खामेनेई का अंतिम संस्कार: शोक आमंत्रण में छिपा है बड़ा सियासी संदेश

Ayatollah Ali Khamenei
संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

Ayatollah Ali Khamenei ईरान के पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी के निधन के बाद चार जुलाई 2026 को उनके अंतिम संस्कार को लेकर उपजे कूटनीतिक घटनाक्रम ने भारतीय राजनीति और विदेश नीति के गलियारों में एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है। ईरान सरकार द्वारा भारत की कई प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों को इस शोक सभा में आमंत्रित करना न केवल दोनों देशों के बीच गहरे होते संबंधों का संकेत है, बल्कि यह पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति में भारत की बढ़ती अहमियत को भी रेखांकित करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिला निमंत्रण इस बात का प्रमाण है कि ईरान भारत को अपने रणनीतिक भागीदारों की सूची में शीर्ष पर रखता है, लेकिन प्रधानमंत्री के स्थान पर बिहार के राज्यपाल को भारत के प्रतिनिधि के तौर पर भेजना यह दर्शाता है कि भारत कूटनीतिक शिष्टाचार और आंतरिक व्यस्तताओं के बीच एक संतुलित रुख अपना रहा है।

यह आमंत्रण भारत के लिए एक जटिल स्थिति भी पैदा करता है। कांग्रेस सहित विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं को बुलावा जाना यह स्पष्ट करता है कि ईरान भारत के किसी एक धड़े या सरकार से नहीं, बल्कि पूरे भारतीय तंत्र से संवाद बनाए रखने का इच्छुक है। भारत के भीतर अयातुल्ला अली खामेनेई और ईरानी नेतृत्व के प्रति एक बड़े वर्ग की आस्था किसी से छिपी नहीं है। हाल ही में मोहर्रम के दौरान लखनऊ और देश के अन्य हिस्सों में खामेनेई के पोस्टर और उनकी विचारधारा के समर्थन में दिखने वाली सक्रियता इस बात का प्रमाण है कि भारत में ईरान के वैचारिक और धार्मिक अनुयायियों का एक मजबूत आधार मौजूद है। ऐसे में ईरान के शोक में शामिल होने का सरकार का यह निर्णय इस विशाल आबादी के प्रति एक संवेदनशील संदेश भी है।

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भारतीय राजनीति के दृष्टिकोण से देखें तो यह घटनाक्रम देश के भीतर सॉफ्ट पावर और सांस्कृतिक कूटनीति की जटिलताओं को उजागर करता है। जब भारत सरकार के प्रतिनिधि आधिकारिक तौर पर ईरान के इस शोक आयोजन में शामिल होते हैं, तो वे अनजाने में ही घरेलू राजनीति में मौजूद उन समर्थकों को एक सकारात्मक संदेश देते हैं, जो ईरान के शीर्ष नेतृत्व के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं। यह कदम भारत की उस स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी (रणनीतिक स्वायत्तता) को भी पुष्ट करता है, जहां भारत अमेरिका और इज़रायल जैसे अपने अन्य रणनीतिक सहयोगियों के साथ संबंधों को प्रभावित किए बिना ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को प्राथमिकता देता है। कहा जा रहा है कि इस यात्रा का व्यापक प्रभाव यह होगा कि यह भारत को वैश्विक स्तर पर एक ऐसे तटस्थ और संतुलित शक्ति के रूप में स्थापित करेगा, जिसकी पहुंच और प्रभावशीलता ईरान जैसे देशों के बीच भी बनी हुई है। हालांकि, देश की आंतरिक राजनीति में यह कदम विपक्षी दलों के लिए एक अवसर भी हो सकता है कि वे भारत की विदेश नीति में ईरान के महत्व को रेखांकित करें और सरकार पर यह दबाव बनाएं कि वह इस संबंध को आगे बढ़ाते हुए अपनी अल्पसंख्यक आबादी की आकांक्षाओं और हितों का भी ध्यान रखे।

बहरहाल, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार और दफन समारोह के लिए ईरान द्वारा भारत को भेजा गया औपचारिक आमंत्रण एक अत्यंत महत्वपूर्ण राजनयिक घटना है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित किया था, जो दोनों देशों के बीच गहरे रणनीतिक और ऐतिहासिक संबंधों का संकेत है। हालांकि, प्रधानमंत्री के पास पहले से निर्धारित अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के चलते भारत सरकार ने एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजने का निर्णय लिया है, जिसमें बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा शामिल हैं। इस आमंत्रण की सबसे दिलचस्प कड़ी वह सूची है, जिसमें मुख्यधारा के कई राजनीतिक दलों के नेताओं को भी आमंत्रित किया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और पार्टी के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा को निमंत्रण मिला है। इसके अतिरिक्त, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती तथा जम्मू-कश्मीर के पाँच शिया धर्मगुरुओं को भी आमंत्रित किए जाने की खबरें हैं।

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ईरान की इस रणनीति के पीछे कई गहरे भू-राजनीतिक निहितार्थ छिपे हैं। सबसे स्पष्ट संदेश यह है कि ईरान भारत के साथ केवल सत्ताधारी दल के साथ ही नहीं, बल्कि भारत की पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था और विविध राजनीतिक स्पेक्ट्रम के साथ अपना जुड़ाव बनाए रखना चाहता है। विपक्षी नेताओं और क्षेत्रीय दिग्गजों को बुलाकर ईरान यह जताना चाहता है कि उसका भारत से संबंध किसी एक सरकार या कार्यकाल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक “राष्ट्र-से-राष्ट्र” का रिश्ता है जो दशकों पुराना है।उधर, कई बड़े राजनीतिक चेहरों और रसूखदार नेताओं को आमंत्रण न मिलना ईरान की एक सधी हुई कूटनीति का हिस्सा माना जा रहा है। ईरान नहीं चाहता कि इस गंभीर शोक आयोजन को किसी प्रकार की घरेलू राजनीतिक खींचतान या अंतरराष्ट्रीय विवादों में घसीटा जाए। निमंत्रण सूची को बेहद चुनिंदा रखना यह भी बताता है कि तेहरान भारत के साथ कूटनीतिक संतुलन बनाने में बहुत सतर्क है।

खैर, ऐसा लगता है कि यह पूरा घटनाक्रम भारत की उस स्थिति को और अधिक जटिल बनाता है, जहां उसे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के साथ आगे बढ़ना होता है। एक तरफ चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाओं के जरिए भारत ईरान के साथ अपने आर्थिक हित सुरक्षित करना चाहता है, तो दूसरी तरफ उसे अमेरिका और इज़रायल के साथ अपने संबंधों का भी संतुलन बनाए रखना है। ईरान का यह आमंत्रण भारत की मल्टी-अलाइनमेंट नीति की एक बड़ी परीक्षा है। कुल मिलाकर, यह कूटनीतिक प्रतिनिधित्व सिर्फ एक अंतिम संस्कार में शामिल होना नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की उस बैलेंसिंग एक्ट की एक कड़ी है, जो उसे एक साथ कई ध्रुवों के साथ संबंध बनाए रखने की अनुमति देती है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह यात्रा ईरान के साथ भारत के द्विपक्षीय व्यापारिक और ऊर्जा सुरक्षा समझौतों को किस तरह नई गति देती है और क्या इसका असर भारत के भीतर रहने वाले ईरान समर्थक समुदाय की राजनीतिक सक्रियता पर कोई बड़ा प्रभाव डालेगा।

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