2024 की कहानी दोहराएगी SP या योगी फिर लिखेंगे सत्ता की पटकथा

Untitled 3 copy
संजय सक्सेना
  संजय सक्सेना

UP 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ सत्ता की लड़ाई अब धीरे-धीरे अपने असली रूप में सामने आने लगी है। भारतीय जनता पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार की उपलब्धियों को चुनावी वोट में बदलने की है, जबकि समाजवादी पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले अप्रत्याशित बढ़त को विधानसभा की सत्ता तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का शासन मॉडल और अखिलेश यादव का PDA गठजोड़ आमने-सामने है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन आगे है, बल्कि यह है कि 2024 में बदला सामाजिक समीकरण 2027 में कितना टिकाऊ साबित होता है।

403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में 2022 का जनादेश BJP के पक्ष में बेहद स्पष्ट था। BJP ने 255 सीटें जीतीं और समाजवादी पार्टी 111 सीटों तक पहुंची। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने इस तस्वीर को पूरी तरह झकझोर दिया। BJP 33 लोकसभा सीटों पर सिमट गई, जबकि SP ने 37 सीटें जीतकर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल किया। BJP का मत प्रतिशत करीब 41 प्रतिशत था और SP का लगभग 34 प्रतिशत। अंतर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन सीटों में उसका प्रभाव असाधारण रहा। यही वजह है कि BJP 2027 को 2024 की भरपाई का चुनाव मानकर चल रही है। BJP की रणनीति का पहला हथियार शासन का रिपोर्ट कार्ड है। पार्टी 2012 से 2017 के SP शासन और 2017 के बाद योगी सरकार के बीच सीधी तुलना करने की तैयारी में है। कानून व्यवस्था, माफिया पर कार्रवाई, महिला सुरक्षा, बिजली, गरीब कल्याण और बुनियादी ढांचा इस तुलना के प्रमुख आधार होंगे। BJP का तर्क होगा कि 2017 के बाद प्रदेश में अपराधियों पर कार्रवाई की नीति बदली और शासन में प्रशासनिक कठोरता आई।

ये भी पढें

BJP की जीत में छिपा 2028 का सियासी अलार्म

सरकार के आंकड़े भी इस दावे को राजनीतिक ताकत देते हैं। 2017 के बाद हजारों अपराधियों की गिरफ्तारी, गैंगस्टर कानून के तहत कार्रवाई और अरबों रुपये की संपत्तियों की जब्ती को BJP चुनावी प्रचार में प्रमुखता से इस्तेमाल कर सकती है। लेकिन यहीं विपक्ष का सवाल भी खड़ा होगा। क्या कठोर कार्रवाई का मतलब अपराध पूरी तरह खत्म हो जाना है? क्या थाने से लेकर अदालत तक आम आदमी को समान सुरक्षा और न्याय मिल रहा है? 2027 में BJP को आंकड़ों के साथ इन सवालों का जवाब भी देना होगा।विकास BJP का दूसरा बड़ा स्तंभ होगा। UP में एक्सप्रेसवे का विस्तार, नए हवाई अड्डे, औद्योगिक परियोजनाएं, बिजली व्यवस्था, एक जनपद एक उत्पाद और निवेश को बढ़ावा देने वाली नीतियां सरकार की उपलब्धियों में गिनी जाएंगी। 2026 के बजट में पूंजीगत व्यय के लिए दो लाख करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान भी विकास की प्राथमिकता को दर्शाता है। सरकार निवेश प्रस्तावों और संभावित रोजगार के बड़े आंकड़े पेश कर सकती है।

लेकिन चुनावी राजनीति में प्रस्ताव और परिणाम के बीच का अंतर बहुत मायने रखता है। निवेश के हजारों प्रस्ताव होना अलग बात है और उन प्रस्तावों से जमीन पर कारखाने और रोजगार पैदा होना अलग। युवा पूछेगा कि नौकरी कहां है, किसान पूछेगा कि आमदनी कितनी बढ़ी, व्यापारी पूछेगा कि कारोबार कितना सुधरा और परिवार पूछेगा कि महंगाई के बीच उसकी बचत कितनी बची। इसलिए BJP के लिए विकास का असली रिपोर्ट कार्ड सरकारी विज्ञप्ति नहीं, मतदाता का अनुभव होगा। अखिलेश यादव की सबसे बड़ी ताकत 2024 का सामाजिक संदेश है। SP ने PDA के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक साझा राजनीतिक मंच देने की कोशिश की और लोकसभा चुनाव में उसे महत्वपूर्ण सफलता मिली। अब पार्टी दलित समाज के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने और सामाजिक न्याय के सवाल को चुनावी अभियान का केंद्रीय मुद्दा बनाने की तैयारी में है।

ये भी पढें

संतान की कुशलता के लिए रखें दुबली-दुबड़ी सप्तमी व्रत, जानें महत्व

संविधान, आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवालों को BJP के खिलाफ व्यापक सामाजिक गोलबंदी में बदलने की कोशिश होगी। लेकिन PDA की राह भी आसान नहीं है। यादव और मुस्लिम मतदाताओं का पारंपरिक आधार SP के साथ रहा है, लेकिन गैर यादव पिछड़ों और दलितों को स्थायी रूप से जोड़ना अलग चुनौती है। 2024 में किसी मुद्दे या राजनीतिक परिस्थिति के कारण बना गठबंधन 2027 में अपने आप कायम रहेगा, यह मान लेना SP के लिए जोखिम भरा होगा। उसे टिकट वितरण से लेकर संगठन तक वास्तविक भागीदारी दिखानी होगी।

