पाकिस्तान का ‘खेल’ और ‘तेल’ दोनों खत्म! कूटनीति हुई फेल, ऊर्जा संकट ने बढ़ाई मुश्किलें

पाकिस्तान

पाकिस्तान : कल तक खुद को वैश्विक कूटनीति का अहम खिलाड़ी बताने वाला पाकिस्तान आज गंभीर आर्थिक और ऊर्जा संकट से जूझता नजर आ रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कराने की उसकी महत्वाकांक्षा न केवल असफल रही, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया ने उसकी कमजोर रणनीति और दोहरी नीति को भी उजागर कर दिया। इस्लामाबाद में आयोजित ईरान-अमेरिका वार्ता को ऐतिहासिक पहल बताया गया था, लेकिन करीब 21 घंटे चली बातचीत के बावजूद कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। स्थिति तब और खराब हो गई जब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी प्रतिनिधियों से मिलने से साफ इनकार कर दिया। इस कदम ने पाकिस्तान की कूटनीतिक कोशिशों पर सीधा पानी फेर दिया और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए।

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विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान एक साथ अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन यही रणनीति अब उसके लिए उल्टी पड़ती दिख रही है। चीन का अप्रत्यक्ष प्रभाव और ईरान की सख्त नीति ने पूरे समीकरण को जटिल बना दिया। इस कूटनीतिक असफलता के बीच पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति भी लगातार बिगड़ रही है। राजधानी इस्लामाबाद में सुरक्षा कड़े कर दिए गए हैं, बार-बार लॉकडाउन जैसी स्थिति बन रही है और आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं। खुद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी मान चुके हैं कि क्षेत्रीय तनाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। दूसरी ओर, वैश्विक तेल संकट ने पाकिस्तान की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने के कारण कच्चे तेल की कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। आयात पर निर्भर पाकिस्तान के लिए यह स्थिति बेहद गंभीर बन गई है।

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पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्री मलिक ने स्वीकार किया है कि देश के पास केवल 5 से 7 दिनों का कच्चे तेल का भंडार बचा है, जबकि परिष्कृत तेल अधिकतम 21 दिनों तक ही चल सकता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पाकिस्तान के पास रणनीतिक पेट्रोल भंडार लगभग न के बराबर है। इसके विपरीत भारत के पास 60 से 70 दिनों का भंडार मौजूद है, जिससे वह इस संकट का बेहतर तरीके से सामना कर पा रहा है। IMF पर निर्भरता के चलते पाकिस्तान के पास नीतिगत विकल्प भी सीमित हो गए हैं। सरकार को पेट्रोल-डीजल पर करों में बदलाव करना पड़ा है। बढ़ती कीमतों के बीच डीजल पर टैक्स हटाकर उसका बोझ पेट्रोल पर डाला गया। साथ ही मोटरसाइकिल चालकों के लिए लक्षित सब्सिडी की घोषणा भी की गई, लेकिन हालात में ज्यादा सुधार नहीं हुआ। एक समय पेट्रोल की कीमत 485 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई, जिससे देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। सरकार ने बाद में 80 रुपये प्रति लीटर की कटौती की, लेकिन आम जनता की परेशानी अब भी कम नहीं हुई है।

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पूरे घटनाक्रम ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पाकिस्तान अपनी क्षमता से अधिक बड़ा खेल खेलने की कोशिश कर रहा है? एक ओर वह खुद को शांति का दूत बताने की कोशिश करता है, तो दूसरी ओर उसकी आंतरिक कमजोरियां और असफल कूटनीति उसकी साख को लगातार कमजोर कर रही हैं। आखिरकार, यह स्थिति एक सच्चाई को उजागर करती है—वैश्विक मंच पर दिखावा ज्यादा समय तक नहीं टिकता। इस्लामाबाद में जो हुआ, वह इसी का ताजा उदाहरण है, जहां कूटनीतिक महत्वाकांक्षा और आर्थिक वास्तविकता के बीच का अंतर साफ तौर पर सामने आ गया।


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