चारधाम में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक विभाजनकारी राजनीति : कांग्रेस

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नया लुक ब्यूरो

देहरादून। उत्तराखंड की धामी सरकार लगातार समाज को बांटने की राजनीति कर रही है। इसी विभाजनकारी सोच के तहत पहले हरिद्वार की हर की पौड़ी पर प्रयोग किया गया और अब चारधाम के मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को वर्जित करने की कोशिश की जा रही है। बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) द्वारा जारी आदेश, जिसमें गैर-हिंदुओं को बीकेटीसी के अधीन मंदिरों में प्रवेश से वंचित किया गया है, इस विभाजनकारी सोच का ताजा उदाहरण है।

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उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नेता अमरजीत सिंह ने कहा कि यह भाजपा और आरएसएस की धर्म आधारित राजनीति का एक और प्रयोग है, जिसका उद्देश्य समाज में वैमनस्य पैदा करना है। उन्होंने कहा कि श्री हेमकुंड साहिब की यात्रा पर आने वाले लाखों श्रद्धालु वर्षों से अपनी यात्रा को तभी पूर्ण मानते रहे हैं, जब वे भगवान बद्रीनाथ के दर्शन भी करते थे। अब बीकेटीसी के आदेश के बाद इन लाखों श्रद्धालुओं की चारधाम यात्रा पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया गया है, जो न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि भारत की साझा संस्कृति और परंपराओं के भी खिलाफ है।

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अमरजीत सिंह ने कहा कि सरकार और बीकेटीसी यह तर्क दे रहे हैं कि “आस्था” के आधार पर यह तय किया जाएगा कि कौन गैर-हिंदू है। धामी सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आस्था को मापने का यह नया पैमाना क्या है और इसे तय करने का अधिकार किसे दिया गया है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड का निवासी होने के नाते उन्होंने स्वयं कई बार श्री बद्रीनाथ जी के दर्शन किए हैं तथा जागेश्वर धाम सहित अनेक प्राचीन मंदिरों में जाने का सौभाग्य प्राप्त किया है। अब क्या कोई राजनीतिक दल, धामी सरकार या बीकेटीसी यह तय करेगी कि उनकी आस्था क्या है? क्या सिख होने या गैर-हिंदू होने के आधार पर उन्हें हर की पौड़ी या चारधाम के दर्शन से वंचित किया जाएगा?

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कांग्रेस नेता अमरजीत सिंह ने कहा कि भारत की मूल भावना “वसुधैव कुटुंबकम्” रही है। किसी भी व्यक्ति को किसी धार्मिक स्थल में प्रवेश देने या रोकने का अधिकार न तो सरकारों को है और न ही किसी समिति को। सरकारों और संस्थाओं का काम जनहित में कार्य करना है, न कि धार्मिक परंपराओं और आस्थाओं में हस्तक्षेप करना। उन्होंने कहा कि धामी सरकार और बीकेटीसी इस आदेश पर तत्काल पुनर्विचार करें और समाज को बांटने वाले ऐसे फैसलों से बाज आएं।

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