पासपोर्ट भी नहीं तो फिर क्या? नागरिकता के उलझे तारों में फंसा आम आदमी

Passport
अजय कुमार                             
अजय कुमार

Passport भारत में नागरिकता को लेकर चल रही हालिया बहस ने एक ऐसी गहरी कानूनी और सामाजिक पहेली को जन्म दिया है, जिसे सुलझाना अब आम नागरिक के लिए अनिवार्य हो गया है। हाल ही में विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट सेवा दिवस पर जो स्पष्टीकरण दिया, उसने देश भर के मध्यम वर्ग में खलबली मचा दी है। मंत्रालय ने दो टूक शब्दों में कहा कि पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं। सुनने में यह तकनीकी लगता है, लेकिन इसकी गहराई में उतरने पर पता चलता है कि हमारी पहचान को लेकर जो सुरक्षा का बोध था, वह कितना कच्चा है। आज के दौर में जब हर गली-नुक्कड़ पर घुसपैठियों के फर्जी दस्तावेजों से नागरिकता हासिल करने की खबरें सुर्खियां बन रही हैं, तब यह सवाल पूछना लाजमी है कि आखिर भारत की नागरिकता का असली आधार क्या है? क्या हम उस सुरक्षा चक्रव्यूह में फंसे हैं, जहाँ कागजों की बाजीगरी किसी को भी भारतीय बना सकती है और किसी को भी बेघर? इस पूरी प्रक्रिया के पीछे का ‘नेक्सस’ (गठजोड़) बेहद व्यवस्थित और खतरनाक है। बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के मामले में जो पैटर्न सामने आया है, वह बताता है कि कैसे स्थानीय मदद से पहले आधार कार्ड बनवाया जाता है, फिर उसके आधार पर वोटर आईडी और अंत में पासपोर्ट। हाल के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि केवल 2025 में ही भारत ने करीब 1.39 करोड़ पासपोर्ट जारी किए। इतनी बड़ी संख्या में पासपोर्ट जारी करने वाली मशीनरी के भीतर जब फर्जीवाड़े की गुंजाइश बचती है, तो वह राष्ट्रीय सुरक्षा को सीधे चुनौती देती है।

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घुसपैठिये अक्सर स्थानीय बिचौलियों की मदद से उन इलाकों में अपनी जड़ें जमाते हैं जहाँ दस्तावेज बनवाना आसान होता है। एक बार आधार बन गया, तो वह नाम और पते की पहचान बन जाता है। इसी पहचान के दम पर वे वोटर लिस्ट में अपना नाम दर्ज कराते हैं और फिर ‘भारत के नागरिक’ के रूप में पासपोर्ट के लिए आवेदन कर देते हैं। इस पूरे खेल में पुलिस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया भी कभी-कभी सतही साबित होती है, जिसका फायदा उठाकर ये लोग भारतीय होने का कानूनी मुखौटा पहन लेते हैं।

कानूनी रूप से यह स्थिति और भी पेचीदा है। 1955 का नागरिकता कानून स्पष्ट करता है कि नागरिकता जन्म, वंश, पंजीकरण या प्राकृतिक तरीके से मिलती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि देश की 99.99 फीसदी आबादी के पास कोई ऐसा ‘सिंगल कार्ड’ नहीं है जिसे वे ‘नागरिकता का प्रमाण पत्र’ कह सकें। आधार कार्ड नागरिकता नहीं देता, यह केवल निवास का प्रमाण है, जिसे सुप्रीम कोर्ट से लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट तक ने कई बार दोहराया है। वोटर आईडी भी केवल चुनावी सूची का हिस्सा होने का प्रमाण है। जब विदेश मंत्रालय यह कहता है कि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो वह केवल कानून का पाठ पढ़ा रहा होता है, लेकिन एक आम नागरिक के लिए यह बयान उसकी पूरी अस्मिता पर प्रहार जैसा महसूस होता है। इस बहस की कड़ियों को अगर 2019 के सीएए-एनआरसी के दौर से जोड़कर देखें, तो डर स्वाभाविक है। उस समय सरकार ने कहा था कि जन्म की तारीख और जन्म स्थान से जुड़े दस्तावेज जमा करके नागरिकता साबित की जा सकती है, लेकिन कोई तय लिस्ट जारी नहीं की गई थी। अब अगर भविष्य में देशव्यापी एनआरसी लागू होता है, तो वह ‘पासपोर्ट धारी’ नागरिक भी सकते में है जिसे लगता था कि उसके पास सरकार का ही दिया दस्तावेज है। सच तो यह है कि पासपोर्ट अधिनियम 1967 के तहत भी केंद्र सरकार कुछ मामलों में गैर-नागरिकों को भी यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है। यानी, आपके हाथ में मौजूद पासपोर्ट आपकी भारतीयता का दावा तो करता है, लेकिन किसी कानूनी विवाद या NRC  जैसी प्रक्रिया के दौरान वह आपको ‘अंतिम नागरिक’ घोषित करने की गारंटी नहीं देता।

