
संजय सक्सेना
AI and Deepfakes: भारत में चल रहा ब्रिक्स सम्मेलन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के फायदे और नुकसान को लेकर दुनिया को आईना दिखाने के लिये एक बड़ा महत्वपूर्ण प्लेटफार्म साबित हो सकता है। AI क्रांति को लेकर जब हम गहराई में जाते हैं, तो रोजगार से लेकर तमाम क्षेत्रों में इसका प्रभाव और डीपफेक से निपटने के वैश्विक प्रयास दो सबसे बड़े और महत्वपूर्ण किनारे दिखाई देते हैं, जहां आज की दुनिया को AI को लेकर सबसे सख्त फैसलों और सुरक्षा के लिये सख्त कदम उठाने की जरूरत है।
ये दोनों विषय केवल तकनीकी चुनौतियां नहीं हैं, बल्कि ये हमारे सामाजिक ढांचे के स्थायित्व और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुद्धता से सीधे जुड़े हुए हैं। जब हम रोजगार के मोर्चे पर AI के असर का विश्लेषण करते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि हम श्रम बाजार के एक ऐतिहासिक पुनर्गठन के गवाह बन रहे हैं।
अतीत की औद्योगिक क्रांतियों ने नीली वर्दी वाले श्रमिकों यानी मैनुअल लेबर को प्रभावित किया था, लेकिन इस बार की AI क्रांति सीधे सफेदपोश नौकरियों (वाइट कलर जॉब्स) पर हमला कर रही है। डेटा एंट्री, बुनियादी कोडिंग, कंटेंट राइटिंग, कस्टमर सपोर्ट और कानूनी दस्तावेजों की शुरुआती समीक्षा जैसे काम, जो कभी लाखों युवाओं की आजीविका का साधन थे, अब कुछ सेकंड में AI द्वारा पूरे किए जा रहे हैं।
इसका असर यह हो रहा है कि कॉर्पोरेट जगत में लागत कम करने और मुनाफा बढ़ाने की होड़ मची है, जिससे बड़े पैमाने पर छंटनी और नई नौकरियों के अवसरों में कमी देखी जा रही है। लेकिन इस संकट का एक दूसरा पहलू भी है जिसे विशेषज्ञ स्किल री-ओरिएंटेशन या कौशल का पुनर्गठन कहते हैं। AI केवल नौकरियां छीन नहीं रहा है, बल्कि यह नए तरह के काम भी पैदा कर रहा है, जैसे कि प्रॉम्ट इंजीनियर्स, AI एथिक्स स्पेशलिस्ट और डेटा क्यूरेटर्स।
चुनौती यह नहीं है कि दुनिया में काम खत्म हो जाएगा, बल्कि चुनौती यह है कि जिस गति से पुरानी नौकरियां जा रही हैं, क्या हमारा कार्यबल उतनी गति से खुद को अपग्रेड कर पा रहा है? इस बदलाव के कारण समाज में एक बड़ा डिजिटल डिवाइड या आर्थिक असमानता पैदा होने का खतरा है, जहां उच्च तकनीकी कौशल वाले लोग तो बेहद अमीर हो जाएंगे, लेकिन पारंपरिक कौशल वाले लोग पूरी तरह हाशिए पर चले जाएंगे।
इस आर्थिक उथल-पुथल के समानांतर, एक और संकट हमारी सामाजिक स्थिरता को खोखला कर रहा है, और वह है डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से किसी भी व्यक्ति के चेहरे, हाव-भाव और आवाज की ऐसी हूबहू नकल तैयार की जा सकती है कि असली और नकली का अंतर करना लगभग असंभव हो जाता है।
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चुनावों के दौरान फर्जी राजनीतिक बयान जारी करके मतदाताओं को गुमराह करना, वित्तीय धोखाधड़ी के लिए किसी बड़े अधिकारी या परिवार के सदस्य की नकली आवाज का इस्तेमाल करना और महिलाओं की अश्लील या आपत्तिजनक तस्वीरें बनाकर उन्हें प्रताड़ित करना इसके आम उदाहरण बन चुके हैं। यह तकनीक सीधे तौर पर समाज के सबसे बड़े स्तंभ विश्वास पर चोट करती है।
