बंगलादेशी बंदी फंडिंग में दोषी अफसरों पर नहीं हुई कोई कार्यवाही

फाइलों में कैद होकर रह गई की एटीएस की जांच रिपोर्ट

मामला सुर्खियों में आने पर तत्कालीन जेल मुखिया ने कराई थी डीआईजी जेल से जांच


आरके यादव


लखनऊ। राजधानी की लखनऊ जेल में बांग्लादेशी बन्दियों की फंडिंग के मामले में डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। एटीएस की टीम ने एक माह से अधिक समय तक इस मामले की जांच की थी। जांच के बाद रिपोर्ट जेल मुख्यालय को सौंपी भी गई। इसके बावजूद कार्यवाही करने के बजाए यह जांच रिपोर्ट फाइलों में ही सिमट कर रह गई। जांच में दोषी पाए गए अधिकारी और सुरक्षाकर्मी आज भी जेल पर मौज काट रहे है। यह मामला विभागीय कर्मियों में चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चा है की ऊंची पहुंच और जुगाड़ वाले अधिकारियों के खिलाफ शासन कोई कार्रवाई नहीं करता है। ऐसा तब हुआ है जब जेल में बंद बांग्लादेशी बन्दियों के पास ढाका से कोलकाता होते हुए लखनऊ जेल में बंद बंगलादेशी बंदियों के पास पैसा पहुंचता था।

मामला दिसम्बर 2021 का है। मामला राजधानी की लखनऊ जेल का है। इस जेल में बांग्लादेश के दर्जनों की संख्या में विचाराधीन व सजायाफ्ता बंदी निरुद्ध है। सूत्रों का कहना है कि बंदियों के दैनिक खर्चापानी की फंडिंग बांग्लादेश से हो रही थी। इस फंडिंग में जेल के कई अधिकारी व वार्डर शामिल रहे। बन्दियों के मैसेज भेजने के लिए वार्डर मनमाफिक वसूली करते है। सूत्रों का कहना है कि स्थानीय व आसपास जिलों के बन्दियों के अलावा बांग्लादेशी बन्दी भी इन्ही वार्डर से मैसेज करवाते है। मैसेज के माध्यम से बन्दी खर्च के लिए पैसा मंगवाते है। विदेशों से आनी वाली रकम का 10 फीसद हिस्सा रकम लाने वाला वार्डर रखता है शेष धनराशि जेल में बंद बंदी को मिल जाती है। इसका खुलासा एटीएस टीम की गुपचुप तरीके से हो रही जांच सेे हुआ था।

मामला सुर्खियों में आने के बाद जेल मुख्यालय के तत्कालीन डीजी पुलिस/आईजी जेल ने इसकी जांच लखनऊ परिक्षेत्र के तत्कालीन DIG जेल से कराई। सूत्रों को कहना है कि जांच करने जेल पहुंचे डीआईजी जेल ने एटीएस के चिन्हित करीब 40 बंदियों व वार्डरों को गुमटी पर बुलाकर पूछताछ की। बन्दी के बैरकों से आने के बाद डीआईजी जेल ने नंबरदार कैदियों से बुलाये गए बंदियों का बैरक में रखा सामान भी मंगवाया। सूत्रों का कहना है कि इस दौरान बंदियों के पास मिली आपत्तिजनक वस्तुओ को दबा दिया गया। DIG बगैर वार्डर व बंदियों के बयान लिए और वापस चले गए। उन्होंने विभागाध्यक्ष को जो जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की है उसमें कुछ वार्डरों की भूमिका संदिग्ध बताते हुए जेल प्रशासन के अधिकारियों को क्लीन चिट दे दी गई। जबकि एटीएस आई जांच में पैसे के लेनदेन में लगे कई जेल वार्डरों के बैंक खातों में मोटी रकम होने की पुष्टि भी हुई थी।

ATS  की जांच रिपोर्ट को जेल मुख्यालय भेजे हुए करीब ड़ेढ़ साल से अधिक का समय बीत चुका है। इसके बावजूद आज तक न तो किसी भी दोषी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की गई और न ही किसी से कोई स्पष्टीकरण मांगा गया। इस मामले को लेकर जेलकर्मियों में तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे है। चर्चा है कि ऊंची पहुंच और जुगाड़ वाले अधिकारियों के खिलाफ विभाग में कोई कार्रवाई नहीं होती है। विभाग के तमाम अधिकारियो के तबादले किए हुए लेकिन करीब तीन साल होने के बाद भी हटाया नहीं गया। इस संबंध में जब डीआईजी जेल मुख्यालय एके सिंह से बात की गई तो उन्होंने बताया कि इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। पता करने के बाद ही कुछ बता पाएंगे। किसी अधिकारी या सुरक्षाकर्मी के खिलाफ कार्रवाई के सवाल को वह टाल गए।

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