यादों से विमुख होता समाज: क्या हम अपनी स्मृतियाँ खो रहे हैं?

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शाश्वत तिवारी
शाश्वत तिवारी

India जिन पुरखों के गीत- गाते हम थकते नहीं, उनकी यादों को सुरक्षित रखने में हमारी दिलचस्पी कतई उत्साहजनक नहीं है। हमारे यहाँ त्योहारों पर ‘पूर्वजों का आशीर्वाद’ मांगा जाता है। शादियों में कुल-देवता को याद किया जाता है। भाषणों में शहीद भगत सिंह, महात्मा गांधी, अटल बिहारी बाजपेई  के नाम गूंजते हैं। पर जब बात आती है उन पूर्वजों की स्मृतियों को, उनकी वस्तुओं को, उनके संघर्षों के दस्तावेजों को सहेजने की, तब हमारी सामूहिक चेतना एकदम मौन हो जाती है। हम स्मृति-पूजक समाज से स्मृति-विरोधी समाज में बदल रहे हैं। स्मृति-विरोध का मतलब इतिहास भूल जाना नहीं है। इतिहास किताबों में दर्ज है। स्मृति-विरोध है- जीवित यादों (स्मृति) से रिश्ता तोड़ देना। हम इतिहास की जयंतियाँ तो मनाते हैं, पर स्मृति के स्रोत खोते जा रहे हैं। पिछली पीढ़ी तक घरों में ‘पुश्तैनी कमरा’ होता था। उसमें पीतल के बर्तन, हाथ की चक्की, बाप-दादा की पगड़ी, शादी का जोड़ा, चिट्ठियों का पुलिंदा। आज फ्लैट कल्चर में पहला काम होता है ‘डिक्लटर’ करना। OLX पर ‘एंटीक’ बेच दिए जाते हैं। कबाड़ीवाले को 20 किलो के भाव रद्दी दे दी जाती है, उसी रद्दी में आज़ादी के आंदोलन के पर्चे, बंटवारे के समय लिखी डायरियाँ, नेहरू-युग के राशन कार्ड होते हैं। भारतीय संग्रहालयों में 90% सामग्री दान से नहीं, खरीद से आती है। क्योंकि परिवार देना नहीं चाहते। नेशनल आर्काइव्स बार-बार कहता है,  आपके पास पुराने दस्तावेज हों तो हमें दें। जिसमें आज की पीढ़ी की कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। हमारे शहर ‘विकास’ के नाम पर अपनी स्मृति मिटा रहे हैं। दिल्ली में हवेलियाँ तोड़कर मॉल बन रहे हैं। लखनऊ के इमामबाड़ों के पीछे प्लास्टिक का कचरा है। बनारस की गलियाँ अब ‘सेल्फी पॉइंट’ हैं, अब, वहाँ 300 साल से रहने वाले ताना-बाना बुनने वाले का नाम कोई नहीं पूछता।

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गाँव में तालाब पट गए, पीपल कट गया, चौपाल पर अब Jio का टावर है। बुज़ुर्ग बताते हैं, ‘यहाँ फाँसी का पेड़ था, 1857 में मंगल पांडे के साथियों को लटकाया था’, पर वहाँ अब कोई पट्टिका नहीं। स्मृति को ज़मीन चाहिए होती है। हम ज़मीन बेच रहे हैं।
भारत का इतिहास 80% मौखिक रहा है। पंडवानी, बिरहा, आल्हा, ओपुनिया गीत, जनजातीय कथाएँ। YouTube आने से पहले ये दादी-नानी की गोद में, खेत की मेड़ पर, चाय की दुकान पर ज़िंदा थीं। अब परिवार ‘न्यूक्लियर’ हैं। बच्चे दादा-दादी से दूर। स्कूल में ‘प्रोजेक्ट’ के लिए Wikipedia काफी है। नतीजा: UNESCO कहता है कि 197 भारतीय भाषाएँ संकट में हैं। भाषा गई तो उसके साथ हज़ार साल की कहावतें, इलाज के नुस्खे, खेती के पैटर्न, मौसम का ज्ञान भी गया। विडंबना देखिए, हमारे पास संजोने के सबसे ज़्यादा साधन आज हैं। फोन में स्कैनर है, क्लाउड है, फ्री स्टोरेज है। पर हम 10 साल पुराने फोटो ‘स्टोरेज फुल’ कहकर डिलीट कर देते हैं।

