गौरी पूजन आज है, जानिए पूजा विधि व महत्व और उपाय

राजेन्द्र गुप्ता

ज्येष्ठ गौरी पूजा ‘भाद्रपद मास’ के ‘शुक्ल पक्ष’ की ‘अष्टमी तिथि’ को की जाती है। ये पूजा गणेश चतुर्थी के दो दिन बाद गौरी आह्वान के साथ शुरू होती है, और तीन दिन तक चलती है। इस दिन स्त्रियां माता गौरी की उपासना करती हैं, और उनसे अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मांगती है। ज्येष्ठ गौरी पूजा का पर्व विशेष रूप से मराठी समुदाय द्वारा, यानि महाराष्ट्र और कर्नाटक में मनाया जाता है।

ज्येष्ठ गौरी पूजा कब है?

  • ज्येष्ठ गौरी पूजा सोमवार, एक सितम्बर 2025 को की जाएगी।
  • ज्येष्ठ गौरी पूजा मुहूर्त सुबह 05 बजकर 39 मिनट से शाम 06 बजकर 17 मिनट तक रहेगा। जिसकी कुल अवधि 12 घंटे 38 मिनट होगी।
  • ज्येष्ठ गौरी आवाहन 31 अगस्त, रविवार को किया जाएगा।
  • ज्येष्ठ गौरी विसर्जन दो सितम्बर, मंगलवार को किया जाएगा।
  • ज्येष्ठा नक्षत्र 31 अगस्त 2025 को शाम 05 बजकर 27 मिनट पर प्रारंभ होगा।
  • ज्येष्ठा नक्षत्र का समापन एक  सितम्बर 2025 को शाम 07 बजकर 55 मिनट पर होगा।

क्या है ज्येष्ठ गौरी पूजा?

ज्येष्ठ गौरी पूजा महाराष्ट्र और कुछ अन्य राज्यों में मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है। यह पर्व गणेश चतुर्थी के दौरान आता है और इसे विशेष रूप से विवाहित महिलाएँ मनाती हैं। मान्यता है कि माता गौरी, जो देवी पार्वती का स्वरूप मानी जाती हैं, इस दिन अपने मायके आती हैं और तीन दिनों तक घर में निवास करती हैं। पहले दिन गौरी आवाहन, दूसरे दिन पूजन, और तीसरे दिन विसर्जन किया जाता है। यह पूजा मुख्य रूप से सौभाग्य, सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना के लिए की जाती है।

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माता गौरी को प्रसन्न करने के लिए निम्न  और उपाय करें

श्रद्धा और शुद्धता से पूजा: पूजा से पहले घर की सफाई करें और स्वयं स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। श्रृंगार का विशेष महत्व: माता को 16 श्रृंगार की वस्तुएँ जैसे चूड़ी, बिंदी, साड़ी, सिंदूर, फूल आदि अर्पित करें। मिठाई और नैवेद्य अर्पित करें: खासकर नारियल, पूरनपोली, फल और विशेष प्रसाद माता को अर्पित करें। मंत्र जाप करें: “ॐ गौर्यै नमः” का 108 बार जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। दान और सेवा करें: गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, और श्रृंगार सामग्री का दान करें। पति की लंबी आयु की प्रार्थना करें: विवाहित महिलाएँ विशेष रूप से अपने पति की आयु और परिवार के सुख-समृद्धि की प्रार्थना करती हैं।

ज्येष्ठ गौरी पूजन का महत्व क्या है?

अखंड सौभाग्य की कामना करने वाली स्त्रियों के लिए ज्येष्ठ गौरी पूजन व्रत बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। ये पर्व ज्येष्ठ नक्षत्र के दौरान आता है, इसी कारण इसे ‘ज्येष्ठ गौरी व्रत’ के रूप में जाना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार असुरों के अत्याचार से त्रस्त होकर सभी स्त्रियां श्री महालक्ष्मी माता गौरी की शरण में गईं, और अपने सुहाग की रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगीं। विनती सुनकर माता ने असुरों का संहार करके शरणागत स्त्रियों को अखंड सौभाग्य का वरदान दिया। इसी कारण आज भी ये व्रत बहुत श्रद्धा के साथ किया जाता है।

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ज्येष्ठ गौरी पूजा के अनुष्ठान क्या हैं?

