गंगोत्री से गंगासागर तक वेग के साथ बढ़ती BJP की ‘हिंदूधारा’

हिंदूधारा
संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

पश्चिम बंगाल में जीत के बाद एक नया ट्रेंड दिखाई दे रहा है। पहले जो BJP कहा करती थी कि हमें मुसलमानों का वोट नहीं मिलता है, अब वही BJP खुलेआम कहती है कि वह हिंदुओं के वोट से चुनाव जीती है। इसके साथ ही यह भी जोड़ देती है कि जो हमारे साथ था, हम उसके साथ हैं। जबकि इससे पहले मोदी कहा करते थे ‘सबका साथ, सबका विकास’। सवाल यह है कि क्या अब BJP बदल रही है? BJP लगातार हिंदूधारा के सहारे आगे बढ़ती जा रही है। हिंदुओं को एकजुट करने के लिए BJP का यह चुनावी मंत्र कहीं उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के PDA की धार तो कुंद नहीं कर देगा, जैसा 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में देखा जा चुका है। कहीं ऐसा न हो कि 2024 के लोकसभा चुनाव में PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के सहारे भाजपा को काफी हद तक रोकने में सफल रहे सपा प्रमुख अखिलेश यादव का यह फार्मूला 2027 में धराशायी हो जाए। वैसे भी हर चुनाव में वोटरों की सोच बदलती रहती है। राजनीति में कोई भी फार्मूला हमेशा के लिए हिट नहीं होता है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि पश्चिम बंगाल में BJP की शानदार जीत ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। वहां की सड़कों पर उत्सव मनाते कार्यकर्ता चिल्ला रहे हैं कि हम हिंदुओं के वोटों से जीते। पहले जहां BJP कहती थी कि मुसलमानों का वोट हमें नहीं मिलता, अब वही दल खुलकर स्वीकार कर रहा है कि हिंदू भाइयों के बल पर हमने सत्ता की कुर्सी हासिल की। साथ ही जोर देकर कहते हैं कि जो हमारे साथ रहा, हम उसके साथ हैं। यह नया सुर सुनकर सवाल उठता है कि क्या BJP अपना रास्ता बदल रही है? प्रधानमंत्री का पुराना नारा तो था ‘सबका साथ, सबका विकास’, लेकिन अब लगता है हिंदू एकजुटता का जाप जोर पकड़ रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह बदलाव अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले को चुनौती दे सकता है। दोबारा देखें तो 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में यही हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण सपा को पटखनी दे चुका है, तो क्या 2024 के लोकसभा चुनाव में सफल रहा PDA का जादू अब फीका पड़ जाएगा?

बहरहाल, पश्चिम बंगाल में हुई जीत कोई साधारण घटना नहीं है। वहां BJP ने टीएमसी के किले को हिलाकर रख दिया। कार्यकर्ता खुशी से फूले नहीं समा रहे। वे मंचों पर चढ़कर घोषणा कर रहे हैं कि हिंदू भाइयों ने हमें चुना, इसलिए हम उनके हितों की रक्षा करेंगे। पहले BJP पर इल्जाम लगता था कि वह मुसलमान वोटों से वंचित है। अब उसी दल के नेता बिना झिझक कह रहे हैं कि हिंदुओं की एकजुटता ही हमारी ताकत है। जो हमारे साथ खड़ा हुआ, हम उसी के साथ खड़े रहेंगे। यह बातें सुनकर विपक्षी दल सन्न रह गए। तृणमूल कांग्रेस तो पहले से ही आरोप लगाती रही है कि BJP ध्रुवीकरण की राजनीति करती है, लेकिन अब BJP खुद इसे स्वीकार कर रही है। क्या यह रणनीति का नया मोड़ है? पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में, जहां हिंदू आबादी बहुमत में है लेकिन बिखरी हुई रही, वहां यह नारा काम कर गया। अब सवाल यह है कि क्या यही नारा उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी धमाल मचाएगा?

Akhilesh yadav
Akhilesh yadav

उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से ही जटिल रही है। यहां वोट बैंक की गणित बड़ी बारीकी से सेट होती है। अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव में PDA का फार्मूला अपनाया। पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एकजुट कर BJP को कड़ी टक्कर दी। सपा ने समाजवादी नीतियों के साथ गठबंधन की ताकत दिखाई। कई सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन विधानसभा चुनावों का इतिहास कुछ और कहता है। 2017 में BJP ने हिंदू कार्ड खेला। राम मंदिर का मुद्दा उठाया। गोरखपुर से बनारस तक हिंदू एकता का नारा गूंजा। नतीजा, सपा-बसपा गठबंधन धूल चाट गया। फिर 2022 में भी यही हुआ। योगी आदित्यनाथ ने बुलडोजर की राजनीति से अपराधियों पर नकेल कसी। हिंदू वोट सिमटे। सपा का PDA फार्मूला फेल हो गया। अखिलेश यादव पिछड़ों को जोड़ने की कोशिश करते रहे, लेकिन हिंदू ध्रुवीकरण ने सब बर्बाद कर दिया। अब पश्चिम बंगाल की जीत के बाद BJP फिर वही पुराना हथियार उठा रही है। क्या अखिलेश का PDA फिर कुंद पड़ जाएगा? जानकार कहते हैं कि राजनीति में वोटरों की सोच बदलती रहती है। हर चुनाव अलग कहानी लिखता है। कोई फार्मूला हमेशा हिट नहीं होता। 2014 में मोदी लहर चली। ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा गूंजा। विकास, राष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम ने कांग्रेस को धराशायी कर दिया। लेकिन 2019 में राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा हावी रहा। पुलवामा हमला और बालाकोट स्ट्राइक ने हिंदू राष्ट्रवाद को पंख दिए। 2024 में विपक्ष ने एकता दिखाई। इंडिया गठबंधन बना। उत्तर प्रदेश में PDA ने कमाल कर दिया। सपा ने कहा कि हम सबको साथ लेंगे। यादव, मुस्लिम और दलित को जोड़ा। कुछ हद तक सफल रहे। लेकिन अब BJP बंगाल मॉडल को यूपी में आजमाने को तैयार है। वहां हिंदू वोटों से जीतकर उत्साहित नेता कह रहे हैं कि यही फार्मूला राष्ट्रीय स्तर पर चलेगा। उत्तर प्रदेश में हिंदू आबादी करीब 80 प्रतिशत है। अगर ये एकजुट हो गए, तो PDA का क्या होगा?

