बंगाल चुनाव से पहले बीजेपी का 33 फीसदी महिला आरक्षण दांव

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अजय कुमार

बंगाल चुनाव: भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय लिखा जाने वाला है। केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने जा रही है। इसके लिए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से करीब एक सप्ताह पूर्व 16 से 18 तक तीन दिनों का विशेष लोकसभा सत्र बुलाया गया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आगामी विशेष संसद सत्र को लेकर अपने सभी सांसदों के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। पार्टी ने लोकसभा और राज्यसभा के सभी सदस्यों के लिए तीन लाइन का व्हिप जारी करते हुए 16 से 18 अप्रैल तक सदन में अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित करने को कहा है। पार्टी की ओर से स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि इस अवधि के दौरान किसी भी सांसद या केंद्रीय मंत्री को छुट्टी नहीं दी जाएगी। सभी सदस्यों को लगातार सदन में उपस्थित रहने और संसद की कार्यवाही में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने को कहा गया है। सूत्रों के अनुसार, यह विशेष संसद सत्र महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पर चर्चा के लिए बुलाया गया है। सरकार का लक्ष्य इस ऐतिहासिक विधेयक पर व्यापक बहस और आगे की प्रक्रिया को तेज करना है, जिस पर सियासत भी तेज हो गई है। नई आरक्षण व्यवस्था के साथ लोकसभा में सीटों की संख्या भी बढ़ जाएगी। यह कदम महज एक कानूनी संशोधन नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी राजनीतिक रणनीति है, जिसमें एक साथ सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण और चुनावी लाभ तीनों का समागम है। लोकसभा सत्र बुलाए जाते ही विपक्ष ने सियासत शुरू कर दी है। अभी से महिला आरक्षण में दलितों-पिछड़ों के लिये भी अलग कोटा की मांग उठने लगी है।

उधर, बात बीजेपी सरकार की की जाये तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालते ही महिलाओं को अपनी सरकार के केंद्र में रखा है। 33 प्रतिशत महिला आरक्षण इसी कड़ी की नई इकाई है। महिलाओं के हित में मोदी सरकार द्वारा उठाये गये अन्य कदमों की बात की जाये तो उज्ज्वला योजना के तहत अब तक 10 करोड़ से अधिक महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए गए, जिससे धुएं से मुक्त रसोई और स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित हुई। इसके साथ ही 12 करोड़ से अधिक शौचालय बनाए गए, जिससे महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को मजबूती मिली और 100 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों की सुविधा उपलब्ध हुई। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ (2015), सुकन्या समृद्धि योजना, मुद्रा ऋण, जन धन खाते और पीएम आवास योजना में महिलाओं के नाम पर संपत्ति ये सब मिलकर एक ऐसा ताना-बाना बुनते हैं, जिसमें देश की आधी आबादी को सीधे तौर पर सरकारी लाभ की अनुभूति होती है। इन योजनाओं का सीधा असर मतपेटी पर भी पड़ा। जो महिलाएं पहले घर से बाहर निकलकर वोट देने में हिचकिचाती थीं, वे आज एक सक्रिय मतदाता वर्ग बन चुकी हैं। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में महिला मतदाताओं की भागीदारी ऐतिहासिक रही। विशेष रूप से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में महिलाओं ने खुलकर मोदी के पक्ष में वोटिंग की, जो किसी भी राजनीतिक विश्लेषक की नजर से नहीं छूटी।

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अब मोदी सरकार इस संबंध को और गहरा करने की दिशा में अपना सबसे बड़ा दांव खेलने जा रही है। सरकार 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले महिला आरक्षण लागू करने के लिए संशोधन बिल लाने की तैयारी में है, जो लम्बे समय से प्रस्तावित था। बजट सत्र में पेश होने वाले इस विधेयक पर विपक्षी दलों से बातचीत तेज हो गई है। असल में यह मामला इतना सीधा नहीं है। महिला आरक्षण बिल सितंबर 2023 में संसद के विशेष सत्र में पास हुआ था। इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई सीटें दी जाएंगी। लेकिन इसे लागू करने के लिए पहले नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन जरूरी था। यानी 2023 में पास होने के बावजूद यह कानून कागज पर ही रहा। अब सरकार उस शर्त को बदलने की तैयारी में है। सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के साथ ही संविधान संशोधन लाने की भी तैयारी कर रही है। यह संविधान संशोधन इसलिए लाया जाएगा, जिससे साल 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा में सीटें बढ़ाई जा सकें और 2029 के आम चुनाव में महिला आरक्षण लागू किया जा सके। साल 2011 की जनगणना के आधार पर 2029 के लोकसभा चुनाव में सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 की जा सकती है और इसमें महिलाओं के लिए 273 सीटें आरक्षित की जा सकती हैं।

