
मद्रास हाईकोर्ट ने कहा-अंतरंग संबंध सहमति से हों, जरूरी तो नहीं
हो तो रेप माना जाएगा, मद्रास हाई कोर्ट के फैसले की बड़ी बात
Madras High Court : भारतीय अदालतें यौन अपराधों से जुड़े मामलों में सहमति यानी Consent को सबसे बड़ी प्राथमिकता देती हैं। ऐसे मामलों में सहमति का सवाल, सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल बनकर उभरता है। मद्रास हाईकोर्ट ने हालिया फैसले में कहा कि केवल यह तथ्य कि महिला और पुरुष के बीच अंतरंग या प्रेम संबंध था,
इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर शारीरिक संबंध सहमति से बना था। यदि ऐसे मामलों में महिला की सहमति धोखे, ब्लैकमेल, धमकी या झूठे विश्वास के कारण प्राप्त की गई हो तो वह कानून की नजर में वैध सहमति नहीं मानी जाएगी। अदालत ने कहा कि प्रत्येक मामले के तथ्यों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है और केवल संबंध की प्रकृति के आधार पर आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती।
पीड़िता को ट्रायल कोर्ट से मिला न्याय
मामला तमिलनाडु के एक कस्बे का है। जहां पीड़िता नौकरी की तलाश में थी। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक आरोपी सूजी उर्फ कासी ने फेसबुक के ज़रिए उससे संपर्क किया। बाद में कासी ने कथित तौर पर नौकरी और शादी का वादा करके उसका भरोसा जीता। आरोपी ने पहली मुलाकात में ही पीड़िता के विरोध के बावजूद उसका यौन शोषण किया। बाद में उसने माफ़ी मांगी, नौकरी और शादी के वादे दोहराए और उसे दोबारा मिलने के लिए मना लिया। और बार बार यौन शोषण किया। अंत में एक दिन परिवार के मना करने का बहाना कर उससे दूरी भी बना ली। मामले में ट्रायल कोर्ट ने तथ्यों के आधार पर रेप मानते हुए आरोपी को सजा दी। जिसके खिलाफ आरोपी हाई कोर्ट पहुंचा था।
अंतरंग संबंध ‘सहमति’ की गारंटी नहीं
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ आरोपी की अपील पर मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच में जस्टिस एन आनंद वेंकटेश और जस्टिस के रामकृष्णन की पीठ ने सुनवाई की। मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि किसी महिला और पुरुष के बीच प्रेम संबंध या अंतरंगता अपने आप में यह साबित नहीं करती कि हर बार बने शारीरिक संबंध के लिए स्वतंत्र और स्वैच्छिक सहमति मौजूद थी। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया कि यदि शुरुआत से ही आरोपी का उद्देश्य महिला को धोखे में रखकर शारीरिक संबंध बनाना था तो ऐसी सहमति ‘मिसकन्सेप्शन ऑफ फैक्ट’ मानी जा सकती है।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर असफल प्रेम संबंध या बाद में विवाह न होना अपने आप बलात्कार का मामला नहीं बन जाता। यह देखना आवश्यक होगा कि आरोपी की मंशा शुरुआत से ही धोखाधड़ी की थी या नहीं। इसलिए प्रत्येक मामले में तथ्यों का सूक्ष्म परीक्षण आवश्यक है। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में कोई एक सार्वभौमिक नियम लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यह जांचना जरूरी होगा कि महिला की सहमति स्वतंत्र थी या किसी दबाव अथवा छल का परिणाम।
आखिर में हाई कोर्ट ने अदालत ने कहा कि यदि किसी महिला की सहमति किसी झूठे वादे, धोखे, धमकी या ब्लैकमेल के कारण प्राप्त हुई है तो ऐसी सहमति कानून में टिक नहीं सकती। और फिर केवल केवल इस आधार पर कि दोनों पक्षों के बीच प्रेम संबंध था, आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती। सहमति का वास्तविक अर्थ स्वतंत्र इच्छा से लिया गया निर्णय है। यदि महिला ने दबाव, डर, ब्लैकमेल या किसी प्रकार के छल के कारण संबंध बनाए हों तो उसे वैध सहमति नहीं माना जाएगा। प्रत्येक घटना और परिस्थिति का अलग-अलग परीक्षण जरूरी है।
मामले में मद्रास हाई कोर्ट की टिप्पणी
इस मामले में हाई कोर्ट ने एक बड़ी टिप्पणी यह कि हर मामले में तथ्यों पर ध्यान देना जरूरी है। ऐसे मामलों में कोई एक सार्वभौमिक नियम लागू नहीं किया जा सकता। खास कर ऐसे मामलों में अदालतों को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह यह जांचना जरूरी होगा कि महिला की सहमति स्वतंत्र थी या किसी दबाव अथवा छल का परिणाम। न्यायालय ने यह भी कहा कि वहीं यदि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हो कि संबंध पूरी तरह स्वैच्छिक था और बाद में केवल विवाद उत्पन्न हुआ, तो अदालत अलग निष्कर्ष पर भी पहुंच सकती है।
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