‘डिजिटल डार्क एज’ आ चुका है। 2005 की CD अब चलती नहीं। इंस्टाग्राम के पोस्ट, Facebook के शुरुआती नोट्स, सब गया। हार्ड-डिस्क क्रैश हुई तो तीन पीढ़ियों की शादियों की एल्बम गई। हम ‘सेव’ करना भूल गए, सिर्फ ‘शेयर’ करना सीखा। आधुनिकता ने हमें सिखाया, आगे देखो। ‘आगे बढ़ो’। ‘Move on’। स्मृति पीछे खींचती है। कॉर्पोरेट कल्चर कहता है, ‘Don’t be emotional about old ways’। नतीजा: पुरानी फैक्ट्री बंद करो, पुराना स्टाफ हटाओ, पुराना फर्नीचर फेंको। यही तर्क घरों में घुस गया। माँ की सिलाई मशीन ‘जगह घेरती है’। पिता की साइकिल ‘बेकार कबाड़’ है। स्मृति बिकती नहीं। नई चीज़ बिकती है। इसलिए हर दिवाली पर ‘पुराना दो, नया लो’ स्कीम आती है। AC, फ्रिज, फोन, सबकी उम्र 3 साल तय कर दी गई है। जब वस्तुओं की उम्र ही नहीं, तो वस्तुओं से जुड़ी यादों की उम्र कैसे होगी? त्योहार भी ‘इवेंट’ बन गए। पहले करवा चौथ में सास पुरानी छलनी देती थी, 50 साल पुरानी, उसमें चार पीढ़ियों की मेहंदी की खरोंच। अब Amazon से ‘डिज़ाइनर छलनी’ आती है। स्मृति का सप्लाई चेन टूट गया।

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स्मृति बोझ लगने लगी है क्योंकि हमने पहचान को ‘प्रोजेक्ट’ बना दिया। Instagram पर हमें ‘कूल’ दिखना है। वहाँ बाप का हल, माँ की चर्खी, गाँव का कच्चा घर ‘एस्थेटिक’ नहीं लगता। इसलिए हम अतीत को क्रॉप कर देते हैं। राजनीति ने भी स्मृति को हथियार बना दिया। अब पूर्वजों को याद करना भी ‘पक्ष’ लेने जैसा है। तो आम आदमी चुप रहना बेहतर समझता है। चुप्पी धीरे-धीरे विस्मृति बन जाती। 1950 में हमने बांध बनाए, विस्थापन हुआ, सीखा नहीं। 2026 में स्मार्ट सिटी बना रहे हैं, फिर विस्थापन कर रहे हैं, फिर वही दर्द। क्योंकि फाइलों में ‘प्रोजेक्ट रिपोर्ट’ है, ‘मानव रिपोर्ट’ नहीं। बुज़ुर्गों से पूछा नहीं कि बाढ़ में पानी कहाँ तक आता था। नतीजा, हर साल शहर डूबते हैं।

