बंगाल की जीत से UP में SP की चिंता और BJP का नया उत्साह

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संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में BJP की शानदार सफलता ने उत्तर प्रदेश की सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। SP अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक्स पर जो पोस्ट किया, उसमें एक गहरी चेतावनी छुपी थी। उन्होंने लिखा, ‘हर फरेबी फतह की एक मियाद होती है, ये बात ही सच्चाई की बुनियाद होती है।’ यह बयान महज ट्वीट नहीं, बल्कि 2027 के UP विधानसभा चुनाव के लिए विपक्ष की मनोस्थिति का आईना है। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद SP और कांग्रेस गठबंधन अब UP में अपनी रणनीति को नई सिरे से ढालने में जुट गया है। दरअसल, बंगाल के नतीजे विपक्ष के लिए कई सबक लेकर आए हैं। SP के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष किरनमय नंदा ने साफ कहा कि तृणमूल की हार की बड़ी वजह भ्रष्टाचार और पुरानी सरकार के खिलाफ गुस्सा था। UP में भी BJP की सरकार दस साल पूरे कर चुकी है। ऐसे में एंटी इनकम्बेंसी का सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है। लेकिन विपक्ष जानता है कि केवल इसी पर भरोसा करके 2027 नहीं जीता जा सकता। 2024 लोकसभा चुनाव में SP-कांग्रेस गठबंधन ने UP में 43 सीटें हासिल की थीं। विधानसभा क्षेत्रों में यह आंकड़ा बहुमत के काफी करीब था। इस बढ़त को मोमेंटम में बदलने की कोशिश SP कर रही है, लेकिन बंगाल की जीत ने BJP के कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच राज्यों के नतीजों के बाद पार्टी कार्यालय में जो भाषण दिया, उसमें UP पर खास फोकस था। उन्होंने SP पर तीखा हमला बोला और मिशन UP की शुरुआत का संकेत साफ दे दिया। अखिलेश यादव भी अपने कार्यकर्ताओं को पहले से ही चेतावनी दे रहे थे कि बंगाल के बाद BJP का पूरा अमला UP की ओर मुड़ जाएगा। इसलिए सतर्क रहने की जरूरत है। विपक्ष की सबसे बड़ी चिंता अब कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने की है। बंगाल में ममता बनर्जी के साथ अखिलेश के अच्छे संबंध रहे हैं। ममता UP में प्रचार भी करने आई थीं। उनकी हार ने विपक्षी खेमे में निराशा फैलाई है। BSP के लिए तो यह स्थिति और भी चुनौती भरी है। बाइपोलर चुनावों में बSP का अस्तित्व बचाना अब आसान नहीं रह गया है। मायावती की पार्टी को ‘बी टीम’ का टैग झेलना पड़ रहा है। ऐसे में कई दलित और पिछड़े वोटर SP को विकल्प के रूप में देख रहे हैं। SP के वरिष्ठ नेता मानते हैं कि गैर-यादव ओबीसी, दलित और अन्य वर्गों में उनका सामाजिक विस्तार काफी हद तक कामयाब रहा है। कांग्रेस के साथ गठबंधन भी कायम रखने की कोशिश है। बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने का काम पिछले काफी समय से चल रहा है।

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विपक्ष को लगता है कि बंगाल में BJP की जीत में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे ने भी भूमिका निभाई। UP में इसे रोकने के लिए अखिलेश यादव ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को सख्त हिदायत दी है। कोई ऐसा बयान या आचरण न हो जिससे BJP को फायदा मिले। कानून-व्यवस्था को लेकर लगाई जाने वाली आलोचना भी सीमित रखने की सलाह दी गई है। इसी क्रम में मंगलवार सुबह अखिलेश के सोशल मीडिया पर हनुमान चालीसा की पंक्तियां साझा की गईं। सॉफ्ट हिंदुत्व की छवि बनाने की कोशिश साफ नजर आ रही है। इटावा में केदारेश्वर मंदिर का लोकार्पण सावन के महीने में प्रस्तावित है। इसे भव्य बनाने की तैयारी चल रही है। महिला आरक्षण जैसे मुद्दों पर भी SP BJP को घेर रही है। विपक्ष की रणनीति अब ध्रुवीकरण से बचते हुए सामाजिक समीकरणों पर जोर देने की है। बंगाल के नतीजों का मनोवैज्ञानिक असर भले ही हो, लेकिन UP में एंटी इनकम्बेंसी BJP के खिलाफ काम कर सकती है। यह तर्क SP के नेतृत्व को भरोसा दिला रहा है।

