके आ गए!
भास्कर दुबे
पत्रकारिता का स्वरूप बदल रहा है। कभी पत्रकार सत्ता से सवाल पूछते थे, अब फूलों की खुशबू के साथ शुभकामनाएं पहुंचाते हैं। वरिष्ठ पत्रकारों की मानें तो आज की पत्रकारिता का सबसे जीवंत, सक्रिय और फलता-फूलता क्षेत्र “गुलदस्ता पत्रकारिता” है।
राजधानी के लाल बहादुर शास्त्री भवन, बापू भवन, विधान भवन और लोक भवन में यदि मंत्रियों, अफसरों और उनके विशेष सहयोगियों की संख्या जोड़ दी जाए तो आंकड़ा 700-800 तक पहुंच जाता है। ऐसे में पत्रकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब खबर ढूंढना नहीं, बल्कि यह याद रखना है कि किस अधिकारी का जन्मदिन कब है और किस मंत्री की शादी की सालगिरह किस तारीख को पड़ती है।
खबर नहीं, कैलेंडर चाहिए
सूत्र बताते हैं कि कई पत्रकारों के मोबाइल में अब सूचना विभाग से ज्यादा महत्वपूर्ण “बर्थडे रिमाइंडर ऐप” हो गया है।
एक वरिष्ठ संवाददाता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया
“पहले हम फाइलों का फॉलो-अप करते थे, अब फूलों का स्टॉक देखते हैं।”
कहा जा रहा है कि राजधानी में प्रतिदिन औसतन 8 से 10 गुलदस्ते भेंट किए जाते हैं। कुछ समर्पित पत्रकार तो एक ही दिन में तीन-तीन कार्यक्रमों में पहुंचकर लोकतंत्र और लिली के फूलों के बीच अद्भुत संतुलन स्थापित कर देते हैं।
खोजी पत्रकारिता का नया अध्याय
पहले पत्रकार यह खोजते थे कि किसी विभाग में घोटाला हुआ है या नहीं। अब खोज का विषय बदल गया है—
साहब को गुलाब पसंद है या ऑर्किड?
मैडम को लाल फूल पसंद हैं या पीले?
बुके का आकार मंत्री स्तर का हो या प्रमुख सचिव स्तर का?
बताया जाता है कि कुछ पत्रकारों ने तो “फ्लोरल बीट” भी विकसित कर ली है। जैसे पुलिस बीट, सचिवालय बीट और विधानसभा बीट होती है, वैसे ही अब “बुके बीट” तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
प्रेस क्लब में नई मांग
सूत्रों के अनुसार, कुछ युवा पत्रकारों ने मांग की है कि पत्रकारिता संस्थानों में अब निम्नलिखित विषय भी पढ़ाए जाएं—
बुके चयन एवं प्रबंधन
सालगिरह कवरेज तकनीक
पुष्प कूटनीति का परिचय
अधिकारी प्रसन्नता विज्ञान
कहा जा रहा है कि भविष्य में पत्रकारिता की डिग्री के साथ “डिप्लोमा इन एडवांस बुके हैंडलिंग” भी शुरू किया जा सकता है।
फूलों का अर्थशास्त्र
राजधानी के फूल व्यापारियों ने भी इस बदलाव का स्वागत किया है। उनका कहना है कि सरकार चाहे किसी की हो, पत्रकार और गुलदस्ता उद्योग का रिश्ता सदैव मजबूत रहता है।
एक फूल विक्रेता ने मुस्कुराते हुए कहा—
“पहले खबरों में सीजन आता था, अब जन्मदिनों का सीजन साल भर चलता है।”
लोकतंत्र की नई खुशबू
कभी पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता से सवाल पूछना माना जाता था। आज कुछ हलकों में यह धारणा बनती जा रही है कि सवाल पूछने से बेहतर है मुस्कुराते हुए गुलदस्ता थमा देना।
इससे संबंध भी मधुर रहते हैं और तस्वीर भी अगले दिन सोशल मीडिया पर प्रकाशित हो जाती है।अंततः कहा जा सकता है कि पत्रकारिता का यह नया दौर बेहद सुगंधित है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले पत्रकार फाइलों की धूल झाड़ते थे, अब फूलों की पंखुड़ियां सजाते हैं।
और शायद आने वाली पीढ़ियां पत्रकारिता के इतिहास में इस युग को “गुलदस्ता काल” के नाम से याद करेंगी, जहां खबरों से ज्यादा महत्व उस बुके का था, जो सही समय पर सही हाथों में पहुंच गया।
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