“मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?”

Melody

रंजन कुमार सिंह

Melody जॉर्जिया मेलॉनी को नरेंद्र मोदी द्वारा मेलोडी चाकलेट गिफ्ट किए जाने का वीडियो वायरल होते ही पारले ब्रांड का यह चॉकलेट अचानक मशहूर हो पड़ा है। पार्ले की ‘मेलोडी’ चॉकलेट अपने अनोखे डुअल-टेक्सचर के लिए जानी जाती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके बाहर कारमेल (Caramel) की एक मीठी परत होती है और अंदर पिघला हुआ क्रीमी चॉकलेट भरा होता है। मेलोडी को खास बनाने वाली कई बातें हैं।

यूनिक डुअल-फ्लेवर: बाहर का सख्त कारमेल और अंदर का स्मूथ चॉकलेट मिलकर हर एक बाइट (bite) में एक शानदार स्वाद देते हैं।

किफायती दाम: 1983 में लॉन्च हुई यह टॉफी बेहद कम कीमत में प्रीमियम चॉकलेट जैसा स्वाद देती है, जो इसे हर उम्र के लोगों (खासकर बच्चों और महिलाओं) के बीच बेहद लोकप्रिय बनाती है। आइकॉनिक टैगलाइन: इसका सबसे बड़ा आकर्षण इसका विज्ञापन और टैगलाइन है “मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?” है। इस रहस्यमयी टैगलाइन ने दशकों से लोगों को इसके स्वाद के प्रति आकर्षित किया है।

लॉन्ग-लास्टिंग टेस्ट: यह एक हार्ड-बॉइल्ड कैंडी है, जो मुंह में धीरे-धीरे पिघलती है और लंबे समय तक चॉकलेट-कारमेल का स्वाद बनाए रखती है। यह कैंडी आज भी भारत के हर छोटे-बड़े किराना स्टोर पर आसानी से मिल जाती है। बिस्किट बनाने वाली कंपनी पारले पहले ऑरेंज कैंडी बनाती थी।

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कौन है मालिक?

पारले-जी भारत में एक जाना पहचाना ब्रांड है। पारले सिर्फ एक बिस्किट ब्रांड नहीं है। बल्कि यह भारत में एक जाना पहचाना नाम है, जिसने लगभग एक सदी तक बदलते स्वाद, कॉम्पिटीशन और आर्थिक बदलावों का सामना किया है। पारले-जी से लेकर मोनाको और हाइड एंड सीक तक इस ब्रांड ने भारत की एफएमसीजी की कहानी को एक आकार दिया है।पारले प्रोडक्ट्स का मालिकाना हक चौहान परिवार के पास है। आपको बता दें कि यह कोई पब्लिकली लिस्टेड या फिर सरकारी कंपनी नहीं है। यह एक प्राइवेट इंडियन इंटरप्राइज है। कंपनी की स्थापना 1929 में मोहनलाल दयाल चौहान ने की थी और 2026 में पारले प्रोडक्ट्स उनके वंशजों द्वारा ही चलाई जा रही है। पारले प्रोडक्ट्स की मौजूदा लीडरशिप विजय चौहान के हाथों में है। विजय चौहान अध्यक्ष और मैनेजिंग डायरेक्टर के तौर पर काम करते हैं और साथ ही शरद चौहान और राज चौहान भी कंपनी की कमान संभालते हैं। परिवार ने जानबूझकर बिजनेस को बाहरी शेयरहोल्डर्स से दूर रखा है।

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क्या है मालिकों का धर्म

चौहान परिवार हिंदू धर्म का है। वे मूल रूप से गुजरात के वलसाड जिले के पारडी के रहने वाले हैं। पारले की शुरुआत ही राष्ट्रवाद से हुई थी। मोहनलाल दयाल चौहान मूल रूप से मुंबई में एक रेशम व्यापारी थे। 1920 के दशक के स्वदेशी आंदोलन से वे काफी ज्यादा प्रेरित हुए और उन्होंने भारत में ब्रिटिश खाद्य उत्पादों को चुनौती देने की ठानी। उस समय बिस्कुट और कन्फेक्शनरी आयातित लग्जरी चीजें थीं, जो सिर्फ अमीर लोगों के लिए ही सस्ती थी। इसे बदलने के लिए वह मॉडल कन्फेक्शनरी तकनीक सीखने के लिए जर्मनी गए और लगभग ₹60,000 की मशीनरी के साथ भारत लौटे। 1928-29 में उन्होंने मुंबई के विले पारले इलाके में सिर्फ 12 परिवार के सदस्यों के साथ एक छोटी सी फैक्ट्री लगाई। कंपनी का नाम भी इसी जगह से पड़ा।

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कैंडी से बिस्किट तक का सफर

आपको बता दें कि पारले का पहला प्रोडक्ट बिस्किट नहीं था। बल्कि यह एक ऑरेंज कैंडी थी। बिस्किट लगभग 1 दशक बाद 1938-39 में पारले ग्लूको के लॉन्च के साथ आए। समय के साथ पारले ग्लूको पारले-जी में बदल गया, जो 2011 में जाकर वॉल्यूम के हिसाब से दुनिया का सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्किट बन गया।


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