
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम्॥
आज मैं संगम की स्मृति से पुलकित हूँ।
यद्यपि यह शरीर संगम-क्षेत्र में नहीं है,
पर मेरी चेतना मानसी गंगा में अवगाहन कर रही है।
मुझे मौन-स्नान करने दो।
आत्मा ही शिव है,
जिनकी जटाजूट में
श्रीविष्णु के चरणों से प्रकट
मकरवाहिनी गंगा समाहित है।
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गिरिजा मेरी प्रज्ञा है,
वही बुद्धि,
जहाँ से मैं
गुरुदेव के हृदय में
विराजमान इष्टदेव का दर्शन कर रहा हूँ।
मेरे सहचर मेरे पंचप्राण हैं,
प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान।
यह शरीर ही तीर्थराज प्रयाग है।
देखना, सुनना,
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जिह्वा से नाम-स्मरण
भीतर गूंजते अनाहद को सुनना
श्रवण-पूजन का अंग है।
निद्रा-समाधि से अभी जागा हूँ।
पैरों का चलना ही परिक्रमा है।
मेरे हाथ प्रभु के चरण टटोल रहे हैं।
वाणी से निकला हर शब्द स्तुति है।
अहा!
मैं तो शिवरूप हो गया।
हे शम्भो!
मेरा आराधन स्वीकार करो॥
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