मनोविज्ञान कहता है, जिन परिवारों में ‘इंटरजेनेरेशनल सेल्फ’ मज़बूत होती है, यानी बच्चे अपने दादा-परदादा के संघर्ष की कहानी जानते हैं, वे बच्चे तनाव बेहतर झेलते हैं। हम कहानी सुनाना बंद कर चुके। इसलिए पहली असफलता पर युवा टूट जाता है। उसे लगता है, ‘मेरे साथ ही क्यों’। उसे पता नहीं कि उसके परदादा ने दो अकाल, एक महामारी, एक बंटवारा देखा था।
जब स्मृति नहीं, तो संस्कृति सिर्फ कपड़े और खाना बचती है। योग ‘फिटनेस’ है, आयुर्वेद ‘प्रोडक्ट’ है, लोकगीत ‘रील का BGM’ है। जड़ कट गई, पत्ते हवा में उड़ा रहे हैं। यह काम सरकार नहीं करेगी। सरकार म्यूज़ियम बना सकती है, पर म्यूज़ियम में रखी चीज़ ‘मृत’ होती है। स्मृति को ‘जीवित’ रखना समाज का काम है। हर परिवार एक ‘स्मृति-बॉक्स’ रखे। उसमें 20 आइटम, सबसे पुराना फोटो, कोई चिट्ठी, एक बर्तन, स्कूल का रिपोर्ट कार्ड, पहला वेतन की स्लिप। हर साल दिवाली पर बॉक्स खोलें, बच्चों को कहानी सुनाएँ। बॉक्स का डिजिटल बैकअप रखें। 20 चीज़ें संभालना मुश्किल नहीं। RWA हर साल एक शाम ‘बुज़ुर्ग चौपाल’ रखे। 70+ उम्र के लोग 5 मिनट में अपना गाँव, पहला स्कूल, पहली नौकरी याद करें। इसे रिकॉर्ड करें, YouTube पर ‘मोहल्ला पुराण’ चैनल बनाएँ। लखनऊ के 100 मोहल्ले अगर 1000 कहानी रिकॉर्ड कर दें, तो शहर का मौखिक आर्काइव तैयार हो जाएगा। इतिहास के 10 अंक ‘फैमिली आर्काइव’ पर हों। बच्चा नाना की 1962 के युद्ध की पोस्टिंग, या माँ की 1991 में पहली कंप्यूटर क्लास की कॉपी खोजकर लाए। स्कैन करके स्कूल के क्लाउड पर डाले। 10 साल में हर जिले का ‘बचपन का आर्काइव’ बन जाएगा। गूगल फोटो में ‘सर्च’ करें, ‘पापा की जवानी’। एल्गोरिदम चेहरा पहचान लेगा। पर चेहरा के पीछे की कहानी आपको डालनी पड़ेगी। हर फोटो पर 2 लाइन कैप्शन, ‘1983, स्कूटर खरीदने के दिन, मम्मी नाराज़ थीं’। यही मेटाडेटा कल पोते के काम आएगा।

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जापान में ‘किंत्सुगी’ है, टूटे बर्तन को सोने से जोड़ना। दरार छिपाते नहीं, सुंदरता बनाते हैं। हम भी पुरानी कुर्सी फेंकने से पहले सोचें, क्या इसके पाये पर बाप के निशान हैं? रिपेयर कर दें। चीज़ बचेगी तो कहानी बचेगी। कुतुब मीनार ईंटों से नहीं, समय से बनी है। ताजमहल संगमरमर से नहीं, याद से बना है। जिस दिन हम याद को ‘बेकार का कबाड़’ समझ लेंगे, उस दिन हम इमारतें तो बना लेंगे, तहज़ीब नहीं बना पाएँगे। पुरखों के गीत गाना आसान है। मुश्किल है उनके कंधे पर रखा हल उठाना, उनकी लिखी डायरी की जिल्द चढ़ाना, उनके नाम की पट्टिका पर जमी धूल पोंछना। स्मृति-विरोधी समाज तेज़ भाग सकता है, पर दूर नहीं जा सकता। क्योंकि जिसे पता ही न हो कि वो कहाँ से चला था, वो तय नहीं कर पाएगा कि जाना कहाँ है। तो अगली बार जब घर की सफाई करें, तो एक बार रुककर पूछें, क्या मैं सामान फेंक रहा हूँ, या अपनी कहानी का एक पन्ना फाड़ रहा हूँ? जवाब में ही हमारे समाज का भविष्य छिपा है।

(लेखक, विचारक एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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