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यही वह जगह है जहाँ आम आदमी के लिए सबसे बड़ा संकट खड़ा होता है। जब तक आप पर कोई कानूनी आंच नहीं आती, तब तक पासपोर्ट, आधार और वोटर आईडी के साथ आप पूरे भारत में स्वतंत्र घूम सकते हैं। लेकिन, अगर कभी ‘कागज दिखाने’ की नौबत आई जैसा कि असम में हुआ तो वहां के 19 लाख से अधिक लोगों के आवेदन खारिज हो गए थे। असम एनआरसी की प्रक्रिया ने दिखाया कि कैसे दशकों से रह रहे लोग भी सरकारी फाइलों में ‘विदेशी’ हो सकते हैं यदि उनके पास 1971 से पहले की लीगेसी (विरासत) के ठोस दस्तावेज न हों। भारत के बाकी हिस्सों में स्थिति थोड़ी अलग है, लेकिन कानूनी ढांचा वही है। यदि पासपोर्ट को ही अंतिम प्रमाण नहीं माना जा रहा, तो वह साधारण गरीब व्यक्ति क्या करेगा जिसके पास स्कूल का सर्टिफिकेट नहीं है, जिसके पास पैतृक जमीन के पुराने रिकॉर्ड नहीं हैं, और जो केवल एक सामान्य पासपोर्ट या आधार के सहारे अपना जीवन बिता रहा है? यह विवाद केवल कागजों का नहीं है, यह उस भरोसे का है जो एक नागरिक का अपनी सरकार के साथ होता है। विपक्षी दल इसे राजनीति से जोड़ रहे हैं, जबकि सरकार इसे कानूनी प्रक्रिया बता रही है। लेकिन इस बहस के बीच में जो ‘सच्चाई’ दबी हुई है, वह यह है कि भारत में नागरिकता ‘अधिकार’ से ज्यादा ‘सिद्ध करने की जिम्मेदारी’ बन गई है। फॉरेनर्स एक्ट 1946 की धारा 9 के तहत सबूत पेश करने का जिम्मा नागरिक का है, राज्य का नहीं। यानी, राज्य कभी भी आपसे आपकी नागरिकता मांग सकता है, और उस दिन पासपोर्ट या आधार केवल मददगार साबित हो सकते हैं, निर्णायक नहीं।

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अंततः नागरिकता का असली प्रमाण तो वही ‘जन्म की श्रंखला’ है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। लेकिन आधुनिक दौर की भीड़भाड़ और फर्जीवाड़े के बीच, सरकार का यह स्पष्टीकरण एक चेतावनी भी है अपने पुराने दस्तावेजों को सहेज कर रखें। सिर्फ एक कार्ड के भरोसे न रहें। जिस तरह घुसपैठिये नेक्सस का इस्तेमाल कर सिस्टम में घुस रहे हैं, उससे निपटने के लिए सरकार भले ही कड़े नियम बनाए, लेकिन उस चक्कर में आम नागरिक को एक ऐसी अंतहीन कागजी दौड़ में नहीं धकेला जाना चाहिए जिसका कोई अंत न हो। पासपोर्ट आपकी राष्ट्रीयता की पहचान है, और इसे और अधिक मजबूत व सुरक्षित बनाना विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी है ताकि फर्जी पासपोर्ट के आधार पर कोई भी इस देश का नागरिक न बन सके। आखिर में, भारतीयता सिर्फ कागजों की मोहताज नहीं है, पर इस डिजिटल युग में कागज ही आपकी पहचान की नींव हैं। इस नींव को मजबूत रखना, आज हर भारतीय की अपनी सुरक्षा के लिए पहली शर्त बन गई है।

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