अखिलेश बढ़ाएंगे PDA का दायरा, लक्ष्य 360 सीटें जीतना

Ram Mandir Donation Controversy
संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव अपनी पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति को और मजबूत करने में जुटे हैं। पार्टी का मुस्लिम वोट बैंक, जो कभी मुलायम सिंह यादव का सबसे मजबूत किला था, हाल के उपचुनावों में कमजोर पड़ा दिखा, जिसके बाद अखिलेश ने खुलकर मुस्लिम समुदाय को लक्षित करने वाली राजनीति शुरू कर दी है। 2024 के उपचुनावों में मुस्लिम बहुल सीटों पर मिली हार ने सपा को झकझोर दिया, जहां ओवैसी की AIMIM और कांग्रेस जैसे दल मुस्लिम वोटों में सेंध लगा रहे हैं। अखिलेश ने इसके जवाब में दूसरी पीढ़ी के युवा मुस्लिम नेताओं को आगे बढ़ाने का मेगा प्लान बनाया है। सलीम इकबाल शेरवानी को पश्चिमी यूपी और अताउर्रहमान को पूर्वांचल व रुहेलखंड में मुस्लिम मिशन की कमान सौंपी गई है, जो समाजवादी सद्भावना संवाद जैसे कार्यक्रमों के जरिए समुदाय से सीधा संवाद कर रहे हैं। रामपुर में आजम खान के परिवार से हालिया मुलाकात इसका जीता-जागता प्रमाण है, जहां अखिलेश ने मुस्लिम मतदाताओं की सियासी ताकत को फिर से एकजुट करने का संकल्प जताया।

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सपा अब केवल मुस्लिम वोटों तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी की नजरें पीडीए समीकरण को व्यापक बनाने पर हैं, जिसमें यादव के अलावा अन्य पिछड़ी जातियां जैसे कुर्मी, मौर्य, जाट, गुर्जर, केवट, मल्लाह, राइथ, कोइरी, निषाद, बिंद, कश्यप और गहमरी जैसी जातियों पर केंद्रित हैं। दलित समाज में जाटव, पासी, रविदास, धोबी, कोरी, वाल्मीकि और अन्य उपजातियों को लुभाने के लिए छोटे-मझोले नेताओं को पार्टी में शामिल किया जा रहा है। ओबीसी वोटों को मजबूत करने के लिए सपा ने संगठन में बड़े बदलाव शुरू किए हैं, जहां निष्क्रिय पदाधिकारियों को हटाकर सक्रिय कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर जिम्मेदारी दी जा रही है। अखिलेश का फोकस 360 से अधिक सीटें जीतने पर है, इसलिए टिकट वितरण में पीडीए समीकरण को प्राथमिकता मिलेगी। पार्टी प्रवक्ता अनुराग भदौरिया ने स्पष्ट कहा कि सपा सभी जातियों-धर्मों को साथ लेकर पीडीए को मजबूत करेगी।

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उधर, पार्टी में बड़े मुस्लिम नेताओं को भी शामिल करने की चर्चा भी जोर पकड़ रही है। अखिलेश यादव नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे पूर्व बसपा नेता को लुभा सकते हैं, जिनकी कांग्रेस में असंतोष की खबरें हैं। इसके अलावा इमरान मसूद जैसे कांग्रेस के मुस्लिम चेहरों पर नजर है, जिनकी राजनीति को सपा ने काटने की रणनीति अपनाई है। आजम खान के करीबी और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को फिर से सक्रिय करने की कोशिशें तेज हैं। सलीम शेरवानी और अताउर्रहमान जैसे मौजूदा नेता तो पहले से ही मिशन पर हैं, लेकिन पार्टी में और युवा मुस्लिम चेहरों को लाने की योजना है। इसी तरह से पिछड़े और दलित समाज से भी कई नाम चर्चा में हैं। ओबीसी में पूर्व बीजेपी विधायक जैसे कुर्मी या मौर्य समुदाय के नाराज नेता सपा की हिट लिस्ट में हैं, जो सत्ताधारी दल से असंतुष्ट हैं। दलित पक्ष में बसपा से टूटे छोटे नेता जैसे जाटव या पासी समुदाय के प्रभावशाली चेहरे, जिनके इलाकों में समीकरण बदल रहे हैं, उन्हें जोड़ने की कोशिश हो रही है। सपा कोर कमेटी ऐसे नेताओं पर डोर डाल रही है जो बूथ स्तर पर वोटर मैनेज कर सकें। हालांकि, विशिष्ट नामों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में हरिशंकर तिवारी जैसे प्रभावशाली नेताओं के परिवार या बसपा के असंतुष्ट दलित चेहरों की चर्चा आम है।

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वहीं 2027 चुनाव के लिए गठबंधन की रणनीति पर अखिलेश सबसे सतर्क हैं। सबसे मजबूत संभावना कांग्रेस के साथ है, लेकिन हालिया उपचुनावों में गठबंधन की असफलता के बाद यह सीमित सीटों तक रह सकता है। उधर, बसपा के साथ गठबंधन की चर्चा फिर से गरमाई हुई है, क्योंकि मायावती मुस्लिम वोट तोड़ने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि, अखिलेश निर्दलीय लड़ने या छोटे दलों जैसे अपना दल (कमेरावादी), निषाद पार्टी या महान दल के साथ सीट बंटवारे पर विचार कर रहे हैं, ताकि पीडीए वोट बिखरे नहीं। जबकि ओवैसी की पार्टी को चुनौती देने के लिए सपा अकेले मुस्लिम बहुल सीटों पर फोकस करेगी। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अखिलेश मुलायम मॉडल अपनाकर मुस्लिम-यादव गठजोड़ को बचाएंगे, लेकिन ओबीसी-दलित विस्तार ही सत्ता की कुंजी है। सपा का यह खुला खेल बीजेपी के लिए चुनौती है, जो हिंदुत्व कार्ड खेल रही है। लेकिन अखिलेश की सक्रियता से विपक्ष में हलचल तेज है। अगर मुस्लिम वोट बैंक सहेज लिया और पीडीए मजबूत हुआ, तो 2027 में यूपी की सत्ता का स्वरूप बदल सकता है। पार्टी अब वोटर लिस्ट अभियान चला रही है, खासकर मुस्लिम इलाकों में नाम जुड़वाने पर जोर है। अखिलेश की हालिया बैठकें और संगठनात्मक मंथन मुस्लिम नाराजगी दूर करने पर केंद्रित रहे हैं, जहां ओवैसी के बढ़ते जनाधार को चुनौती देने की रणनीति बनी। कुल मिलाकर, सपा 2027 के लिए आक्रामक मोड में है, जहां मुस्लिम राजनीति को खुलकर खेला जा रहा है, लेकिन पिछड़े-दलित वोटों का विस्तार ही असली दांव है। यह रणनीति सफल हुई तो अखिलेश यादव फिर से सीएम हाउस की दहलीज पर होंगे।

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