
- शांति की उम्मीदों के बीच इजरायल-लेबनान का तनाव बरकरार
- पाकिस्तान निभा रहा सफल मध्यस्थ की भूमिका, असीम मुनीर की भूमिका बढ़ी
डीजल, पेट्रोल और घरेलू गैस की किल्लतों के बीच एक बार फिर पूरी दुनिया की निगाहें पश्चिम एशिया की ओर उठ रही हैं। इस बीच अमेरिका ने ईरान से बात करने के लिए पाकिस्तान को मध्यस्थ क्या बनाया, पूरी दुनिया की निगाहें उस पर टिक गई हैं। कूटनीति के जानकारों का कहना है कि पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। हालांकि एक ओर अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित शांति वार्ता की तैयारी हो रही है। वहीं दूसरी ओर इजरायल-लेबनान सीमा पर बढ़ता तनाव इस पूरे समीकरण को और संवेदनशील बना रहा है। हालांकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कह दिया था कि वह ईरान के साथ सीजफायर को तैयार है, लेकिन वह लेबनान के साथ कोई मरौव्वत करने को तैयार नहीं है।
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पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद इस समय वैश्विक कूटनीति का केंद्र बन चुकी है, जहां बड़ी शक्तियों के प्रतिनिधि आमने-सामने हैं। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का इस्लामाबाद पहुंचना इस बात का संकेत है कि वॉशिंगटन इस वार्ता को गम्भीरता से ले रहा है। उनके साथ पश्चिम एशिया मामलों के दूत स्टीव विटकॉफ और वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुशनर की मौजूदगी इस कूटनीतिक प्रयास को और वजन देती है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर द्वारा उनका स्वागत इस बात को दर्शाता है कि पाकिस्तान इस प्रक्रिया में एक अहम मध्यस्थ की भूमिका निभाना चाहता है।
इसी बीच, ईरान का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी इस्लामाबाद में सक्रिय है। पाक सेना प्रमुख से उनकी मुलाकात और प्रधानमंत्री से प्रस्तावित वार्ता यह दर्शाती है कि तेहरान भी इस संवाद को लेकर गंभीर है, लेकिन उसके रुख में स्पष्ट चेतावनी भी छिपी है। ईरान ने साफ संकेत दिया है कि बातचीत का परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ‘अमेरिका फर्स्ट’ दृष्टिकोण अपनाता है या ‘इजरायल फर्स्ट’। यह बयान न केवल वार्ता की दिशा तय कर सकता है, बल्कि क्षेत्रीय समीकरणों पर भी गहरा असर डाल सकता है।
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दूसरी ओर, इजरायल और लेबनान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव इस पूरे शांति प्रयास पर सवाल खड़े कर रहा है। हाल ही में लेबनान की ओर से ड्रोन घुसपैठ के बाद इजरायल के कई शहरों में सायरन बजाए गए, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। लगातार हो रहे जवाबी हमले इस बात का संकेत हैं कि जमीनी हालात अभी भी बेहद नाजुक हैं, जहां किसी भी छोटी घटना से बड़ा टकराव भड़क सकता है।
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ऐसे समय में इस्लामाबाद में चल रही वार्ताएं केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता पर पड़ेगा। यदि यह वार्ता सफल होती है, तो यह न केवल क्षेत्र में शांति की दिशा में बड़ा कदम होगी, बल्कि वैश्विक राजनीति में भी एक सकारात्मक संदेश देगी। वहीं, विफलता की स्थिति में तनाव और अधिक गहरा सकता है। स्पष्ट है कि कूटनीति और संघर्ष के इस दोराहे पर खड़ी दुनिया की नजरें इस्लामाबाद पर टिकी हैं, जहां हर बातचीत, हर संकेत और हर बयान आने वाले समय की दिशा तय करेगा।
