दुर्गा के रूप महाशक्तियों का आह्वान, शारदीय नवरात्र मे देवी के नौ स्वरुप

  •  देवी देवता धरती के निकट आकर पाते है अपना भाग
  •  ब्रह्मांड का नौ दिनो मे होता है काया कल्प
  • नर नारी के भीतर दैवी शक्तियो के जागरण का महा पर्व

बलराम कुमार मणि त्रिपाठी

हमारे पुरुषार्थ को जगाने केलिए शक्ति जागरण पर्व के रूप में नौ दिन की नवरात्र उपासना का पर्व आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शुरु हुआ। अमिवस्या को महालया के बाद शक्ति उपासना शुरु हुई। कलशस्थापना के साथ मां दुर्गा के नौ स्वरुपो की उपासना प्रतिपदा से नवमी तक होगी। इस बीच देवी की सुंदर और भव्य प्रतिमा स्थापित कर श्रद्धालु पूजा पाठ शुरु करेंगे। पितरो की पंद्रह दिन जलतर्पण और पिंडदान से पूजा के बाद पितृगण धरती से पितृलोक मे चले जाते है‌। इसके बाद देवी देवताओं का धरती के आसपास आगमन होता है‌। वे हमारी पूजा और उपासना ग्रहण करके हमारी आभ्यंतर शक्ति जागृत करते हैं।

पर्यावरणीय गतिविधि नियंत्रित करने वाले ये तैंतीस देवता हमारे शरीर के भुतर भी अलग कलग अंगो के स्वामी होकर निवास करते हैं। उनकी शक्तियो की आराधना करके हम उन्हे प्रेरित करते हैं कि हमे ऐसी नवों शक्तियां मिल जायं ताकि अपने चतु: पुरुषार्थ अर्थ धर्म काम और मोक्ष की प्राप्ति सहज रूप मे कर सकें। दुर्गा सप्तशती का पाठ,मंत्रो का जप,पूजन और यज्ञ से देवी शक्तियां जाग्रत होकर हमें सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर देती हैं।

 

इस कार्य सभी देवता भी मदद करते है इसलिए सभी देवताओ और दैवी शक्तियो का आह्वान किया जाता है‌। ऐं कारी स्जनात्मिका शक्ति,ह्रींकारी प्रति पालिका और क्लींकारी कामात्मिका ये तीन रचनात्मक महाशक्तियां इनके साथ आसुरी शक्तिओं को मारने वाली चंडिका हमारी नकारात्मक ऊर्जा नष्ट करती है। यै कारी वरदायिनी शक्ति विच्चे अभय देने वाली शक्ति हमें निर्भय और ताकत वर बनाती‌ मंत्रात्मिका शक्तियां जागृत होकर हमे ऊर्जावान बना देती है। कन्या राशि मे स्थित सूर्य ,पुरुष और नारी दोनो की शक्तियां जगा कर उन्हे सक्रिय बना देता है। यह द्विस्वभाव राशि है। वातावरण का शीत काल और सूर्य की गर्मी धान के अन्न को पका देती है। सृष्टि को रचनात्मिका बना देती है‌। शारदीय नवरात्रि का यह पर्व ब्रह्मांड को नये सिरे से कंट्रोल करने लग जाती है। इसे पुनर्जीवन या काया कल्प भी कहसकते है। महादुर्गा को शतबार नमन है।
जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते।।

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