दो टूक : चुनावी रेवडी में मत फंसिये,ये दल नहीं सोचेंगे जरा आप ही सोच लीजिये 

राजेश श्रीवास्तव

लखनऊ। देश में एक बार फिर से चुनावी रेवड़ियों को लेकर बहस तेज हो गयी है। सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई करते हुए कई ऐसे सवाल खड़े कर दिये जिसको लेकर आम आदमी भी गंभीर है। क्योंकि इससे सबसे ज्यादा लाभान्वित और परेशान दोनो वही है। सरकारें और राजनीतिक दल केवल इसको एक रिश्वत की तरह इस्तेमाल करती है। यानि फ्रीबीज दो और वोट हासिल करो। लेकिन जनता यह नहीं समझ पाती कि जिस मुफ्तखोरी में फंस कर वह सियासी दल को कुर्सी तक पहुंचा देते हैं वह उससे अगले पांच वर्षों में कोई सवाल करने का हक नहीं रखते । आपको जानकर ताज्जुब होगा कि देश के 81 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त राशन बांटा जा रहा है। यह प्रथा नयी नहीं है और केवल भाजपा सरकार ने ही नहीं शुरू किया। 7० सालों से अधिक का इतिहास है। 1954 से शुरू हुआ सिलसिला अभी तक चल रहा है। कभी तमिलनाडु से यह सिलसिला शुरू हुआ । याद कीजिये वह दौर जब जयललिता द्बारा चावल, कलर टीवी, साड़ी आदि बांटने का भी खूूब प्रचलन था और अब इसकी तब चर्चा ज्यादा हुई जब आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में बिजली, पानी मुफ्त देने का ऐलान कर दिया। इसके बाद तो सभी राजनीतिक दलों में रेवड़ियां बांटने की जैसे होड़ मच गयी। कर्नाटक चुनाव में पांच गारंटी योजना के सहारे कांग्रेस ने सरकार बना ली।

इन दिनों मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार ने लाड़ली बहन सरीखी योजनाएं चलाकर एक बार फिर से सरकार बनाने का ख्वाब संजोया है। तो राजस्थान भी पीछे नहीं है उसने भी महिलाओं को मोबाइल और उसका रीचार्ज तक देने का ऐलान किया है। यही नहीं, महिलाओं के खाते में धन देने का भी ख्वाब महिला वोटरों की आंखों में बुन दिया है। दरअसल याचिकाकर्ता का कहना है और सही भी है कि चुनाव से पहले सरकार का लोगों को पैसे बांटना प्रताड़ित करने जैसा है। यह हर बार होता है और भार टैक्स चुकाने वाली जनता पर पड़ता है। हमको समझना होगा कि यह आसा नहीं है। 31 मार्च 2०23 तक की रिपोर्ट में सामने आया है कि मप्र, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल जैसे राज्य टैक्स की कुल कमाई का 35% तक हिस्सा फ्री की योजनाओं पर खर्च कर देते हैं। पंजाब 35.4% के साथ सूची में टॉप पर है। मप्र में यह हिस्सेदारी 28.8%, राजस्थान में 8.6% है। आंध्र अपनी आय का 3०.3%, झारखंड 26.7% और बंगाल 23.8% तक फ्रीबीज के नाम कर देता है। केरल ०.1% हिस्सा फ्रीबीज को देता है। जब बजट घाटा बढ़ता है, तो राज्य ज्यादा कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में आय का बड़ा हिस्सा ब्याज अदायगी में जाता है। पंजाब, तमिलनाडु और बंगाल अपनी कमाई का 2०% से ज्यादा इसमें देते हैं। मप्र 1०% और हरियाणा 2०% देता है।

पंजाब पर अपनी जीडीपी का 48%, राजस्थान पर 4०% और मप्र पर 29% तक कर्ज है, जबकि यह 2०% से ज्यादा नहीं होना चाहिए। मप्र, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ने 7 साल में करीब 1.39 लाख करोड़ की फ्रीबीज दीं या घोषणाएं कीं। पंजाब का घाटा 46% बढ़ेगा। बिजली सब्सिडी 1 साल में 5०% बढ़कर 2०,2०० करोड़ हुई। कर्नाटक चालू वित्त वर्ष में का घाटा 8.2% बढ़ा। यह और बढ़ेगा क्योंकि 5 गारंटी पूरी करने में सालाना 52,००० करोड़ खर्च होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फ्रीबीज मुद्दे पर फैसले के लिए एक समिति गठित की जानी चाहिए। इसमें केंद्र, राज्य सरकारें, नीति आयोग, फाइनेंस कमीशन, चुनाव आयोग और राजनीतिक पार्टियां शामिल हों। गरीबों का पेट भरने की जरूरत है, लेकिन लोगों की भलाई के कामों को संतुलित रखने की जरूरत है, क्योंकि फ्रीबीज की वजह से इकोनॉमी पैसे गंवा रही है।

हम इस बात से सहमत हैं कि फ्रीबीज और वेलफ़ेयर के बीच अंतर है। कुछ लोगों का कहना है कि राजनीतिक पार्टियों को वोटर्स से वादे करने से नहीं रोका जा सकता…अब ये तय करना होगा कि फ्रीबीज क्या है। क्या सबके लिए हेल्थकेयर, पीने के पानी की सुविधा…मनरेगा जैसी योजनाएं, जो जीवन को बेहतर बनाती हैं, क्या उन्हें फ्रीबीज माना जा सकता है?’ कोर्ट ने इस मामले के सभी पक्षों से अपनी राय देने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि आप सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं बुलाते? राजनीतिक दलों को ही इस पर सबकुछ तय करना है। अब देखना है कि सियासी दल इस पर कुछ मंथन करेंगे या फिर जनता ही इसको नकार कर एक बेहतर राजनीतिक दल को चुनेगी जो उसे प्रलोभन न दे बल्कि उसे काम दे ताकि वह अपने जरूरी संसाधन खुद जुटा सके और देश आगे बढ़ सके। जरा आप भी सोचिए।

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