इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त: रेप की शिकायत पर सबूत न होने पर भी FIR जरूरी

Allahabad High Court's verdict

Allahabad High Court’s verdict: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी महिला की ओर से संज्ञेय अपराध की शिकायत मिलने पर पुलिस केवल इस आधार पर एफआईआर दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती कि शिकायतकर्ता के पास व्हाट्सऐप चैट, कॉल रिकॉर्डिंग या अन्य इलेक्ट्रॉनिक सबूत मौजूद नहीं हैं। अदालत ने कहा कि सबूत जुटाना पुलिस की जांच का हिस्सा है और एफआईआर दर्ज कराने के शुरुआती चरण में शिकायतकर्ता पर साक्ष्य पेश करने का पूरा बोझ नहीं डाला जा सकता।

सबूत नहीं होने पर भी दर्ज करनी होगी FIR

हाईकोर्ट ने कहा कि अगर शिकायत से प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध सामने आता है तो पुलिस के लिए FIR दर्ज करना जरूरी है। शिकायतकर्ता के पास उस समय पर्याप्त इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि उसकी शिकायत को खारिज कर दिया जाए।

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कोर्ट के मुताबिक, जांच के दौरान पुलिस कॉल डिटेल रिकॉर्ड, मोबाइल लोकेशन, ग्राहक संबंधी जानकारी, डिजिटल रिकॉर्ड और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों को जुटा सकती है। इसलिए शुरुआती स्तर पर चैट या कॉल रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं होने को शिकायत को झूठा मानने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

कंपनी मालिक पर गंभीर आरोप

यह मामला एक कंपनी में प्रशासनिक पद पर कार्यरत महिला की शिकायत से जुड़ा है। महिला ने अपने नियोक्ता पर बार-बार यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, धमकी और मार्च 2026 में डिजिटल पेनिट्रेशन जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। महिला का आरोप था कि उसने पहले गाजियाबाद के वेव सिटी थाने और पुलिस कमिश्नर के सामने शिकायत की, लेकिन उसकी एफआईआर दर्ज नहीं की गई। इसके बाद उसने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(4) के तहत मजिस्ट्रेट की अदालत का रुख किया। मजिस्ट्रेट ने 20 जुलाई 2026 को एफआईआर दर्ज करने और मामले की जांच के आदेश दिए।

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हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से किया इनकार

मामले में आरोपी कंपनी मालिक की ओर से FIR रद्द करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने याचिका खारिज कर दी।

अदालत ने कहा कि FIR रद्द करने के स्तर पर आरोपों की सत्यता या विवादित तथ्यों का अंतिम फैसला नहीं किया जा सकता। किसी आरोपी के दोषी या निर्दोष होने का निर्धारण जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।

पुलिस की भूमिका पर भी उठे सवाल

हाईकोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि जब शिकायत में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का खुलासा हो रहा था, तब शुरुआत में FIR दर्ज क्यों नहीं की गई। अदालत ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को गाजियाबाद पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच करने और चार सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित ललिता कुमारी फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर एफआईआर दर्ज करना पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी है। पुलिस का काम शिकायत को शुरुआत में ही सही या गलत घोषित करना नहीं, बल्कि कानून के मुताबिक निष्पक्ष जांच करना है।

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