मुखर योगी और अखिलेश की सियासी कसमकस

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संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

Political मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सपा मुखिया अखिलेश यादव पर तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग जीवन भर बच्चे ही बने रहते हैं। बबुआ भी यही करते थे। वो दोपहर 12 बजे सो कर उठते थे। दो बजे तैयार होते थे। पांच बजते-बजते उनके जिम जाने का समय हो जाता था और शाम 7 बजे महफिल सज जाती थी। देश-प्रदेश के बारे में सोचने के लिए उनके पास समय ही कहां होता था। प्रदेश की कानून-व्यवस्था का हाल तो ये था कि महिलाओं को सबसे बड़ा खतरा इन्हीं सपाइयों से ही था। मुख्यमंत्री योगी शुक्रवार को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जब सरकारें प्रदेश के विकास के लिए काम करती हैं तो उसका लाभ समाज के हर तबके को मिलता है। दरअसल, अखिलेश यादव आजकल कोई भी बात सीधे नहीं कहते हैं। उनकी भाषा में तंज ज्यादा और साफगोई कम नजर आती है। वह जो भी मुद्दे उठाते हैं, उसमें भी वह अपने सियासी फायदे पर ज्यादा ध्यान देते हैं। हर घटना का नाटकीय रूपांतरण कर देते हैं।

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चंदा चोरी में भी यही देखने को मिल रहा है। उनके सांसद और नेता हर जगह कथित रूप से दानपात्र लेकर हर जगह दिखाई पड़ने लगे हैं। आजकल अखिलेश ने सॉफ्ट हिन्दुत्व के चक्कर में मुस्लिम वोट बैंक की सियासत को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया है। इस पर ओवैसी उन पर हमेशा हमलावर रहते हैं। वहीं कुछ मुसलमान तो यहां तक कहते हैं कि अखिलेश ने जिस धर्म में जन्म नहीं लिया, वह उसके नहीं हुए तो हमारे क्या होंगे। यही बात ओवैसी भी मुसलमानों को समझाने में लगे हैं। अखिलेश के पीडीए का भी यही हाल है। कभी वह पीडीए को पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक बताते हैं तो कभी पीडीए का मतलब पिछड़ा-दलित और ए का मतलब आधी आबादी बताने लगते हैं। हाल ही में उन्होंने अपने पीडीए में पीडी को पंडितों का शॉर्ट फॉर्म बता दिया। बात-बात पर उनके जनप्रतिनिधि संसद से लेकर विधानसभा तक हंगामा खड़ा कर देते हैं। लोकतंत्र के मंदिर में प्रदर्शन करते हैं। हाल यह है कि कोई पत्रकार उनसे सख्त सवाल पूछ लेता है तो वह उसे गोदी मीडिया और बीजेपी वाला बता देते हैं।

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दुखद यह है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग का स्तर लगातार गिरता और नया रूप ले रहा है, जहां व्यक्तिगत बयानों से लेकर रणनीतिक बदलावों तक हर बात पर सूबे की सियासत गरमाई हुई है। हाल ही में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पर किया गया करारा तंज इस राजनीतिक उथल-पुथल का ताजा उदाहरण है। इस बयान के साथ-साथ अखिलेश यादव की बदलती कार्यशैली, सॉफ्ट हिंदुत्व के समीकरण और उनके पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक/आधी आबादी) फॉर्मूले पर उठ रहे सवाल उत्तर प्रदेश के राजनीतिक भविष्य के लिए बहुत कुछ संकेत देते हैं।मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव की कार्यशैली और दिनचर्या पर सीधा कटाक्ष करते हुए उनकी राजनीतिक गंभीरता पर सवाल खड़े किए।

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उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग जीवनभर बच्चे ही बने रहते हैं और बबुआ कहकर संबोधित करते हुए उनकी दिनचर्या का मजाक उड़ाया। मुख्यमंत्री के अनुसार, दोपहर 12 बजे सो कर उठना, दो बजे तैयार होना, पांच बजे जिम जाना और शाम सात बजे महफिल सजाना एक जननेता की पहचान नहीं हो सकती है। इस प्रकार के बयानों के जरिए सत्ता पक्ष जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश करता है कि विपक्ष के नेता जमीनी हकीकत, जनता के दुखों और प्रदेश के विकास के प्रति गंभीर नहीं हैं। इसके अलावा, कानून-व्यवस्था के मुद्दे को जोड़ते हुए योगी आदित्यनाथ ने पिछली सपा सरकार के कार्यकाल को याद दिलाया और आरोप लगाया कि उस दौरान महिलाओं को सबसे बड़ा खतरा सपाइयों से ही था। यह राजनीतिक बयानबाजी केवल व्यक्तिगत हमला नहीं है, बल्कि यह भाजपा की उस स्थापित रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह विपक्ष को “विशेषाधिकार प्राप्त” और “जमीनी हकीकत से कटे हुए” वर्ग के रूप में चित्रित करती है।

