बिहार में परिवारवाद का नया अध्याय और निशांत कुमार की चुनौती

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अखिलेश सिंह

बिहार की राजनीति में परिवारवाद कोई नया विषय नहीं है। आजादी के बाद कांग्रेस युग से लेकर समाजवादी राजनीति, मंडल आंदोलन और क्षेत्रीय दलों के उभार तक राज्य की राजनीति लगातार कुछ प्रभावशाली परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। फर्क सिर्फ इतना रहा कि समय के साथ परिवारवाद का स्वरूप बदलता गया। कभी इसे राजनीतिक विरासत कहा गया, कभी सामाजिक प्रतिनिधित्व और कभी लोकतंत्र की कमजोरी कहा गया। अब नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार के जनता दल यूनाइटेड में औपचारिक प्रवेश और बिहार सरकार में मंत्री बनाए जाने के बाद बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। यह घटना केवल एक नेता के पुत्र के राजनीति में आने भर की नहीं है। इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि नीतीश कुमार लंबे समय तक स्वयं को परिवारवाद से अलग राजनीति का प्रतीक बताते रहे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कभी परिवार को सत्ता संरचना का हिस्सा नहीं बनने दिया। ऐसे में निशांत कुमार की सक्रिय राजनीतिक भूमिका को जेडीयू की रणनीतिक और वैचारिक दिशा में बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

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बिहार की राजनीति का इतिहास देखें, तो परिवार आधारित नेतृत्व की जड़ें काफी गहरी हैं। लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय की राजनीति को जनांदोलन का रूप दिया, लेकिन समय के साथ राष्ट्रीय जनता दल पूरी तरह परिवार केंद्रित पार्टी बन गई। राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं थी, फिर तेजस्वी यादव विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभरे थे। इसी प्रकार राम विलास पासवान के बाद चिराग पासवान ने राजनीतिक विरासत संभाली थी। बिहार में यह मॉडल अब असामान्य नहीं बल्कि लगभग स्वीकृत राजनीतिक संस्कृति बन चुका है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बिहार की मौजूदा राजनीति में लगभग एक तिहाई प्रभावशाली नेता किसी न किसी राजनीतिक परिवार से जुड़े हैं। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में टिकट वितरण में भी पारिवारिक प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। क्षेत्रीय दलों में यह प्रवृत्ति और अधिक मजबूत है क्योंकि वहां संगठन अक्सर एक केंद्रीय नेता की लोकप्रियता पर आधारित होता है।

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इसी पृष्ठभूमि में निशांत कुमार की एंट्री महत्वपूर्ण हो जाती है। अब तक वे सार्वजनिक जीवन से लगभग दूर रहे। न आक्रामक राजनीतिक बयान, न जनसभाएं और न ही संगठनात्मक सक्रियता रही है। लेकिन जेडीयू में शामिल होने और सीधे मंत्री पद मिलने से यह स्पष्ट संकेत गया है कि पार्टी भविष्य के नेतृत्व की तैयारी कर रही है। यह भी माना जा रहा है कि नीतीश कुमार के बाद जेडीयू को ऐसा चेहरा चाहिए जो पार्टी को एकजुट रख सके और राजनीतिक विरासत का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाए। हालांकि राजनीति में उत्तराधिकार की राह हमेशा आसान नहीं होती है। बिहार की जनता केवल उपनाम के आधार पर नेतृत्व स्वीकार नहीं करती है। यहां राजनीतिक संघर्ष, जनसंपर्क और सामाजिक समीकरणों की गहरी समझ जरूरी मानी जाती है। तेजश्वी यादव ने लंबे समय तक विपक्ष की राजनीति करते हुए अपनी पहचान बनाई, जबकि चिराग पासवान ने लगातार जनता के बीच सक्रिय रहकर खुद को स्थापित किया है।

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निशांत कुमार के सामने भी यही चुनौती होगी कि वे “ पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे” की सीमित पहचान से बाहर निकलकर स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व बना सकें। उनकी सबसे बड़ी ताकत निश्चित रूप से नीतीश कुमार की प्रशासनिक और राजनीतिक छवि होगी। बिहार में सुशासन, सड़क, शिक्षा और कानून व्यवस्था के मुद्दों पर नीतीश कुमार की एक अलग पहचान रही है। जेडीयू कार्यकर्ताओं का एक वर्ग मानता है कि निशांत कुमार इस विरासत को आगे बढ़ा सकते हैं। लेकिन राजनीति केवल विरासत से नहीं चलती है। जनता नेतृत्व में संवाद क्षमता, संघर्षशीलता और राजनीतिक दृष्टि भी देखती है। परिवारवाद पर बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। समर्थकों का तर्क है कि राजनीति भी अन्य क्षेत्रों की तरह अनुभव और सामाजिक पूंजी का क्षेत्र है, जहां परिवार से जुड़ा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से राजनीतिक माहौल को बेहतर समझता है। वहीं आलोचकों का कहना है कि इससे लोकतांत्रिक अवसर सीमित हो जाते हैं और पार्टी संगठन में मेहनत करने वाले सामान्य कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर होता है।

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दरअसल बिहार की राजनीति अब ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां परिवारवाद को पूरी तरह अस्वीकार करना शायद किसी भी बड़े दल के लिए आसान नहीं रह गया है।मतदाता भी कई बार परिचित राजनीतिक परिवारों को स्थिर विकल्प मानते हैं। यही कारण है कि लगभग हर बड़े दल में किसी न किसी रूप में राजनीतिक उत्तराधिकार दिखाई देता है। निशांत कुमार की सक्रिय राजनीति में एंट्री इसलिए भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह जेडीयू की राजनीति का चरित्र बदल सकती है। जिस दल ने लंबे समय तक खुद को वैचारिक और संगठन आधारित राजनीति का प्रतिनिधि बताया, वह अब प्रत्यक्ष राजनीतिक उत्तराधिकार की राह पर दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि निशांत कुमार केवल विरासत के संरक्षक बनते हैं या बिहार की राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान भी स्थापित कर पाते हैं। बिहार की राजनीति में परिवारवाद का यह नया अध्याय केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक शुरुआत नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक यथार्थ का संकेत है।


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