जब समाज में यह धारणा आम हो जाएगी कि जो दिख रहा है या सुनाई दे रहा है वह झूठ हो सकता है, तो सूचनाओं की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो जाएगी, जिससे अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है। इस भयानक खतरे को भांपते हुए, पिछले कुछ समय में डीपफेक से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर अप्रत्याशित प्रयास शुरू हुए हैं। दुनिया भर की सरकारें, तकनीकी कंपनियां और नागरिक समाज अब इस बात पर सहमत हैं कि इस अनियंत्रित तकनीक पर लगाम लगाना बेहद जरूरी है।
कानूनी मोर्चे पर, यूरोपीय संघ ने इस दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाते हुए AI एक्ट को लागू किया है, जो दुनिया का पहला व्यापक AI कानून है। यह कानून हाई-रिस्क AI प्रणालियों पर कड़े प्रतिबंध लगाता है और डीपफेक सामग्री को अनिवार्य रूप से लेबल करने का नियम बनाता है, ताकि उपभोक्ताओं को पता चल सके कि वे जो देख रहे हैं वह कृत्रिम रूप से तैयार किया गया है।
अमेरिका और भारत जैसी बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं ने भी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी अखंडता को बचाने के लिए कड़े नियम बनाए हैं, जिसके तहत बिना सहमति के किसी का डीपफेक बनाना या उसे सोशल मीडिया पर फैलाना एक गंभीर और दंडनीय अपराध घोषित किया जा चुका है।इसके साथ ही, तकनीकी कंपनियां अब केवल कानून के भरोसे नहीं बैठी हैं, बल्कि वे तकनीक का मुकाबला तकनीक से ही करने की रणनीति पर काम कर रही हैं।
माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और मेटा जैसी कंपनियों ने ऐसे एडवांस्ड एल्गोरिदम और टूल विकसित किए हैं जो डीपफेक वीडियो में पिक्सल के स्तर पर होने वाली विसंगतियों और आवाज के कृत्रिम पैटर्न को पकड़ सकते हैं। वॉटरमार्किंग और क्रिप्टोग्राफिक प्रूवनेंस जैसी तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे किसी भी डिजिटल कंटेंट के जन्म और उसके इतिहास को ट्रैक किया जा सके।
इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर कंटेंट ऑथेंटिसिटी इनिशिएटिव्स CAI जैसे गठबंधन काम कर रहे हैं, जो डिजिटल मीडिया की प्रामाणिकता की जांच के लिए नए वैश्विक मानक तय कर रहे हैं। हालांकि, इन तमाम तकनीकी और कानूनी प्रयासों के बावजूद, सबसे बड़ी चुनौती इसकी गति और पहुंच को लेकर है। कानून और डिटेक्शन टूल्स हमेशा AI के नए अपडेट्स से एक कदम पीछे रह जाते हैं। इसलिए, इस लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण हथियार डिजिटल साक्षरता और जन जागरूकता को माना जा रहा है।
जब तक आम नागरिक किसी भी सनसनीखेज वीडियो या ऑडियो को देखने के बाद उस पर तुरंत भरोसा करने के बजाय उसकी सत्यता की जांच करना नहीं सीखेंगे, तब तक डीपफेक का खतरा बना रहेगा। रोजगार का संकट हो या डीपफेक की चुनौती, AI ने मानवता को एक ऐसे चौराहे पर ला खड़ा किया है जहां हमारा विवेक, हमारी नीतियां और हमारी एकजुटता ही यह तय करेगी कि यह तकनीक हमारा भविष्य संवारेगी या उसे अंधकार में धकेल देगी।
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2 thoughts on “दुनिया की चिंता, AI कैसे बनता जा रहा है भस्मासुर”
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