विनायक चतुर्थी : गणपति उत्सव

Ganpati Festival

लोकमान्य तिलक ने बनाया स्वराज का मंत्र

आचार्य संजय तिवारी

“ऊँ वक्रतुण्ड़ महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा।।”

GaneshFestival : यह मंत्र आज चहुंओर गूंज रहा है। पराधीन भारत मे जब यह गूंजा तो भारत ने स्वराज की यात्रा शुरू कर दी। इसी मंत्र ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को एक नई दिशा दे दी। इसका सूत्रपात किया लोकमान्य तिलक जी ने।1893 में बाल गंगाधर तिलक ने अपने समाचार पत्र, केसरी में सार्वजनिक गणेश उत्सव के जश्न की प्रशंसा की, और अगले वर्ष उन्होंने स्वयं केसरी कार्यालय में एक गणेश प्रतिमा स्थापित किया । उनके प्रयासों ने एक वार्षिक घरेलू त्योहार बड़ी अच्छी तरह से संगठित सार्वजनिक समारोह के रूप में बदल दिया। गणेश चतुर्थी को एक राष्ट्रीय त्योहार के रूप में लोकप्रिय बनाने के लिए तिलक ने गणेश को “सबके लिए भगवान” की मान्यता की अपील की। अब पूरा देश गणेशोत्सव में आनंदित हो रहा। विश्व के कई अन्य देशों में भी भारतीय समुदाय इस उत्सव को मना रहा है।

महाराष्ट्र में सामाजिक

एकता का निर्माण करने के लिए और जातियों के बीच की खाई को पाटने के संदर्भ में किया गया लोकमान्य तिलक का यह प्रयास बहुत सफल हुआ है । मंडप में गणेश की बड़ी सार्वजनिक छवियों को स्थापित करने वाले वह पहले व्यक्ति थे। उन्होंने ही नदियों समुद और दूसरे जलाशयों में गणेश उत्सव के 10 वे दिन मूर्तियों को जल में विसर्जित करने की परंपरा चलायी। लोकमान्य तिलक से प्रोत्साहित, गणेश चतुर्थी समारोह के उपलक्ष्य में आयोजित बौद्धिक बहस, कविता गायन, नाटक, संगीत, और लोक नृत्य के रूपों में समुदाय की भागीदारी बढ़ी। यह एक सभी जातियों और समुदायों के लोगों के लिए एक बैठक का माध्यम था, जब ब्रिटिश सरकार भीड़ भाड़ को नियंत्रित करने के लिए सामाजिक और राजनीतिक सम्मेलनों को रोकती थी और हतोत्साहित करती थी।

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गणेश चतुर्थी की सनातन परंपरा

भगवान आदि शंकराचार्य ने जिन पांच देवो को सनातन का आधार बताया है उनमे गणपति प्रमुख हैं। गणपति के साथ ही भगवान् शिव , माता दुर्गा , भगवान विष्णु और भगवान् सूर्य की पूजा का विधान है। गणेश को विध्नविनाशक या प्रथमदेव भी माना गया है। भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। यह मान्यता है कि भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था । गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव, 10 दिन के बाद, अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही धूम-धाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी इत्यादि में विसर्जन करते हैं।

गणपति स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्त

ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। दिन के विभाजन के अनुसार मध्याह्न काल, अंग्रेजी समय के अनुसार दोपहर के तुल्य होता है। भारतीय समय गणना के आधार पर, सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को पाँच बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। इन पाँच भागों को क्रमशः प्रातःकाल, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल के नाम से जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, गणेश स्थापना और गणेश पूजा, मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिये। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। मध्याह्न मुहूर्त में, भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करते हैं जिसे षोडशोपचार गणपति पूजा के नाम से जाना जाता है।

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गणेश चतुर्थी पर निषिद्ध चन्द्र-दर्शन

गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख के, नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है। नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गये।

मिथ्या दोष निवारण मन्त्र

चतुर्थी तिथि के प्रारम्भ और अन्त समय के आधार पर चन्द्र-दर्शन लगातार दो दिनों के लिये वर्जित हो सकता है। धर्मसिन्धु के नियमों के अनुसार सम्पूर्ण चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र दर्शन निषेध होता है और इसी नियम के अनुसार, चतुर्थी तिथि के चन्द्रास्त के पूर्व समाप्त होने के बाद भी, चतुर्थी तिथि में उदय हुए चन्द्रमा के दर्शन चन्द्रास्त तक वर्ज्य होते हैं। अगर भूल से गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जायें तो मिथ्या दोष से बचाव के लिये निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिये –
सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥

गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और गणेश चौथ के नाम से भी जाना जाता है।

वायु पुराण की कथा

वायु पुराण के अनुसार, यदि कोई भी भगवान कृष्ण की कथा को सुनकर व्रत रखता है तो वह (स्त्री/पुरुष) गलत आरोप से मुक्त हो सकता है। कुछ लोग इस पानी को शुद्ध करने की धारणा से हर्बल और औषधीय पौधों की पत्तियाँ मूर्ति विसर्जन करते समय पानी में मिलाते है। कुछ लोग इस दिन विशेष रूप से अपने आप को बीमारियों से दूर रखने के लिये झील का पानी का पानी पाते है। लोग शरीर और परिवेश से सभी नकारात्मक ऊर्जा और बुराई की सत्ता हटाने के उद्देश्य से विशेष रूप से गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश के आठ अवतार (अर्थात् अष्टविनायक) की पूजा करते हैं। यह माना जाता है कि गणेश चतुर्थी पर पृथ्वी पर नारियल तोड़ने की क्रिया वातावरण से सभी नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करने में सफलता को सुनिश्चित करता है।

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मराठा साम्राज्य में गणेश चतुर्थी

गणेश चतुर्थी का त्यौहार मानाने की परंपरा बहुत दिनों से चली आ रही है। पहली बार गणेश चतुर्थी का पर्व कब मनाया गया इसके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं हैं। पुणे में मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी के ज़माने(1630 – 1680 ) से गणेश चतुर्थी का उत्सव मनाया जा रहा है। भगवान गणेश उनके कुल देवता थे अतः पेशवाओं ने इस उत्सव के प्रति अपने राज्य में नागरिकों को प्रोत्साहित किया। पेशवा साम्राज्य के पतन के बाद गणेश उत्सव एक राज्य उत्सव नहीं होकर एक परिवार के उत्सव बन कर रह गया। स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक ने गणेश चतुर्थी के उत्सव को महाराष्ट्र में फिर से लोकप्रिय बनाया और यह उत्सव राज्य स्तर पर मनाया जाने लगा।

पेशवाओ का गणेशोत्सव

पेशवाओं ने गणेशोत्सव को बढ़ावा दिया। कहते हैं कि पुणे में कस्बा गणपति नाम से प्रसिद्ध गणपति की स्थपना शिवाजी महाराज की मां जीजाबाई ने की थी। परंतु लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणोत्सव को को जो स्वरूप दिया उससे गणेश राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गये। तिलक के प्रयास से पहले गणेश पूजा परिवार तक ही सीमित थी। पूजा को सार्वजनिक महोत्सव का रूप देते समय उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छुआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का उसे जरिया बनाया और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भाऊसाहेब लक्ष्मण जवाले

वर्तमान गणेश उत्सव का महाराष्ट्र सार्वजनिक त्योहार 1892 में भाऊसाहेब लक्ष्मण जवाले द्वारा पेश किया गया था। बालासाहेब नाटू और कृष्णन जी पंत खासगीवाले के साथ मुलाकात के बाद वह पहली बार सार्वजनिक (सार्वजनिक) गणेश प्रतिमा स्थापित की गयी । जब उन्होंने ग्वालियर के मराठा शासित राज्य का दौरा किया , खासगीवाले ने पारंपरिक सार्वजनिक उत्सव को देखा और पुणे में अपने दोस्तों के ध्यान इसके प्रति आकर्षित किया।

गोवा में गणेश चतुर्थी

गोवा में गणेश चतुर्थी का उत्सव कदंब युग से पहले से चला आ रहा है। गोवा में न्यायिक जांच आयोग ने हिन्दू त्योहारों पर प्रतिबंध लगा दिया था, और जिस हिन्दू को ईसाई धर्म में परिवर्तित नहीं किया था उसे गंभीर रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया था। इस प्रतिबन्ध बावजूद गोवा के हिन्दू इस त्यौहार को मानते रहे। कई परिवार कागज की तस्वीर पर या छोटे चांदी की मूर्तियों पर पत्री के रूप में गणेश पूजा करते रहे। न्यायिक जांच के हिस्से के रूप में मिट्टी के गणेश मूर्तियों और त्योहारों पर जीसस द्वारा प्रतिबंध की वजह से कुछ घरों में गणेश प्रतिमाये छिपी हुई हैं, यह गोवा में गणेश चतुर्थी की अनूठी परंपरा थी। महाराष्ट्रमें मनाये जाने वाले गणेश चतुर्थी के त्योहार के विपरीत, गोवा में यह एक परिवार के एक द्वारा वाला उत्सव है जिसमे एक 1000 या अधिक की संख्या में लोग अपने पैतृक घरों में इस समारोहों को मनाते हैं।

