चुनाव के पहले सरकार के सामने बड़ी आफत, नोएडा से भड़की श्रमिक आंदोलन की चिंगारी

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संजय सक्सेना

दिल्ली से सटे औद्योगिक शहर नोएडा के औद्योगिक इलाकों में पिछले एक सप्ताह से सुलग रहा मजदूरों का असंतोष सोमवार को उस समय उग्र हो गया, जब फेज-2 औद्योगिक क्षेत्र में हजारों मजदूरों ने एक साथ काम का बहिष्कार कर दिया और फैक्ट्रियों के बाहर धरना शुरू कर दिया। सुबह से ही गेटों पर भीड़ जमा होने लगी और धीरे-धीरे यह विरोध प्रदर्शन कई औद्योगिक इकाइयों में फैल गया। हालात इतने बिगड़ गए कि पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और कई इलाकों में यातायात घंटों तक बाधित रहा। आंदोलन की शुरुआत एक-दो फैक्ट्रियों में वेतन वृद्धि की मांग से हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे यह मांग पूरे औद्योगिक क्षेत्र में फैल गई। मजदूरों का कहना है कि वे रोजाना 10 से 12 घंटे तक काम करते हैं, लेकिन इसके बदले उन्हें औसतन 12,500 से 13,500 रुपये के बीच वेतन मिलता है। कई श्रमिकों का दावा है कि ओवरटाइम का भुगतान भी तय नियमों के अनुसार नहीं होता, जिससे उनकी आय और कम हो जाती है। श्रमिकों का कहना था महंगाई का बढ़ता दबाव इस असंतोष का सबसे बड़ा कारण बन गया है। पिछले दो वर्षों में रसोई गैस की कीमत, किराया, बच्चों की स्कूल फीस और रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च तेजी से बढ़ा है। यदि एक औसत मजदूर परिवार का मासिक खर्च 16,000 से 18,000 रुपये तक पहुंच चुका है और आय 13,000 रुपये के आसपास ही है, तो यह अंतर सीधे आर्थिक संकट में बदल जाता है। यही वजह है कि मजदूर अब वेतन वृद्धि को एक विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी मानने लगे हैं। इस पूरे विवाद की सबसे अहम कड़ी पड़ोसी राज्य हरियाणा का वह फैसला है, जिसने न्यूनतम मजदूरी में करीब 35 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी। यह वृद्धि 1 अप्रैल से लागू की गई और 11 अप्रैल से इसका असर स्पष्ट रूप से सामने आने लगा। नए वेतनमान के अनुसार अकुशल श्रमिकों का वेतन 11,274 रुपये से बढ़ाकर 15,220 रुपये कर दिया गया। इसी तरह अर्धकुशल श्रमिकों का वेतन 12,430 रुपये से बढ़ाकर 16,780 रुपये किया गया, जबकि कुशल श्रमिकों का वेतन लगभग 13,704 रुपये से बढ़कर 18,500 रुपये तक पहुंच गया। उच्च कुशल श्रमिकों का वेतन 14,389 रुपये से बढ़ाकर 19,425 रुपये कर दिया गया।

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इन आंकड़ों ने नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों के बीच एक नई तुलना पैदा कर दी है। उनका कहना है कि जब समान प्रकार का काम करने वाले श्रमिकों को हरियाणा में 15 से 19 हजार रुपये तक वेतन मिल सकता है, तो नोएडा में वही काम करने वालों को 13 हजार रुपये के आसपास क्यों मिल रहा है। यही सवाल अब आंदोलन का सबसे बड़ा आधार बन गया है।यदि अलग-अलग राज्यों के न्यूनतम वेतन की तुलना की जाए, तो यह असमानता और स्पष्ट दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश में अकुशल श्रमिकों का न्यूनतम वेतन लगभग 11,313 रुपये के आसपास है, जबकि अर्धकुशल श्रमिकों को करीब 12,120 रुपये और कुशल श्रमिकों को लगभग 13,940 रुपये मिलते हैं। इसके विपरीत दिल्ली में अकुशल श्रमिकों का न्यूनतम वेतन करीब 19,800 रुपये तक पहुंच चुका है। यानी एक ही भौगोलिक क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों के बीच 6,000 से 8,000 रुपये तक का अंतर मौजूद है। यही अंतर अब औद्योगिक तनाव का कारण बन रहा है। गौरतलब है नोएडा का औद्योगिक ढांचा देश के सबसे बड़े उत्पादन नेटवर्क में शामिल है। यहां हजारों छोटी, मध्यम और बड़ी औद्योगिक इकाइयां संचालित होती हैं। कपड़ा, होजरी, ऑटोमोबाइल पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और निर्यात से जुड़े उद्योग यहां बड़ी संख्या में मौजूद हैं। अनुमान है कि केवल फेज-2 क्षेत्र में ही लाखों मजदूर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार से जुड़े हुए हैं। ऐसे में यदि कामकाज लंबे समय तक ठप रहता है, तो इसका असर न केवल स्थानीय उत्पादन पर पड़ेगा, बल्कि निर्यात ऑर्डर भी प्रभावित होंगे।सोमवार को हालात उस समय और बिगड़ गए, जब कुछ स्थानों पर प्रदर्शन हिंसक हो गया। गुस्साए मजदूरों ने कुछ वाहनों को नुकसान पहुंचाया और कई औद्योगिक मार्गों पर जाम लगा दिया। इससे माल ढुलाई का काम प्रभावित हुआ और कई कंपनियों को उत्पादन रोकना पड़ा। उद्योग जगत के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक बन गई है, क्योंकि एक दिन का उत्पादन रुकना भी लाखों रुपये के नुकसान में बदल सकता है।

