शिक्षा के मंदिर में ‘कोचिंग वॉर’ और दांव पर लगता मासूम छात्रों का भविष्य

Coaching War
अजय कुमार                             
अजय कुमार

Coaching War बिहार के पटना का मुसल्लहपुर हाट इलाका देश भर में प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों की उम्मीदों का केंद्र माना जाता है। लेकिन हाल ही में इस इलाके से जो तस्वीरें और खबरें सामने आईं, उसने न केवल शिक्षा के इस मंदिर को शर्मसार किया है बल्कि बिहार की गौरवशाली ज्ञान परंपरा पर भी एक गहरा धब्बा लगा दिया है। जिन गलियों में सुबह से शाम तक किताबों के बंडल, पेन और कॉपियां दिखाई देती थीं, वहां अचानक पत्थरबाजी, लाठी-डंडे और हवाई फायरिंग की गूंज सुनाई देने लगी। यह विवाद महज दो कोचिंग संस्थानों की आपसी लड़ाई नहीं है, बल्कि यह शिक्षा के नाम पर चल रहे करोड़ों रुपये के उस बाजार का नग्न प्रदर्शन है, जहां छात्रों का भविष्य दांव पर लगाकर सिर्फ और सिर्फ भीड़ और वर्चस्व की जंग लड़ी जा रही है। इस तथाकथित ‘कोचिंग वॉर’ ने यह साबित कर दिया है कि जब शिक्षा व्यवसाय बन जाती है, तो नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का पतन किस कदर होता है।

इस पूरे बवाल की शुरुआत बेहद मामूली और बचकानी वजह से हुई, जिसे जानकर किसी भी सभ्य समाज का सिर घोर निराशा से झुक जाएगा। बताया जा रहा है कि एक कोचिंग संस्थान की ओर से बिहार पुलिस भर्ती परीक्षा में करीब 12 हजार छात्रों के सफल होने का दावा करते हुए बड़े-बड़े पोस्टर और बैनर लगाए गए थे। आरोप है कि यह पोस्टर प्रतिद्वंद्वी कोचिंग संस्थान के साइन बोर्ड के ऊपर या उसके बेहद करीब चिपका दिए गए। इसके बाद वर्चस्व की इस जंग में सीढ़ियां लगाकर बैनर फाड़ने का सिलसिला शुरू हुआ। पोस्टर फाड़े जाने की इस छोटी सी चिंगारी ने देखते ही देखते एक ऐसी आग का रूप ले लिया, जिसने पूरे इलाके के सुरक्षा तंत्र और कानून व्यवस्था को हिलाकर रख दिया। दो पक्षों के समर्थक आमने-सामने आ गए, लाठियां चलीं, ईंट-पत्थरों की बौछार हुई और देखते ही देखते वह परिसर कुरुक्षेत्र के मैदान में तब्दील हो गया जहां हजारों छात्र अपने सुनहरे कल का सपना बुनने आते हैं।

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घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया के महारथी और लाखों युवाओं के आदर्श बने शिक्षक फैजल खान उर्फ खान सर ने मीडिया के सामने आकर बेहद सनसनीखेज दावे किए। उन्होंने कैमरे के सामने पूरी गंभीरता से कहा कि उनके कोचिंग सेंटर पर हमला हुआ है और उन्होंने अपनी आंखों से एक-दो नहीं बल्कि आठ से दस राउंड फायरिंग होते हुए देखी है। एक शिक्षक के मुंह से इस तरह की बात सुनकर पूरे राज्य के अभिभावकों और छात्रों में दहशत फैल गई। लेकिन जब कानून के रक्षकों ने इस मामले की तहकीकात शुरू की और घटनास्थल के साथ-साथ आसपास की गलियों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालनी शुरू की, तो कहानी पूरी तरह पलट गई। पुलिस की शुरुआती जांच में दूर-दूर तक गोली चलने या किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा फायरिंग करने का कोई सबूत नहीं मिला। इसके उलट, सीसीटीवी में यह साफ दिखाई दिया कि खान सर के अपने ही सुरक्षा गार्ड हवा में हथियार लहराते और हमला करते नजर आ रहे थे। इस खुलासे के बाद पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए उन दोनों गार्डों को हिरासत में ले लिया और खुद खान सर को भी देर रात लंबी पूछताछ का सामना करना पड़ा।