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दूसरी ओर BJP में बंगाल की जीत से अपार उत्साह है। 2024 लोकसभा चुनाव में UP BJP का प्रदर्शन काफी खराब रहा था। मात्र 33 सीटें मिलीं और वोट प्रतिशत 41.37 प्रतिशत पर सिमट गया। सहयोगी दलों को मिलाकर एनडीए 36 सीटों पर अटक गया। 2014 में 71 सीटों और 42.32 प्रतिशत वोट के मुकाबले यह गिरावट काफी तेज थी। 2019 में वोट प्रतिशत बढ़ा लेकिन सीटें घटीं। विधानसभा चुनावों में भी 2017 की तुलना में 2022 में BJP की सीटें कम हुईं। 312 से घटकर 255 रह गईं। इन निराशाजनक आंकड़ों के बावजूद BJP 2027 की तैयारी में पूरी तरह जुट गई है। प्रदेश महामंत्री संगठन दो साल से क्षेत्रवार और विधानसभा वार बैठकें कर रहे हैं। बूथ स्तर पर नए सिरे से समीक्षा हो रही है। नई जिला इकाइयां गठित की गई हैं। पंकज चौधरी प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद लगातार दौरों पर हैं। दूध और शक्ति केंद्रों का सत्यापन कर निष्क्रिय पदाधिकारियों को हटाया जा रहा है। बंगाल में UP के कई मंत्रियों और नेताओं की टीम लगी थी, इसलिए यह जीत UP BJP के लिए खास महत्व रखती है।

फिर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। पार्टी के अंदर जातीय गोलबंदी एक बड़ी समस्या बन गई है। क्षत्रिय, ब्राह्मण, कुर्मी, लोध समेत अलग-अलग जातियों की बैठकें और दबाव पार्टी नेतृत्व के लिए चिंता का विषय हैं। यूजीसी विवाद और शंकराचार्य विवाद जैसे मुद्दों पर भी जातीय रंग साफ दिखा। सरकार और संगठन के बीच समन्वय की कमी की शिकायतें भी आती रहती हैं। अधिकतर बड़े चेहरे पूर्वांचल से होने के कारण क्षेत्रीय संतुलन बनाना भी मुश्किल हो रहा है। BJP नेतृत्व इन मुद्दों पर लगातार काम कर रहा है। मंडल और जिला कमेटियों में विभिन्न जातियों और क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की कोशिश हो रही है। मंत्रिमंडल विस्तार और प्रदेश कार्यकारिणी में बदलाव के जरिए संतुलन साधने की कवायद चल रही है। सरकार और संगठन की बैठकें नियमित रूप से हो रही हैं ताकि कोई अंतर न रहे।

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2027 का चुनाव अब सिर्फ एक साल से भी कम समय में है। दोनों तरफ तैयारियां तेज हो गई हैं। SP सामाजिक विस्तार और समीकरणों पर भरोसा कर रही है तो BJP बंगाल की जीत से मिले मोमेंटम और संगठनात्मक मजबूती को भुनाने की कोशिश में है। अखिलेश यादव कार्यकर्ताओं को सतर्क रखने पर जोर दे रहे हैं तो BJP मिशन मोड में काम कर रही है। UP की सियासत में यह लड़ाई अब केवल वोट और सीटों की नहीं, बल्कि मनोबल, रणनीति और भविष्य की दिशा तय करने की भी है। बंगाल का नतीजा UP के लिए एक नया अध्याय खोल गया है। देखना होगा कि विपक्ष इस चुनौती का कितना मुकाबला कर पाता है और BJP अपनी पिछली गिरावट को कितना दूर कर पाती है। 2027 का समर सामाजिक समीकरणों, जातीय गणित और विकास के एजेंडे के बीच होगा। दोनों पक्ष पूरी ताकत झोंक रहे हैं। नतीजा जो भी हो, UP की राजनीति फिर से नई दिशा लेगी।


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