मां ज्येष्ठ गौरी व्रत के लिए धातु या मिट्टी की प्रतिमा बनाकर अथवा कागज पर श्री लक्ष्मी का चित्र बनाकर उस चित्र की पूजा की जाती है। कई स्थानों पर नदी के तट से पांच कंकड़ लाकर उन्हें गौरी रूप में पूजा जाता है। महाराष्ट्र में अधिकतर जगहों पर पांच छोटे मिट्टी के घड़ों को एक के ऊपर एक रखकर उस पर मिट्टी से बना गौरी का मुखौटा रखने की परंपरा है। कुछ स्थानों पर सुगंधित फूल देने पौधे या गुलमेहंदी के पौधे बांधकर उस पर मिट्टी से बना मुखौटा चढ़ाया जाता है, और मां ज्येष्ठ गौरी की प्रतिमा बनाई जाती है। माता की मूर्ति स्थापना के साथ-साथ भगवान गणेश जी की मूर्ति भी स्थापित की जाती है। स्त्रियां घर के प्रवेश द्वार पर रंगोली और आलते से मां ज्येष्ठ गौरी के पैरों का आकार बनाती हैं। माता ज्येष्ठ गौरी की मूर्ति को नए कपड़े, मंगल सूत्र, बिछुआ व अन्य आभूषणों से सजाया जाता है। इसके बाद मूर्ति को अनेक प्रकार के रंगीन कागज़ों, आम के पत्तों व फूलों से सजाया जाता है। दूसरे दिन माता ज्येष्ठ गौरी की पूजा की जाती है, और उन्हें ‘महानैवेद्य’ अर्पित किया जाता है। इस महानैवेद्य में 16 प्रकार के भोग बनाये जाते हैं। घर की स्त्रियां इस दिन हरी साड़ी व आभूषण पहनती हैं। तीसरे दिन किसी पवित्र नदी में माता ज्येष्ठ गौरी का विसर्जन किया जाता है। इस दिन घर लौटते समय उस नदी की रेत अथवा मिट्टी लाकर पूरे घर में छिड़कने की परंपरा है।

ज्येष्ठ गौरी पूजा के लाभ क्या हैं?

माता गौरी का पूजन और व्रत करने वाली स्त्रियां सदा सौभाग्यवती रहती हैं। यह व्रत स्त्री के दांपत्य जीवन में प्रेम और विश्वास बनाए रखता है। माना जाता है कि माता के आशीर्वाद से पति-पत्नी के रिश्ते में कभी दरार नहीं आती, और विपरीत परिस्थितियों में भी दांपत्य जीवन सुरक्षित रहता है।

इस पावन अवसर पर ब्राह्मणों को चावल, अनाज, फल और वस्त्र दान करने का विशेष महत्व है। दान करने से न केवल पुण्य की प्राप्ति होती है, बल्कि व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती है।

जो भक्त सच्चे मन और पूरी श्रद्धा के साथ इस दिन माता गौरी का पूजन करते हैं, माता उनकी सारी पीड़ाओं को हर लेती हैं। जीवन में आ रही कठिनाइयों, मानसिक तनाव और पारिवारिक कलह का समाधान आसानी से मिलने लगता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ये भी कहा जाता है कि इस व्रत का पालन करने से घर की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। माता गौरी की कृपा से धन-धान्य की वृद्धि होती है और दरिद्रता दूर होती है। व्यापार और नौकरी के क्षेत्र में भी सकारात्मक बदलाव आते हैं।

यदि किसी व्यक्ति की कोई विशेष मनोकामना हो, चाहे वह संतान सुख की हो, विवाह में आने वाली रुकावट दूर करने की, घर में सुख-शांति बनाए रखने की, या जीवन में किसी बड़े लक्ष्य को पाने की, तो ज्येष्ठ गौरी पूजा का व्रत करने से वह मनोकामना शीघ्र पूर्ण होती है। माता के आशीर्वाद से कार्यों में आने वाली बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

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ज्येष्ठ गौरी पूजा के धार्मिक उपाय

उपवास रखें: महिलाएँ इस दिन उपवास रखती हैं और पूजा के बाद ही भोजन करती हैं। कुमकुम और हल्दी का अर्पण: माता गौरी को हल्दी और कुमकुम चढ़ाना शुभ माना जाता है। कलश स्थापना: पूजा के समय जल से भरा कलश स्थापित करें और उसमें आम के पत्ते और नारियल रखें। संकल्प मंत्र पढ़ें: संकल्प लेकर माता गौरी की पूजा करने से पुण्य फल मिलता है। सुहाग सामग्री का आदान-प्रदान: महिलाएँ एक-दूसरे को श्रृंगार की वस्तुएँ देती हैं, जिसे शुभ माना जाता है। गौरी गीत और मंगलगान: पूजा के समय महिलाएँ पारंपरिक गीत गाती हैं, जो इस पर्व की विशेषता है।

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