हैरानी की बात यह है कि जो शिक्षक रात में अपनी आंखों से गोलियां बरसने की गवाही दे रहे थे, सुबह होते-होते उनके सुर पूरी तरह बदल गए। वे अपने ही दावों से यू-टर्न लेते हुए यह कहने लगे कि अब पुलिस की जांच के बाद ही असलियत का पता चलेगा या फिर जब उनका घायल गार्ड ठीक होकर आएगा तब वह सच बताएगा। एक शिक्षक के बयानों में ऐसा विरोधाभास और तथ्यों को लेकर इतनी बड़ी लापरवाही बेहद चिंताजनक है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कभी कहा था कि शिक्षक वह नहीं है जो केवल दिमाग में तथ्य ठूंसे, बल्कि वह है जो छात्र को सत्य की खोज के लिए तैयार करे। लेकिन आज के डिजिटल युग के इन तथाकथित ‘गुरुओं’ के तथ्य और सत्य दोनों ही गंभीर संदेह के घेरे में आ गए हैं।

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इस विवाद का दूसरा पहलू और भी भयावह है। फैजल खान की शिकायत पर पुलिस ने ज्ञान बिंदु कोचिंग के डायरेक्टर रौशन आनंद को फौरन गिरफ्तार कर लिया। रौशन आनंद बिहार के एक बेहद साधारण किसान परिवार से आते हैं और उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर इस क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई थी। उनकी गिरफ्तारी के बाद पटना की सड़कों पर एक नया ड्रामा शुरू हो गया। रौशन आनंद के समर्थन में हजारों की संख्या में छात्र सड़कों पर उतर आए और उग्र प्रदर्शन करने लगे। छात्रों का आरोप है कि खान सर ने राजनीतिक और व्यावसायिक रंजिश के तहत उनके गुरु पर झूठे आरोप लगाए हैं। सोचिए, जिन नौजवानों को इस वक्त कमरों में बंद होकर परीक्षा की तैयारी करनी चाहिए थी, वे अपने-अपने पसंदीदा शिक्षकों के अंधविश्वास में सड़कों पर नारेबाज़ी कर रहे हैं और कानून को हाथ में लेने पर आमादा हैं। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आज के ये मशहूर यूट्यूब शिक्षक बच्चों को बेहतर नागरिक बनाने के बजाय अपने निजी स्वार्थ के लिए एक ‘ट्रोल आर्मी’ और हिंसक भीड़ में तब्दील कर रहे हैं।

यह पहली बार नहीं है जब पटना की धरती पर कोचिंग संचालकों के कारण इस तरह का उपद्रव हुआ हो। इतिहास गवाह है कि साल 2019 में भी इसी मुसल्लहपुर इलाके में वर्चस्व को लेकर बमबाजी की घटना हुई थी। उस वक्त भी दोनों तरफ से मुकदमे दर्ज हुए थे, लेकिन ठोस कार्रवाई न होने के कारण इन दुकानदारों के हौसले बुलंद रहे। इस साल भी सरस्वती पूजा के मौके पर इसी तरह के हिंसक टकराव की खबरें आई थीं। अगर समय रहते पुलिस और प्रशासन ने इन व्यावसायिक संस्थानों पर नकेल कसी होती, तो आज यह नौबत नहीं आती। सवाल यह उठता है कि क्या हम अपने बच्चों को इन कोचिंग सेंटरों में इसलिए मोटी फीस देकर भेजते हैं कि वे वहां से लहूलुहान होकर लौटें? अगर यह पत्थरबाजी दिन के वक्त होती, जब हजारों छात्र क्लास में मौजूद होते हैं, और किसी मासूम के सिर पर वह पत्थर लग जाता, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता? क्या ये शिक्षक अपनी अकूत संपत्ति और टीआरपी के नशे में किसी बच्चे की जान की कीमत चुका पाते?

