UP के बहुजन थलपति विजय में देखते हैं चंद्रशेखर की छवि

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  • तमाम झंझावतों के बीच भी तेजी से उभर सकते हैं चंद्रशेखर

जयराम अनुरागी

बलिया। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद देश की राजनीति में एक नई बहस ने जोर पकड़ लिया है। उत्तर प्रदेश की बहुजन राजनीति में इन दिनों दक्षिण भारत के उभरते नेता थलपति विजय और उत्तर प्रदेश के दलित-बहुजन चेहरे चन्द्रशेखर आज़ाद के बीच समानताओं को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। तमिलनाडु में तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) के संस्थापक थलपति विजय ने 2 फरवरी 2024 को अपनी पार्टी की घोषणा की थी और बहुत ही कम समय में राज्य की राजनीति में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। 4 मई 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों में उनकी पार्टी का प्रदर्शन अप्रत्याशित रूप से सबसे आगे रहा, जिसे कई विश्लेषक युवा, पारदर्शी और मुद्दा-आधारित राजनीति का परिणाम मान रहे हैं।

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उधर उत्तर प्रदेश में आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) के संस्थापक चन्द्रशेखर आज़ाद ने 15 मार्च 2020 को अपनी पार्टी की नींव रखी। लगातार राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने चार वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत की और संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। अब वे संगठन विस्तार के लिए आगामी दिनों में राज्यव्यापी “सत्ता परिवर्तन यात्रा” की तैयारी में हैं।दोनों नेताओं के बीच सबसे बड़ी समानता उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि में देखी जा रही है। विजय की TVK हो या चन्द्रशेखर आज़ाद की ASP दोनों ही सामाजिक न्याय, वंचित वर्गों के उत्थान, भ्रष्टाचार विरोध और समान अवसर की राजनीति को केंद्र में रखते हैं। उनकी प्रेरणा में डॉ. भीमराव अंबेडकर और पेरियार ई. वी. रामासामी जैसे विचारकों का प्रभाव माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि देश में उभर रही एक नई सामाजिक-राजनीतिक धारा का संकेत है, जिसमें क्षेत्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर सामाजिक न्याय की राजनीति नया आकार ले रही है।

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समर्थकों के बीच यह भी चर्चा है कि यदि तमिलनाडु में थलपति विजय की पार्टी ने तेजी से जनाधार बनाया है, तो उत्तर प्रदेश में चन्द्रशेखर आज़ाद भी उसी तरह की राजनीतिक संभावनाएं विकसित कर सकते हैं। हालांकि, यह पूरी तरह भविष्य की राजनीतिक परिस्थितियों और जनसमर्थन पर निर्भर करेगा। कुल मिलाकर, भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय आकार लेता दिख रहा है, जहाँ युवा नेतृत्व और सामाजिक न्याय की विचारधारा मिलकर पारंपरिक राजनीति को चुनौती दे रही है।


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