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मजदूरों की मांगों की सूची भी अब स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी है। उनकी सबसे प्रमुख मांग है कि न्यूनतम वेतन 20,000 रुपये प्रति माह किया जाए। इसके अलावा बैंक खाते में समय पर बोनस भुगतान, ओवरटाइम का दोगुना भुगतान, किसी भी कर्मचारी को बिना कारण नौकरी से न निकालने की गारंटी और साप्ताहिक अवकाश सुनिश्चित करने की मांग भी शामिल है। कई श्रमिकों का कहना है कि यदि रविवार को काम कराया जाता है, तो उसका दोगुना भुगतान मिलना चाहिए, जो अक्सर नहीं दिया जाता।इस आंदोलन ने प्रशासन के सामने भी बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। एक ओर कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, तो दूसरी ओर उद्योगों और मजदूरों के बीच संतुलन कायम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। श्रम विभाग के अधिकारी लगातार कंपनियों और श्रमिक प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई स्थायी समाधान सामने नहीं आ सका है। आर्थिक दृष्टि से देखें तो यह विवाद केवल वेतन वृद्धि का मामला नहीं है, बल्कि यह राज्यों के बीच बढ़ती आर्थिक असमानता का परिणाम भी है। यदि एक राज्य में मजदूरी अधिक और दूसरे में कम है, तो उद्योग लागत कम रखने के लिए कम मजदूरी वाले क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने की कोशिश करते हैं। दूसरी ओर मजदूर बेहतर वेतन पाने के लिए अधिक मजदूरी वाले क्षेत्रों की ओर पलायन करते हैं। इससे श्रम बाजार में अस्थिरता बढ़ती है और औद्योगिक विवादों की संभावना भी बढ़ जाती है।महंगाई का प्रभाव इस पूरे विवाद में सबसे प्रमुख कारक के रूप में सामने आया है। पिछले कुछ वर्षों में खाद्य पदार्थों की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। गैस सिलेंडर, परिवहन और किराये की लागत में भी लगातार बढ़ोतरी हुई है। यदि एक औसत मजदूर परिवार का मासिक खर्च 17,000 रुपये तक पहुंच चुका है, तो 13,000 रुपये के वेतन में गुजारा करना लगभग असंभव हो जाता है। यही कारण है कि मजदूर अब वेतन वृद्धि को अपने जीवन स्तर से जोड़कर देख रहे हैं।

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यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े नीति संबंधी सवाल को भी जन्म देता है क्या देश में न्यूनतम मजदूरी की एक समान राष्ट्रीय नीति होनी चाहिए। वर्तमान व्यवस्था में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दरें लागू हैं, जिससे मजदूरी में बड़ा अंतर पैदा होता है। यदि राष्ट्रीय स्तर पर एक समान न्यूनतम वेतन का ढांचा तैयार किया जाए, तो राज्यों के बीच असमानता कम हो सकती है और श्रमिकों के बीच असंतोष भी घट सकता है।नोएडा में जारी यह आंदोलन आने वाले समय में श्रम नीति और औद्योगिक व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत बन सकता है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो इसका असर केवल एक शहर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भी इसी तरह की स्थितियां पैदा हो सकती हैं। उत्पादन में गिरावट, निर्यात में कमी और रोजगार के अवसरों में कमी जैसे परिणाम सामने आ सकते हैं।फिलहाल नोएडा के औद्योगिक गलियारों में खामोशी पड़ी मशीनें और सड़कों पर जमा भीड़ इस बात का संकेत दे रही हैं कि यह संघर्ष केवल वेतन का नहीं, बल्कि जीवन स्तर और सम्मान से जुड़ी एक बड़ी लड़ाई बन चुका है। आने वाले दिनों में प्रशासन, उद्योग और श्रमिकों के बीच होने वाली बातचीत ही तय करेगी कि यह विवाद शांत होगा या और व्यापक रूप लेगा।

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