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इस पूरे खेल का सबसे कड़वा सच आर्थिक हितों का टकराव है। अक्सर यह प्रचारित किया जाता है कि कुछ शिक्षक बहुत कम पैसे में समाज सेवा कर रहे हैं। लेकिन जब दोनों संस्थानों के फीस स्ट्रक्चर की तुलना की जाती है, तो असलियत कुछ और ही निकलती है। जहां दो साल के ऑफलाइन कोर्स के लिए एक संस्थान किस्तों में दस हजार रुपये लेता है, वहीं दूसरा संस्थान एकमुश्त बीस हजार रुपये वसूलता है। ऑनलाइन कोर्सेस में भी फीस का अंतर जमीन-आसमान का है। जाहिर है, यह पूरी लड़ाई किसी शिक्षा सुधार या गरीब बच्चों के कल्याण के लिए नहीं है, बल्कि यह अधिक से अधिक छात्रों को अपनी ओर खींचने और करोड़ों रुपये का टर्नओवर खड़ा करने की कॉरपोरेट जंग है।

अब इस मामले ने पूरी तरह से कानूनी मोड़ ले लिया है। पटना पुलिस ने कदमकुआं थाने में खान ग्लोबल स्टडीज के संचालक फैजल खान के खिलाफ आर्म्स एक्ट और भ्रामक जानकारी फैलाने की संगीन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कर ली है। हालांकि, एफआईआर दर्ज होने के बाद खान सर ने बड़ी ही चतुराई से बयान दिया कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है और उनके गार्डों ने जो कुछ भी किया, वह आत्मरक्षा में किया था। वे कानून का सम्मान करने की बात तो कर रहे हैं, लेकिन अतीत में उनका रिकॉर्ड कुछ और ही बयां करता है। चाहे वह रेलवे परीक्षा के दौरान छात्रों को उग्र आंदोलन के लिए भड़काना हो, बीपीएससी परीक्षा के समय अभद्र भाषा का प्रयोग करना हो या फिर हाल ही में नीट पेपर लीक मामले में एनकाउंटर जैसे उत्तेजक बयान देकर माहौल खराब करना हो, विवादों से उनका पुराना नाता रहा है।

जब कोई मुख्यधारा का माध्यम इन कोचिंग संस्थानों की इस खतरनाक कार्यप्रणाली और उनके गिरते स्तर पर सवाल उठाता है, तो ये यूट्यूब शिक्षक अपने लाखों फॉलोअर्स का इस्तेमाल करके डिजिटल लिंचिंग शुरू कर देते हैं। सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स की एक फौज छोड़ दी जाती है, जो मर्यादा की सारी सीमाएं लांघकर गाली-गलौज पर उतर आती है। इंटरनेशनल प्रेस फ्रीडम जैसी विदेशी एनजीओ की रैंकिंग का हवाला देकर देश की पत्रकारिता को बदनाम करने की कोशिश की जाती है, जबकि वे खुद यह भूल जाते हैं कि वे शिक्षा के नाम पर कौन सा अनैतिक धंधा चला रहे हैं। लेकिन सच को दबाया नहीं जा सकता। पटना की इस घटना ने साफ कर दिया है कि शिक्षा के इन आधुनिक कुरुक्षेत्रों में अब ज्ञान की नहीं, बल्कि बंदूकों और पत्थरों की भाषा बोली जा रही है। सरकार और प्रशासन को अब बिना किसी दबाव के इन कोचिंग माफियाओं के खिलाफ ऐसी सख्त कानूनी कार्रवाई करनी होगी, जो मिसाल बन सके, ताकि बिहार का कोई और होनहार छात्र इस गंदे व्यावसायिक खेल की बलि न चढ़े।

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