सर्दियों का मौसम आते ही लोग गर्म कपड़ों की अलमारी खोल लेते हैं। जैकेट, स्वेटर, मफलर तो पहन लिए जाते हैं, लेकिन सिर और कानों को ढकने में अक्सर लापरवाही बरती जाती है। खासकर युवा वर्ग फैशन के चलते टोपी या ईयर कवर पहनने से बचता है। लेकिन यह छोटी-सी लापरवाही सेहत पर बड़ा असर डाल सकती है।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, कान शरीर का सबसे संवेदनशील अंग होते हैं। इनमें न तो पर्याप्त मांसपेशियां होती हैं और न ही वसा की परत, जो ठंडी हवा से सुरक्षा कर सके। कानों की त्वचा के नीचे तंत्रिकाओं का जाल फैला होता है, जिस पर सर्द हवा का सीधा प्रभाव पड़ता है। यही वजह है कि कानों के जरिए लगी ठंड पूरे शरीर का तापमान असंतुलित कर सकती है।
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कानों का सीधा संबंध मस्तिष्क से होता है। ठंडी हवा जब कानों पर लगती है तो दिमाग की नसें प्रभावित होती हैं, जिससे सिरदर्द, भारीपन और चक्कर आने की समस्या हो सकती है। गंभीर स्थिति में ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होने से बेहोशी तक की नौबत आ सकती है।
कान के पीछे मौजूद फेशियल नर्व चेहरे की मांसपेशियों और रक्त संचार को नियंत्रित करती है। यदि इस हिस्से पर लगातार ठंडी हवा पड़े तो नर्व में सूजन आ सकती है। इससे चेहरे का एक हिस्सा सुन्न पड़ जाना, जबड़ा टेढ़ा हो जाना या अस्थायी लकवे जैसी समस्या भी हो सकती है। हृदय रोग और ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों के लिए यह लापरवाही और ज्यादा खतरनाक हो सकती है। ठंड के संपर्क में आने से रक्त वाहिकाएं सिकुड़ती हैं, जिससे ब्लड प्रेशर असंतुलित हो सकता है। यही कारण है कि सर्दियों में हार्ट पेशेंट्स को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।
डॉक्टरों के अनुसार, सर्द मौसम में कानों को ढककर रखना शरीर की गर्मी बनाए रखने में मदद करता है और तंत्रिका तंत्र को स्थिर रखता है। रात के समय कानों के पीछे हल्के गुनगुने तेल से मालिश करना भी लाभकारी माना जाता है।