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गोवा में गणेश जी

स्वतंत्रता संग्राम और गणेशोत्सव

वीर सावरकर और कवि गोविंद ने नासिक में ‘मित्रमेला’ संस्था बनाई थी। इस संस्था का काम था देशभक्तिपूर्ण पोवाडे (मराठी लोकगीतों का एक प्रकार) आकर्षक ढंग से बोलकर सुनाना। इस संस्था के पोवाडों ने पश्चिमी महाराष्ट्र में धूम मचा दी थी। कवि गोविंद को सुनने के लिए लोगों उमड़ पड़ते थे। राम-रावण कथा के आधार पर वे लोगों में देशभक्ति का भाव जगाने में सफल होते थे। उनके बारे में वीर सावरकर ने लिखा है कि कवि गोविंद अपनी कविता की अमर छाप जनमानस पर छोड़ जाते थे। गणेशोत्सव का उपयोग आजादी की लड़ाई के लिए किए जाने की बात पूरे महाराष्ट्र में फैल गयी। बाद में नागपुर, वर्धा, अमरावती आदि शहरों में भी गणेशोत्सव ने आजादी का नया ही आंदोलन छेड़ दिया था। अंग्रेज भी इससे घबरा गये थे। इस बारे में रोलेट समिति रपट में भी चिंता जतायी गयी थी। रपट में कहा गया था गणेशोत्सव के दौरान युवकों की टोलियां सड़कों पर घूम-घूम कर अंग्रेजी शासन विरोधी गीत गाती हैं व स्कूली बच्चे पर्चे बांटते हैं। जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाने और मराठों से शिवाजी की तरह विद्रोह करने का आह्वान होता है। साथ ही अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए धार्मिक संघर्ष को जरूरी बताया जाता है। गणेशोत्सवों में भाषण देने वाले में प्रमुख राष्ट्रीय नेता थे – वीर सावकर, लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बैरिस्टर जयकर, रेंगलर परांजपे, पंडित मदन मोहन मालवीय, मौलिकचंद्र शर्मा, बैरिस्ट चक्रवर्ती, दादासाहेब खापर्डे और सरोजनी नायडू।

पूजा विधि , रस्में और महत्व

इस त्यौहार के लिए पूरे भारत में पूजा प्रक्रिया और अनुष्ठान क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार थोड़े अलग है।लोग गणेश चतुर्थी की तारीख से 2-3 महीने पहले विभिन्न आकारों में भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्ति बनाना शुरू कर देते है। लोग घर में किसी उठे हुये प्लेटफार्म पर या घर के बाहर किसी बडी जगह पर सुसज्जित तम्बू में एक गणेश जी की मूर्ति रख देते है ताकि लोग देखे और पूजा के लिये खडे हो सके। लोगों को अपने स्वयं या किसी भी निकटतम मंदिर के पुजारी को बुलाकर सभी तैयारी करते हैं।कुछ लोग इन सभी दिनों के दौरान सुबह ब्रह्मा मुहूर्त में ध्यान करते हैं। भक्त नहाकर मंदिर जाते है या घर पर पूजा करते है। वे पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ पूजा करके प्रसाद अर्पित करते है। लोग मानते है कि इस दिन चाँद नहीं देखना चाहिये और भगवान में अविश्वास करने वाले लोगों से दूर रहना चाहिये।

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प्राणप्रतिष्ठा

लोग पूजा खासतौर पर लाल सिल्क की धोती और शाल पहनकर करते है। भगवान को मूर्ति में बुलाने के लिये पुजारी मंत्रों का जाप करते है। यह हिन्दू रस्म प्राणप्रतिष्ठा अर्थात् मूर्ति की स्थापना कहलाती है। इस अनुष्ठान का एक अन्य अनुष्ठान द्वारा अनुगमन किया जाता है, जिसे षोष्ढषोपचार अर्थात् गणेश जी को समर्पण के 16 तरीकें कहा जाता है। लोग नारियल, 21 मोदक, 21 दूव- घास, लाल फूल, मिठाई, गुड़, धूप बत्ती, माला आदि की भेंट करते है। सबसे पहले लोग मूर्ति पर कुमकुम और चंदन का लेप लगाते है और पूजा के सभी दिनों में वैदिक भजन और मंत्रो का जाप, गणपति अथर्व संहिता, गणपति स्त्रोत और भक्ति के गीत गाकर भेंट अर्पित करते है।