BJP इसी कमजोर कड़ी पर चोट करेगी। गैर यादव पिछड़े, गैर जाटव दलित, सवर्ण, महिलाएं और छोटे सामाजिक समूह उसके सामाजिक समीकरण के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। पार्टी का संदेश होगा कि सरकारी योजनाओं का लाभ जाति देखकर नहीं बल्कि जरूरत के आधार पर दिया गया। मुफ्त राशन, आवास, बिजली, स्वास्थ्य और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी BJP के सबसे बड़े प्रचारक बनाए जा सकते हैं। बूथ स्तर पर लाभार्थियों से संपर्क इसी रणनीति का हिस्सा है। 2024 के झटके के बाद BJP के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि उसके सामाजिक आधार में दरार कहां और क्यों आई। यदि वह केवल हिंदुत्व और कानून व्यवस्था के सहारे आगे बढ़ती है और रोजगार, महंगाई तथा सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवालों को पीछे छोड़ देती है, तो विपक्ष को हमला करने का मौका मिलेगा।

ये भी पढें

मियावाकी पद्धति से झाँसी में बढ़ रही हरियाली, रेलवे के साथ वन विभाग ने भी बढ़ाया कदम

BJP के लिए हिंदुत्व उसका वैचारिक आधार है, लेकिन सत्ता में वापसी के लिए उसे शासन के प्रदर्शन की विश्वसनीयता भी साबित करनी होगी।अखिलेश के सामने भी उतनी ही कठिन परीक्षा है। PDA को सत्ता विरोधी भावना से जोड़ना आसान है, लेकिन 403 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करना और अलग-अलग सामाजिक समूहों को साथ रखना कठिन। SP को यह बताना होगा कि सरकार बदलने के बाद रोजगार, कानून व्यवस्था, निवेश, किसान और गरीबों के लिए उसकी ठोस नीति क्या होगी। केवल BJP विरोधी राजनीति से सत्ता की सीढ़ी पूरी नहीं होगी।यही कारण है कि 2027 की लड़ाई में असली मुकाबला दो नारों का नहीं, दो राजनीतिक मॉडलों का होगा। BJP शासन, सुरक्षा, विकास और हिंदुत्व को जोड़कर जनता के सामने जाएगी। SP सामाजिक न्याय, PDA और प्रतिनिधित्व को अपना आधार बनाएगी।

2022 का जनादेश BJP की ताकत दिखाता है और 2024 का परिणाम उसकी कमजोर कड़ियां। आखिरकार उत्तर प्रदेश का मतदाता दोनों से एक ही सवाल पूछेगा काम क्या किया और आगे क्या करेंगे। BJP के पास नौ साल का शासन रिकॉर्ड है, SP के पास सत्ता में लौटने की राजनीतिक बेचैनी और 2024 का आत्मविश्वास। अगर BJP 2024 की चोट से सबक लेकर अपने सामाजिक समीकरण को फिर मजबूत कर लेती है, तो योगी की राह आसान होगी। अगर अखिलेश PDA को जातीय गठजोड़ से आगे बढ़ाकर व्यापक सामाजिक गठबंधन बना लेते हैं, तो मुकाबला बेहद कठिन होगा। 2027 में फैसला इसी बात से होगा कि कौन दल आंकड़ों, संगठन और सामाजिक भरोसे को एक साथ चुनावी ताकत में बदल पाता है।

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

Google Play Store: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.app.nayalooknews

ये भी पढें

BJP की जीत में छिपा 2028 का सियासी अलार्म

सपा का PDA आखिर है क्या? पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक से ‘पंडित’ तक क्यों बदली चर्चा

मियावाकी पद्धति से झाँसी में बढ़ रही हरियाली, रेलवे के साथ वन विभाग ने भी बढ़ाया कदम

 

 

 

Spread the love

Delhi Politics Uttar Pradesh

TMC से पहले शिवसेना और LJP तक, जब चुनाव आयोग ने रोके पार्टी के नाम और सिंबल; जानिए क्या है पूरा नियम

फूल-घास से धनुष-बाण और बंगला तक, जब चुनाव आयोग ने फ्रीज किए बड़े दलों के चुनाव चिन्ह New Delhi : भारतीय राजनीति में पार्टी के भीतर वर्चस्व की लड़ाई कई बार ऐसी स्थिति पैदा कर देती है, जब विवाद सिर्फ नेतृत्व तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर भी पहुंच […]

Spread the love
Read More
Politics Uttar Pradesh

सपा का PDA आखिर है क्या? पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक से ‘पंडित’ तक क्यों बदली चर्चा

सपा का PDA आखिर क्या है? पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक से पंडित तक क्यों हो रही चर्चा Lucknow : उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी का PDA फॉर्मूला एक बार फिर चर्चा में है। 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच सपा ने ‘समाजवादी PDA यात्रा’ के लिए अपना प्रचार रथ तैयार कर लिया है। सितंबर 2026 […]

Spread the love
Read More
homeslider Uttar Pradesh

मियावाकी पद्धति से झाँसी में बढ़ रही हरियाली, रेलवे के साथ वन विभाग ने भी बढ़ाया कदम

मियावाकी पद्धति से हरित क्रांति की ओर झाँसी मंडल, उत्तर मध्य रेलवे की अनूठी पहल- North Central : बदलते पर्यावरणीय परिवेश और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच हरित क्षेत्र बढ़ाना आज समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गया है। इसी दिशा में मियावाकी पद्धति कम स्थान में अधिक घना वन विकसित करने का एक प्रभावी […]

Spread the love
Read More