Aligarh Eid Controversy : उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में ईद-उल-अजहा से पहले धार्मिक आयोजनों को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। मुस्लिम धर्मगुरु मुफ्ती अब्दुल्ला नदवी ने प्रशासन से ईद की नमाज के दौरान ईदगाह मार्ग को कुछ समय के लिए ट्रैफिक मुक्त करने की मांग की है। उनके बयान के बाद राजनीतिक और धार्मिक माहौल गर्म हो गया है। मुफ्ती अब्दुल्ला नदवी ने कहा कि जब कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए प्रशासन सड़कें बंद कर सकता है, तो ईद की नमाज के लिए डेढ़ घंटे का समय देने में दिक्कत क्यों होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ईद साल में केवल दो बार आती है और नमाज का समय भी सीमित होता है। ऐसे में अगर प्रशासन थोड़ी देर के लिए ट्रैफिक डायवर्ट कर दे तो इससे किसी को ज्यादा परेशानी नहीं होगी।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें कांवड़ यात्रा की व्यवस्थाओं से कोई आपत्ति नहीं है। उनका कहना है कि हर धर्म को अपने त्योहार और धार्मिक आयोजन शांति से मनाने का अधिकार मिलना चाहिए। मुफ्ती ने उदाहरण देते हुए कहा कि शहर में कई बार सड़क निर्माण और रेलवे प्रोजेक्ट के कारण लंबे समय तक ट्रैफिक डायवर्ट किया जाता है, तो फिर धार्मिक आयोजन के लिए अस्थायी व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती। मौलाना ने प्रशासन से मांग की है कि ईदगाह जाने वाले रास्तों को नमाज के दौरान कुछ समय के लिए ट्रैफिक मुक्त रखा जाए ताकि लोगों को आसानी हो सके। उन्होंने कहा कि जल्द ही इस मांग को लेकर अधिकारियों से औपचारिक मुलाकात भी की जाएगी।
हालांकि इस बयान के बाद विश्व हिंदू परिषद ने कड़ा विरोध जताया है। विहिप के ब्रज प्रांत मीडिया प्रमुख प्रतीक रघुवंशी ने कहा कि सड़क पर नमाज की मांग पूरी तरह अनुचित है और इससे कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले ही सार्वजनिक सड़कों पर नमाज की अनुमति न देने के निर्देश दे चुके हैं। प्रतीक रघुवंशी ने यह भी कहा कि कांवड़ यात्रा और सड़क पर नमाज की तुलना करना गलत है। उनके अनुसार कांवड़ यात्रा एक लंबी धार्मिक यात्रा होती है, जिसके लिए प्रशासन विशेष सुरक्षा और यातायात व्यवस्था करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की मांगें शहर के माहौल को खराब कर सकती हैं।
फिलहाल इस मुद्दे ने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा तेज कर दी है। एक तरफ मुस्लिम समुदाय इसे समान व्यवहार का मुद्दा बता रहा है, वहीं दूसरी ओर हिंदू संगठनों का कहना है कि सार्वजनिक व्यवस्था और कानून का पालन जरूरी है। अब सबकी नजर प्रशासन के अगले कदम पर टिकी है कि वह इस संवेदनशील मामले में क्या फैसला लेता है।
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