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BJP के नेता अब खुलकर कह रहे हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी पर हमला बोला गया कि वे हिंदू विरोधी हैं, इसलिए हिंदुओं ने हमें चुना। अब उत्तर प्रदेश में भी योगी आदित्यनाथ ऐसा ही करेंगे। बुलडोजर अब भी खड़ा है। कानून-व्यवस्था का डर दिखाकर हिंदू वोट साधे जाएंगे। अखिलेश यादव को चुनौती दी जाएगी कि तुम्हारा PDA सिर्फ वोट लेने का धंधा है। हम हिंदुओं के सच्चे हितैषी हैं। मंदिर-मस्जिद विवाद फिर गरमाएगा। अयोध्या राम मंदिर का श्रेय लिया जाएगा। काशी और मथुरा पर नजर रखी जाएगी। क्या अल्पसंख्यक वोट सपा के पास टिकेंगे? या डर से बिखर जाएंगे? 2017 और 2022 में यही हुआ था। मुसलमान वोट सपा को मिले, लेकिन हिंदू BJP के पाले में चले गए।

अब 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। BJP बंगाल का जाप यूपी में गूंजाएगी। अखिलेश यादव की मुश्किल बढ़ सकती है। उनका PDA पिछड़ों को लुभाने का प्रयास है। लेकिन हिंदू ध्रुवीकरण में ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य सब BJP की गोद में चले जाते हैं। दलित भी कभी-कभी बहुजन समाज पार्टी से नाराज होकर BJP की ओर झुक जाते हैं। 2024 में सपा ने ब्राह्मण चेहरों को आगे किया। कुछ सफलता मिली। लेकिन अगर BJP कहे कि हम हिंदू एकता के लिए लड़ रहे हैं, तो ब्राह्मण वोट फिसल सकते हैं। यादव भाईचारे पर सपा निर्भर है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में हिंदू भावना भड़क सकती है। अखिलेश को नया जवाब ढूंढना होगा। शायद विकास और रोजगार पर जोर दें या गठबंधन मजबूत करें। लेकिन राजनीति में वोटर का मन बदलता है। पश्चिम बंगाल ने दिखा दिया कि हिंदू नारा कितना कारगर है। विपक्षी दलों को भी सोचना होगा। कांग्रेस और अन्य दल BJP के इस नए सुर से परेशान हैं। वे कहते हैं कि यह संविधान विरोधी है। लेकिन जनता क्या सोचेगी? इस पर उत्तर प्रदेश के गांवों में चाय की दुकानों पर बहस छिड़ जाएगी। कोई कहेगा BJP सही कह रही है, हिंदू एकजुट हो जाओ। कोई बोलेगा अखिलेश सबको साथ लेकर चलेगा। चुनावी रणनीति बदल रही है। BJP का ‘सबका साथ’ वाला नारा पीछे छूट रहा है। अब हिंदू हित का जाप है। पश्चिम बंगाल की जीत इसका प्रमाण है। उत्तर प्रदेश में अगर यही चला, तो सपा का PDA धराशायी हो सकता है। यह सब वोटरों की सोच पर निर्भर है। हर चुनाव नई उम्मीदें जगाता है, लेकिन इतिहास दोहराने का खतरा मंडरा रहा है। यह बदलाव BJP के लिए बड़ा दांव है। पहले वे सभी को लुभाते थे, अब खुलकर हिंदू कार्ड खेल रहे हैं। क्या इससे मुस्लिम वोट पूरी तरह खिसक जाएंगे? या विकास के नाम पर कुछ लौट आएंगे? उत्तर प्रदेश में परीक्षा कठिन है। यहां जातियां बिखरी हैं। यादव, जाट, कुर्मी, मौर्य सब अलग-अलग सोचते हैं। PDA ने इन्हें जोड़ा था, लेकिन हिंदू एकता का नारा इन सबको लपेट सकता है। अखिलेश को सतर्क रहना होगा। नया नैरेटिव गढ़ना पड़ेगा। शायद किसान मुद्दे उठाएं या युवाओं को नौकरी का वादा करें। राजनीति का खेल अनिश्चित है। पश्चिम बंगाल ने एक संकेत दिया है। उत्तर प्रदेश में क्या होगा, समय बताएगा। वोटर ही राजा है। उसकी सोच बदलेगी, तो फार्मूले भी बदलेंगे।


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