टेंडर नियमों को रखा दरकिनार और विभाग ने अपनी पसंदीदा कम्पनी को दे डाला कार्य

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आशीष द्विवेदी

  • कई गड़बड़झालों की रिपोर्ट बनाकर जनता से समक्ष लेकर आए कुछ युवा अधिवक्ता
  • हुसैनाबाद टूरिस्ट फैसिलिटेशन सेंटर टेंडर पर विवाद, नियमों में बदलाव पर उठे सवाल

लखनऊ के हुसैनाबाद स्थित टूरिस्ट फैसिलिटेशन सेंटर की टेंडर प्रक्रिया को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। लखनऊ हाईकोर्ट के अधिवक्ता रोहितकांत द्वारा जारी एक प्रेस वक्तव्य में आरोप लगाया गया है कि टेंडर प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं और नियमों में बदलाव कर किसी विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई है। जारी प्रेस नोट के अनुसार पिछले तीन महीनों के भीतर टेंडर की शर्तों में कई अहम बदलाव किए गए। आरोप है कि वार्षिक किराया 20 लाख रुपये से घटाकर चार लाख रुपये कर दिया गया, जिससे सरकारी राजस्व को नुकसान हो सकता है। वहीं पात्रता शर्तों में भी बदलाव करते हुए न्यूनतम टर्नओवर को चार करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये कर दिया गया, जिससे स्थानीय प्रतिभागियों के बाहर होने की आशंका जताई गई है।

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इसके अलावा, नई शर्तों के तहत बिजली बिल का भार भी सरकारी प्राधिकरण पर डालने की बात कही गई है, जिसे जनधन के अनुचित उपयोग के रूप में देखा जा रहा है। टेंडर की अवधि को 5 वर्ष से बढ़ाकर 10 वर्ष करना और सरकारी विभागों के साथ कार्य-अनुभव की अनिवार्यता खत्म करना भी सवालों के घेरे में है। वक्तव्य में यह भी कहा गया है कि इस तरह के बदलाव न केवल पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों के खिलाफ हैं, बल्कि यह संविधान के समानता के अधिकार की भावना का भी उल्लंघन करते हैं। अधिवक्ता ने इसे “विरासत, विधि और विश्वास” से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।

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मामले को लेकर चार प्रमुख मांगें रखी गई हैं, जिनमें टेंडर प्रक्रिया पर तत्काल रोक, उच्चस्तरीय जांच, संशोधित शर्तों की समीक्षा और नियमों के अनुरूप नई निविदा प्रक्रिया शामिल है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो इस मुद्दे को लेकर उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की जाएगी। प्रेस नोट में वकीलों ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ईमानदारी एवं पारदर्शिता का ब्रांड अम्बेसडर बताते हुए मांग की है कि इस गड़बड़झाले में शामिल अफसरों पर कड़ी कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि टेंडर स्वीकृति वाली फाइलों की गम्भीरता और पारदर्शिता से जांच करा दी जाए तो दूध का दूध पानी का पानी सामने आ जाएगा। साथ ही उन्होंने मांग की है कि इस टेंडर प्रक्रिया को तत्काल रूप से निरस्त की जाए और उच्च स्तरीय समिति से इसकी जांच कराई जाए और दोबारा इसमें टेंडर प्रकाशित किया जाए।

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