सपा–कांग्रेस को ओवैसी के चलते मुस्लिम वोटों के बंटवारे की चिंता

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संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाता सदैव निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। उनकी एकजुटता और रणनीतिक वोटिंग ने कई चुनावों के परिणाम बदल दिए हैं। प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब बीस प्रतिशत है, जो सवा चार सौ विधानसभा क्षेत्रों में से सवा सौ से अधिक पर अपना प्रभाव डालती है। इनमें सत्तर क्षेत्र ऐसे हैं, जहां मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिशत तीस से अधिक रहता है। कभी कांग्रेस का मजबूत आधार रहे ये मतदाता अब हवा के रुख के अनुसार अपना पाला बदल लेते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य हमेशा उन दलों को सत्ता से दूर रखना रहता है, जो हिंदू हितों की बात प्रमुखता से करते हैं। यही वजह है कि कांग्रेस के कमजोर पड़ने के साथ मुस्लिम मतदाताओं ने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की ओर रुख करने में जरा भी गुरेज नहीं किया। 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को अधिकांश मुस्लिम वोट मिले, लेकिन बहुजन समाज पार्टी को भी कुछ हिस्सा हाथ लगा। बीते निकाय चुनावों में यह पैटर्न बदला, जब मुस्लिम मतदाताओं ने एक दल के पीछे न जाकर अपनी पसंद के उम्मीदवारों को चुना। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में छोटे दलों के मुस्लिम प्रत्याशियों को समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से अधिक समर्थन मिला। इस बदलाव ने राजनीतिक दलों को सोचने पर मजबूर कर दिया।मुस्लिम नेताओं ने अपनी अलग पार्टियां बनाकर इन मतों को लुभाने की कोशिश की। मुस्लिम लीग और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी जैसे पुराने संगठनों के बाद पीस पार्टी तथा उलेमा काउंसिल ने मैदान संभाला। 2022 के विधानसभा चुनाव में पीस पार्टी ने राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के साथ गठबंधन कर कई प्रत्याशी उतारे, लेकिन सफलता सीमित रही। इन प्रयासों से मुस्लिम वोटों में कुछ बिखराव तो हुआ, लेकिन कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया।

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अब सबसे अधिक चिंता का विषय है असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी का उभार। बिहार चुनावों में पांच सीटें जीतने के बाद ओवैसी ने उत्तर प्रदेश पर नजरें टिका ली हैं। पार्टी ने 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए सौ सीटों पर लड़ने की घोषणा की थी और अब 2027 के चुनावों के लिए ओवैसी की पार्टी ने 200 क्षेत्रों को चार भागों में बांटकर चुनाव लड़ने की तैयारी तेज कर दी है। इसकी वजह भी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल जिलों जैसे सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर, संभल और बरेली में पार्टी का जनाधार बढ़ रहा है। निकाय चुनावों में यहां उसके प्रत्याशी अच्छा प्रदर्शन कर चुके हैं। ओवैसी का यह उभार समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी सभी की नींद उड़ा रहा है। हाल ही में समाजवादी पार्टी के सांसदों की बैठक में भी मुस्लिम वोटों के बंटवारे पर चिंता जताई गई। बिहार और महाराष्ट्र के निकाय चुनावों के उदाहरण देते हुए सपा नेताओं द्वारा यहां तक कहा गया कि ओवैसी के बिना गठबंधन से नुकसान हो सकता है। कुछ सांसदों ने गठबंधन का सुझाव दिया, हालांकि शिवपाल यादव ने ऐसी अटकलों को खारिज कर दिया। फिर भी मिशन 2027 की रणनीति पर विचार चल रहा है।कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की चिंता भी सामने आ चुकी है। संसद भवन परिसर में सांसद इमरान मसूद से बातचीत का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने हैदराबादी परेशानी को उत्तर प्रदेश में घुसने से रोकने की बात कही। सभी इसे ओवैसी पर तंज मान रहे हैं। खरगे ने चेतावनी दी कि ऐसा होने पर सभी को नुकसान होगा। यह वीडियो राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ चुका है।

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बहरहाल, 2027 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाता किसके साथ खड़े होंगे, यह सवाल सभी को कुरेद रहा है। यदि पैटर्न पुराना रहा तो अधिकांश वोट समाजवादी पार्टी को मिल सकते हैं, क्योंकि पिछली बार भी यही हुआ था। लेकिन ओवैसी के बढ़ते प्रभाव से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 70 से अधिक क्षेत्रों में वोट बंट सकते हैं। यहां मुस्लिम युवाओं में असंतोष है और ओवैसी मुस्लिम हितों पर सीधी बात करते हैं। बिहार की तर्ज पर यदि वे पांच से दस सीटें जीत लेते हैं, तो समाजवादी पार्टी का नुकसान बढ़ सकता है। कांग्रेस का आधार पहले से कमजोर है, इसलिए उसके लिए मुश्किलें बढ़ेंगी। खरगे की चिंता इसी का संकेत है।उधर, बहुजन समाज पार्टी की बात की जाए तो बसपा मुस्लिम वोट खो चुकी है, क्योंकि उसकी रणनीति अब ब्राह्मणों पर केंद्रित है। यदि समाजवादी पार्टी ने ओवैसी से गठबंधन किया, तो मुस्लिम वोट एकजुट रह सकते हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी के पिछड़े वोट बैंक में दरार और मुस्लिम वोटों के जरिये ओवैसी अपने लिए नई जमीन मजबूत कर सकते हैं। बिना गठबंधन के ओवैसी स्वतंत्र लड़ेंगे, तो मुस्लिम वोट तीन भागों में बंटेंगे, जिससे भाजपा को फायदा होगा।

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खैर, कहा यह भी जा रहा है कि पिछले निकाय चुनावों से साफ हो गया है कि मुस्लिम मतदाता अब विवेकपूर्ण हो गए हैं। वे एक दल के पीछे नहीं भागते, बल्कि स्थानीय मुद्दों पर फैसला लेते हैं। 2027 में आर्थिक मुद्दे, बेरोजगारी और विकास के साथ धार्मिक ध्रुवीकरण भी भूमिका निभाएंगे। यदि भाजपा ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारे, जैसा कुंदरकी उपचुनाव में हुआ, तो वहां भी सेंध लग सकती है। कुल मिलाकर मुस्लिम वोट का अधिकांश भाग समाजवादी पार्टी या ओवैसी के साथ रहेगा, लेकिन बिखराव भाजपा के हित में होगा। यह चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति को नया मोड़ दे सकता है। ओवैसी यदि जनाधार मजबूत रखे, तो मुस्लिम राजनीति का नया अध्याय लिखा जाएगा। समाजवादी पार्टी को रणनीति बदलनी पड़ेगी, ताकि वोट बैंक सुरक्षित रहे। कांग्रेस को तो मुस्लिम समर्थन वापस पाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।

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