अखिलेश की फिल्म धुरंधर पर नाराजगी के सियासी मायने

Ram Mandir Donation Controversy
अजय कुमार
अजय कुमार

Political सिनेमा और राजनीति का रिश्ता हमेशा से गहरा रहा है, लेकिन जब परदे की कहानियां सीधे तौर पर चुनावी मैदान के समीकरणों और राजनीतिक दलों के इतिहास को प्रभावित करने लगें, तो सियासत गरमाना लाजिमी है। हाल ही में रिलीज हुई बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता हासिल करने वाली फिल्म धुरंधर को लेकर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। अखिलेश यादव ने इस फिल्म को सीधे तौर पर एक सरकारी प्रोपेगेंडा करार देते हुए यह तक कह दिया है कि भविष्य में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर इस पूरे मामले की गहन जांच कराई जाएगी। आखिर क्या वजह है कि एक कमर्शियल फिल्म पर सूबे के इतने बड़े राजनेता को इतनी कड़ी आपत्ति जतानी पड़ी और क्यों उन्होंने सरकार बनने पर जांच की बात कहकर राजनीतिक दांव चला है, इसे वर्तमान और अतीत के राजनीतिक घटनाक्रम के आईने में आसानी से समझा जा सकता है।

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इस पूरे विवाद की जड़ में वह किस्सा है जिसका इस्तेमाल हालिया दौर के राजनीतिक नैरेटिव को गढ़ने के लिए किया जा रहा है। दरअसल, फिल्म धुरंधर और इसके सीक्वेंस में पूर्वांचल के एक चर्चित माफिया डॉन के किरदार और उसके पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई तथा आतंकी संगठनों के साथ संबंधों को परदे पर दिखाया गया है। यह किसी से छिपा नहीं है कि उक्त माफिया राजनेता अतीत में समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा तक पहुंच चुका था। राजनीतिक विरोधियों ने इस सिनेमैटिक प्लॉट का इस्तेमाल तुरंत समाजवादी पार्टी को घेरने के लिए हथियार के रूप में करना शुरू कर दिया। राजधानी लखनऊ की सड़कों पर लगे उन पोस्टरों और विज्ञापनों ने आग में घी का काम किया, जिनमें सपा के पुराने शासनकाल की तुलना फिल्म के काल्पनिक और अराजक ‘राज’ से कर दी गई। जब किसी दल के पूरे राजनीतिक अतीत, उसकी कार्यप्रणाली और पुराने दौर के दागों को बड़े परदे के जरिए जनमानस के बीच इस तरह परोसा जाए कि सीधा संबंध किसी खास दल से जुड़े होने का आभास हो, तो दल के मुखिया के लिए उस पर प्रतिक्रिया देना राजनीतिक मजबूरी बन जाता है।

अखिलेश यादव का यह आक्रामक रुख महज एक फिल्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत भाजपा सरकार पर विपक्षियों की छवि धूमिल करने के लिए सरकारी तंत्र और संसाधनों के दुरुपयोग का आरोप लगाया जाता रहा है। अखिलेश ने यह सवाल उठाकर कि इस तरह के फिल्म निर्माण में भारी-भरकम पैसा कहां से आ रहा है और कौन लोग इसके पीछे हैं, एक तीर से कई निशाने साधे हैं। उनका यह बयान इस बात का प्रतीक है कि समाजवादी पार्टी अब वैचारिक और सांस्कृतिक मोर्चे पर भी आक्रामक तेवर अपनाने से पीछे नहीं हटेगी। जब राजधानी में विपक्षी खेमे द्वारा लगातार ऐसे पोस्टर चस्पा किए जाएं जो पार्टी के पुराने शासनकाल को अपराध और अंडरवर्ल्ड के गठजोड़ के रूप में चित्रित करें, तो पार्टी अध्यक्ष के तौर पर अखिलेश यादव के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह इन हमलों को सिर्फ जुबानी जमाखर्च से न टालें, बल्कि भविष्य की सत्ता का विश्वास दिलाकर अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रखें और विरोधियों को कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दें।

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सरकार बनने पर फिल्म निर्माण और इसके वित्तपोषण की जांच कराए जाने की बात कहकर अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी के समर्थकों और कैडर को भी एक कड़ा संदेश दिया है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातिगत समीकरणों, कानून-व्यवस्था के मुद्दों और ब्राह्मणों के उत्पीड़न जैसे अन्य समकालीन मुद्दों के बीच, ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों के जरिए बन रहे नैरेटिव को काउंटर करना समाजवादी पार्टी के लिए अस्तित्व की लड़ाई जैसा बन गया है। अखिलेश भली-भांति समझते हैं कि यदि जनता के बीच इस प्रोपेगेंडा का माकूल जवाब समय रहते नहीं दिया गया, तो यह उनकी पार्टी की सेक्युलर और प्रगतिशील छवि को नुकसान पहुंचा सकता है। यही कारण है कि उन्होंने आक्रामक रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता परिवर्तन होने पर केवल वर्तमान नीतियां ही नहीं, बल्कि इस प्रकार के राजनीतिक छद्म युद्धों और उनके वित्तीय स्रोतों की परतों को भी कानूनी दायरे में बेनकाब किया जाएगा।

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