अगर आपको भी दुर्गंध से परेशानी है तो तत्काल करें यह उपाय…

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  • सूंघने की अच्छी क्षमता बताती है अच्छे स्वास्थ्य की निशानी
  • अगर सूंघने की शक्ति गई तो सावधान! आपको तुरंत इलाज की जरूरत

अंशिका यादव

लखनऊ। राजधानी से करीब 120 किमी दूर बसे लखीमपुर-खीरी की ममता वर्मा जैसे ही किसी दुर्गंध वाली जगह से गुजरती है, उसका सिरदर्द तेजी से बढ़ जाता है। जब तक उसे तीन से चार-बार उल्टी न हो जाए, वह सामान्य नहीं हो पाती है। कुछ इसी तरह का हाल अम्बेडकर नगर की रहने वाली पुनीता यादव का है। एक बार वो सरयू स्नान के लिए गईं। रास्ते में उन्हें मछली का बाजार मिल गया। बस क्या था। वो उल्टी-दस्त से परेशान हो गईं। दो दिनों तक बिस्तर से उठना मुहाल हो गया। क्या आप जानते हैं ये क्यों होता है। वहीं बस्ती के महेंद्र दुबे को जब चमेली, बेला या रजनीगंधा के फूल की महक मिल जाती है तो उन्हें सर्दी-जुकाम के साथ-साथ लगातार छींक आने वाली बीमारी हो जाती है। क्या आप इसका सटीक कारण जानते हैं। यदि आपका जवाब नहीं में हैं… तो जानिए।

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अक्सर हम सड़ी-गली चीज़ों, कूड़े के ढेर या फैक्ट्रियों से आने वाली बदबू को सिर्फ असहज अनुभव मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि लगातार खराब गंध के सम्पर्क में रहना सिर्फ उबकाई या सिरदर्द ही नहीं, बल्कि शरीर, दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल सकता है। इंग्लैंड के वेस्टबरी शहर में रहने वाली रिटायर्ड टीचर एलेन कॉर्नर के लिए गर्मियों के दिन बेहद मुश्किल हो जाते हैं। उनके घर के पास स्थित वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट से आने वाली तेज बदबू उन्हें अपने ही बगीचे में जाने से रोक देती है। वह बताती हैं कि यह अनुभव ‘खुले कचरा ट्रक के पीछे चलने’ जैसा लगता है। खिड़कियां बंद रखने के बावजूद बदबू से राहत नहीं मिलती।

राजधानी लखनऊ के मशहूर इएनटी सर्जन डॉ. गौरव सिंह के अनुसार, सूंघने की क्षमता हमारे शरीर की एक प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली है। वहीं स्वीडन के स्टॉकहोम स्थित कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट के गंध विज्ञान प्रोफेसर जोहान लुंडस्ट्रॉम बीबीसी को बताते हैं कि गंध हमें पर्यावरण में मौजूद खतरों के बारे में तुरंत चेतावनी देती है। उनके अनुसार, कोई गंध नाक के जरिए शरीर में प्रवेश करने के लगभग 300 मिलीसेकंड के भीतर दिमाग में प्रोसेस हो जाती है। यही कारण है कि खराब गंध महसूस होते ही शरीर तुरंत प्रतिक्रिया देता है और व्यक्ति स्वाभाविक रूप से उस जगह से दूर हटना चाहता है।

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अध्ययनों में पाया गया है कि शहरी इलाकों में लगातार अप्रिय गंध के सम्पर्क में रहने से सिरदर्द, मितली, सांस लेने में दिक्कत और नींद में बाधा जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। साल 2021 के एक अध्ययन के अनुसार, खराब गंध ‘वेगस नर्व’ को सक्रिय कर सकती है, जो दिमाग और आंत को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण तंत्रिका है। इसके सक्रिय होने से मतली और उल्टी जैसा अनुभव हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि व्यक्ति उस गंध को लेकर कितना डरता या नापसंद करता है।

अमेरिका के मोनेल केमिकल सेंस सेंटर
अमेरिका के मोनेल केमिकल सेंस सेंटर

अमेरिका के मोनेल केमिकल सेंस सेंटर की मनोवैज्ञानिक पामेला डाल्टन बताती हैं कि स्वास्थ्य पर प्रभाव केवल गंध से नहीं, बल्कि उसके प्रति हमारी मानसिक प्रतिक्रिया से भी होता है।

मशहूर मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. विजित जायसवाल
मशहूर मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. विजित जायसवाल

 

बहराइच के मशहूर मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. विजित जायसवाल कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति लगातार किसी बदबू से परेशान है, तो वह खिड़कियां बंद रखने, बाहर टहलने से बचने या दोस्तों से मिलने-जुलने से भी कतराने लगता है। इससे उसकी जीवन शैली प्रभावित होती है और मानसिक तनाव बढ़ता है। शोध बताते हैं कि कम आय वाले इलाके अक्सर लैंडफिल साइट्स, कचरा जलाने वाले प्लांट और भारी उद्योगों के पास होते हैं, जहां बदबू की समस्या अधिक होती है। यूरोप और ब्रिटेन के अध्ययनों में पाया गया है कि ऐसे प्रदूषित इलाकों में गरीब लोगों के रहने की संभावना ज्यादा होती है। यही वजह है कि गंध प्रदूषण को अब पर्यावरणीय न्याय का मुद्दा भी माना जा रहा है।

अच्छी सूंघने की क्षमता अच्छे स्वास्थ्य की निशानी

वैज्ञानिकों के अनुसार, अच्छी सूंघने की क्षमता बेहतर स्वास्थ्य से जुड़ी होती है। इससे न केवल भोजन का आनंद बढ़ता है, बल्कि मानसिक संतुलन और निजी जीवन की संतुष्टि भी बेहतर होती है। साल 2018 के एक अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों की सूंघने की क्षमता बेहतर थी, उन्हें यौन जीवन में भी अधिक संतुष्टि मिलती थी। वहीं दुनिया में लगभग पांच प्रतिशत लोग एनोस्मिया नामक स्थिति से प्रभावित हैं, जिसमें व्यक्ति सूंघने की क्षमता खो देता है। ऐसे लोगों में भूख कम लगना, भोजन का स्वाद न समझ पाना और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं। शोध यह भी बताते हैं कि बुज़ुर्गों में सूंघने की कमजोर क्षमता 10 वर्षों के भीतर मृत्यु के जोखिम को 46 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। विशेषज्ञ इसे हृदय रोग, अल्जाइमर और पार्किंसन जैसी बीमारियों से भी जोड़कर देख रहे हैं।


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