2027 नहीं, असली इम्तिहान 2029 है

Yogi

लखनऊ। योगी आदित्यनाथ को लेकर बार-बार जो आशंकाएँ खड़ी की जा रही हैं, वे फिलहाल अतिशयोक्ति अधिक और यथार्थ कम हैं। तमाम षड्यंत्रों, विरोध और शोर-शराबे के बावजूद 2027 में उत्तर प्रदेश में उनका बहुमत से लौटना लगभग तय दिखाई देता है। लेकिन यदि सच में कहीं कोई चिंता है, तो वह 2029 की लोकसभा के क्षितिज पर उभरती नज़र आती है। 2024 के लोकसभा चुनाव के आँकड़े इस ओर साफ इशारा करते हैं। 2019 में उत्तर प्रदेश से भाजपा को जहाँ 66 सीटें मिली थीं, वहीं 2024 में यह संख्या घटकर 33 रह गई। यानी सीधी 33 सीटों की गिरावट। दूसरी ओर राहुल गांधी न केवल अमेठी जीतने में सफल रहे, बल्कि रायबरेली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी अधिक अंतर से विजय दर्ज की। यह बदलाव किसी एक चेहरे के विरुद्ध नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक संदेश है। यह संदेश योगी आदित्यनाथ के विरुद्ध नहीं, बल्कि केंद्र की रणनीतियों के प्रति जनता की नाराज़गी को दर्शाता है। विशेष रूप से वह समय जब अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री को दरकिनार कर अपनी पसंद से लोकसभा टिकट बाँटे—उसका खामियाज़ा राज्य नेतृत्व को नहीं, बल्कि सीधे केंद्र को भुगतना पड़ा।

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हालिया घटनाक्रमों पर नज़र डालें तो असंतोष की परतें और स्पष्ट होती हैं—UGC बिल का आना, चौधरी का यूपी भाजपा अध्यक्ष बनना, ब्राह्मण समाज के साथ बैठकों में डाँट-फटकार, और संतोष वर्मा जैसे मामलों में कार्रवाई का अभाव। इन सबका एक साथ घटित होना स्वर्ण समाज की नाराज़गी को स्वाभाविक बनाता है। हालाँकि ठंडे दिमाग से सोचने पर यह भी स्पष्ट है कि यह वर्ग किसी भी कीमत पर योगी आदित्यनाथ से किनारा करने वाला नहीं है। परंतु यदि केंद्र ने अपनी नीतियों और संदेश में सुधार नहीं किया, तो 2029 का रास्ता सचमुच कठिन हो सकता है। मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भाजपा को 100 प्रतिशत सीटें अवश्य मिली हैं, लेकिन यह मान लेना कि भविष्य में भी ऐसा ही बहुमत स्वतः मिलता रहेगा, जोखिम भरा आत्मविश्वास होगा—खासतौर पर तब, जब व्यापक नाराज़गी जमीन पर मौजूद हो। चार राज्यों की हालिया जीत पर पार्टी भले ही अपनी पीठ थपथपा रही हो, पर इन सफलताओं के पीछे मुफ्त सुविधाएँ, महिलाओं को मासिक नकद सहायता और हिंदुत्व का कारक प्रमुख रहा है। जहाँ ये सुविधाएँ पहले से मौजूद थीं—जैसे झारखंड और हिमाचल—वहाँ भाजपा को सफलता नहीं मिली। हिमाचल में पेंशन मुद्दा भारी पड़ा, बिहार में नीतीश कुमार की छवि और ₹10,000 की सहायता निर्णायक बनी।

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सच यह भी है कि भाजपा की एक बड़ी ताकत आज का नाकारा विपक्ष है। शायद भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में इतना कमजोर, असहाय और नेतृत्वविहीन विपक्ष पहली बार देखने को मिला है। यही कमजोरी सत्तापक्ष की जीत का एक बड़ा कारण भी रही है। अतः समय है आत्ममंथन का। नेतृत्व अब सेवा-निवृत्ति के करीब है। ऐसी नीतियाँ लाने से बचना होगा जो परंपरागत वोटबैंक को ही विमुख कर दें। ज़रूरत इस बात की है कि सत्ता न केवल मजबूत बनी रहे, बल्कि भविष्य में योग्य और स्वीकार्य हाथों में उसी गति और विश्वास के साथ स्थानांतरित हो, जिस वेग से विजय का यह रथ 2014 से दौड़ रहा है।

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