दस दिनों की पूजा

गणेश पूजा भाद्रपद शुद्ध चतुर्थी से शुरू होती है और अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होती है। 11 वें दिन गणेश विसर्जन नृत्य और गायन के साथ सड़क पर एक जुलूस के माध्यम से किया जाता है। जलूस,“गणपति बप्पा मोरया, घीमा लड्डू चोरिया, पूदचा वर्षी लाऊकारिया, बप्पा मोरया रे, बप्पा मोरया रे” से शुरु होता है अर्थात् लोग भगवान से अगले साल फिर आने की प्रार्थना करते है। लोग मूर्ति को पानी में विसर्जित करते समय भगवान से पूरे साल उनके अच्छे और समृद्धि के लिये प्रार्थना करते है। भक्त विसर्जन के दौरान फूल, माला, नारियल, कपूर और मिठाई अर्पित करते है।

प्रसाद में मोदक

लोग भगवान को खुश करने के लिये उन्हें मोदक भेंट करते हैं क्योंकि गणेश जी को मोदक बहुत प्रिय है। ये माना जाता है कि इस दिन पूरी भक्ति से प्रार्थना करने से आन्तरिक आध्यात्मिक मजबूती, समृद्धि, बाधाओं का नाश और सभी इच्छाओं की प्राप्ति होती है। ये विश्वास किया जाता है कि, पहले व्यक्ति जिसने गणेश चतुर्थी का उपवास रखा था वे चन्द्र (चन्द्रमा) थे। एकबार, गणेश स्वर्ग की यात्रा कर रहे थे तभी वो चन्द्रमा से मिले। उसे अपनी सुन्दरता पर बहुत घमण्ड था और वो गणेश जी की भिन्न आकृति देख कर हँस पड़ा। तब गणेश जी ने उसे श्राप दे दिया। चन्द्रमा बहुत उदास हो गया और गणेश से उसे माफ करने की प्रार्थना की। अन्त में भगवान गणेश ने उसे श्राप से मुक्त होने के लिये पूरी भक्ति और श्रद्धा के साथ गणेश चतुर्थी का व्रत रखने की सलाह दी।

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मोदक के बिना अधूरा है गणपति उत्सव

गणेश विसर्जन

गणेश विसर्जन गणेश चतुर्थी के त्यौहार के 11 वें दिन पर पानी में गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन है। गणेश विसर्जन अनंत चतुर्दशी पर त्यौहार के अंत में किया जाने वाला अनुष्ठान समारोह है। इस दिन, लाखों से भी अधिक मूर्तियाँ हर साल पानी में विसर्जित की जाती है। कुछ लोग अनंत चतुर्दशी से कुछ दिनों पहले गणेश विसर्जन करते हैं। कुछ लोग गणेश चतुर्थी के अगले दिन गणेश विसर्जन करते हैं, हालांकि कुछ लोग गणेश चतुर्थी के बाद 3, 5, 7, 10 वें और 11 वें दिन पर गणेश विसर्जन करते हैं। हमें मूर्ति विसर्जन बहुत सावधानी और वातावरण के अनुकूल तरीकें से करना चाहिये ताकि कोई भी प्लास्टिक का कचरा गणेश जी की मूर्ति के साथ पानी में न बहाया जाये और पानी को प्रदूषण से बचाया जा सके। गणेशजी की मूर्ति घर पर पानी से भरी बाल्टी या टब में भी विसर्जित की जा सकती है।

गणेश विसर्जन का महत्व

गणेश विसर्जन हिंदू धर्म में बहुत महत्व रखता है। गणेश जी की मूर्ति मिट्टी की बनी होती है जो पानी में विसर्जित होने के बाद बेडौल हो जाती है। इसका मतलब है कि इस दुनिया में सब कुछ एक दिन (मोक्ष या मुक्ति) बेडौल हो जाएगा। गठन और बैडोल होने की प्रक्रिया कभी न खत्म होने वाला घेरा (अर्थात् चक्र) है। हर साल गणेश जीवन के इसी परम सत्य के बारे में हमें यकीन दिलाने के लिए आते हैं।

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