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बहरहाल, बात सिर्फ आरक्षण की नहीं है, बल्कि लोकसभा की संरचना को ही बदल देने की है। 543 से 816 सीटें यह संख्या में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि है। इन बिलों को पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी, इसलिए सरकार एनडीए के साथ-साथ विपक्षी दलों जैसे सपा, आरजेडी और वाईएसआर कांग्रेस से भी समर्थन मांग रही है। इसी कड़ी में गृहमंत्री अमित शाह ने महिला आरक्षण बिल में संशोधन को लेकर शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी (शरद पवार) जैसे विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बातचीत की है। शुरुआत में गृहमंत्री ने छोटे विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बातचीत की है और कांग्रेस जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टी और अन्य बड़े दलों के साथ बातचीत अभी बाकी है। कांग्रेस के लिए यह बिल एक नैतिक दुविधा की स्थिति है। एक तरफ वह महिला आरक्षण की समर्थक रही है और राहुल गांधी ने खुद इसे जल्द लागू करने की मांग की थी। दूसरी तरफ इस बिल का खुलकर समर्थन करना मोदी को एक ऐतिहासिक राजनीतिक उपलब्धि का श्रेय देना होगा। हालांकि संकेतों से साफ है कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को महिला आरक्षण लागू करने की पहल का समर्थन करने में कोई दिक्कत नहीं होगी, लेकिन असली बेचैनी उन दलों में है जो जातिगत समीकरणों पर टिके हैं। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कहा कि महिला आरक्षण लैंगिक न्याय और सामाजिक न्याय का संतुलन होना चाहिए। यह बयान देखने में संतुलित लगता है, लेकिन इसके पीछे की राजनीति बहुत गहरी है। समाजवादी पार्टी, राजद तथा द्रमुक जैसे दलों की ओर से महिलाओं के लिए आरक्षण कोटे में ओबीसी, एससी-एसटी वर्ग के लिए अलग से कोटे की मांग उठाई जा सकती है। विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी कोटा शामिल करने की मांग उठाई है, जिससे सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। यह मांग तकनीकी रूप से जटिल है, क्योंकि ओबीसी के लिए संसद में आरक्षण का अभी कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है।

अखिलेश यादव और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं की असली चिंता कहीं और है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में उनकी राजनीति का आधार पिछड़े और अति-पिछड़े वर्गों का वोट बैंक है। यदि महिला आरक्षण 2029 से लागू हो जाता है और लोकसभा की 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाती हैं, तो रोटेशन प्रणाली के तहत इन दलों के कई वर्तमान सांसदों की सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं। सीधे शब्दों में कहें तो उनके परिवारों और गुटों के कई दबंग नेताओं के लिए 2029 में चुनाव लड़ना असंभव हो जाएगा। ओबीसी आरक्षण की मांग दरअसल बिल को उलझाए रखने की एक रणनीति भी हो सकती है। प्रस्ताव के मुताबिक जो 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, उनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को उनके कोटे के अंदर ही आरक्षण मिलेगा। फिलहाल ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का जिक्र इस प्रस्ताव में नहीं है। यह वही बिंदु है, जहां टकराव होना तय है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारत अभी भी काफी पीछे है। नेपाल की संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं, बांग्लादेश की संसद में 50 सीटें और पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में महिलाओं के लिए 60 सीटें आरक्षित हैं। वर्तमान में भारत की लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या मात्र 74 है, यानी करीब 13.6 प्रतिशत। इस लिहाज से 33 प्रतिशत का लक्ष्य एक बड़ी छलांग होगी। मोदी सरकार का यह दांव कई मायनों में अभूतपूर्व है। एक तरफ यह महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में ऐतिहासिक बदलाव लाएगा, दूसरी तरफ विपक्ष को एक ऐसी स्थिति में खड़ा कर देता है, जहां वह न तो खुलकर समर्थन कर सकता है और न ही पूरी तरह विरोध। महिला मतदाताओं को नाराज करने का जोखिम कोई भी दल उठाने को तैयार नहीं है। यही मोदी सरकार की रणनीतिक सफलता है उसने विपक्ष को एक ऐसे जाल में फंसा दिया है, जहां से निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं है।

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