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उधर, अखिलेश यादव की वर्तमान राजनीतिक रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है, जिसे कई राजनीतिक विश्लेषक सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर झुकाव मान रहे हैं। इस चक्कर में ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक को लेकर अपनी रणनीति में बदलाव किया है या उसे कुछ हद तक ठंडे बस्ते में डाल दिया है। यही कारण है कि ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर हमलावर रहते हैं। ओवैसी और समुदाय के कुछ आलोचकों का यह तर्क तेजी से जमीन पकड़ रहा है कि जो नेता अपने मूल धार्मिक और वैचारिक दायरे में स्पष्ट नहीं है, वह दूसरों के लिए कितना वफादार साबित होगा।

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मुस्लिम समाज के एक वर्ग में यह भावना घर कर रही है कि सपा केवल चुनावों के वक्त उनके वोटों का इस्तेमाल तो करती है, लेकिन उनके वास्तविक मुद्दों पर खुलकर सामने आने से बचती है। यह असमंजस समाजवादी पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है, क्योंकि पारंपरिक मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण ही पार्टी की राजनीतिक ताकत का मुख्य आधार रहा है।अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नया राजनीतिक मंत्र गढ़ा था, लेकिन इसके बार-बार बदलते अर्थों ने राजनीतिक गलियारों में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। कभी ए का मतलब अल्पसंख्यक बताया जाता है, तो कभी इसे आधी आबादी (महिलाएं) से जोड़ा जाता है।

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हाल ही में पीडी के दायरे में पंडित (सवर्ण वर्ग) को शामिल करने के संकेतों ने इस फॉर्मूले की वैचारिक स्पष्टता पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। जबकि हो यह है कि जब किसी राजनीतिक नारे या समीकरण का दायरा बहुत अधिक फैला दिया जाता है, तो उसका मूल वैचारिक उद्देश्य कमजोर पड़ने लगता है। पिछड़ों और दलितों के अधिकारों की बात करने वाली पार्टी यदि अचानक सवर्ण जातियों को भी इसी खेमे में फिट करने की कोशिश करती है, तो इससे मूल कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम फैलता है। आलोचकों का मानना है कि यह सब केवल तात्कालिक चुनावी नफा-नुकसान को ध्यान में रखकर किया जा रहा है, जिसमें दूरगामी वैचारिक दृढ़ता का अभाव साफ झलकता है। इतना ही नहीं, अखिलेश यादव की राजनीतिक शैली में अब आक्रामकता और तंज की प्रधानता बढ़ गई है।

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वह किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर सीधी बात करने के बजाय सियासी नफा-नुकसान को तरजीह देते हैं। इसके साथ ही, हालिया दौर में उनके जनप्रतिनिधियों द्वारा संसद से लेकर विधानसभा तक किए जाने वाले हंगामे और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की सीमाओं को लांघने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठ रहे हैं। जब मीडिया द्वारा उनसे कोई कड़े या तीखे सवाल पूछे जाते हैं, तो उसे गोदी मीडिया या भाजपा का प्रवक्ता कहकर टाल देना राजनीतिक परिपक्वता का परिचायक नहीं माना जाता है। एक बड़े राजनीतिक दल के मुखिया से यह अपेक्षा की जाती है कि वह आलोचनाओं का सामना तर्कों के साथ करे, न कि उन्हें खारिज करके। यह प्रवृत्ति यह दर्शाती है कि विपक्ष असहज करने वाले सवालों से बचने का रास्ता तलाश रहा है, जो लोकतांत्रिक संवाद के लिहाज से स्वस्थ परंपरा नहीं है। कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह मुकाबला केवल दो दलों की वैचारिक लड़ाई नहीं, बल्कि कार्यशैली, विश्वसनीयता और बदलते समीकरणों की एक लंबी और जटिल शतरंज की चाल बन चुका है।

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