झारखंड: डोर टू डोर सामान पहुंचने वाले गीग श्रमिकों के लिए खुशखबरी, विधेयक को राज्यपाल ने दी मंजूरी

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  • गीग वर्कर्स को अब न्यूनतम पारिश्रमिक और PF मिलेगा
  • गिग वर्कर्स: डिजिटल युग का एक बढ़ता हुआ वर्कफ़ोर्स
  • कानून का उल्लंघन करने वाले एग्रीगेटर को देना पड़ेगा 10 लाख तक जुर्माना
  • राजस्थान के बाद झारखंड ने इस श्रमिक विधेयक को लागू करने की दिशा में बढ़ाया ठोस कदम,

रंजन कुमार सिंह

रांची। बदलते दौर में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म सर्विस ने भाग दौड़ भरी जिंदगी में बड़ी राहत दी है। मोबाइल पर एक क्लिक करते ही चंद मिनटों में दरवाजे पर दवाईयां, खाने पीने के पदार्थ और तमाम जरुरी सामान पहुंच जाते हैं। लेकिन यह किसी ने समझने की कोशिश नहीं की कि जीवन को आसान बनाने वाले गिग श्रमिक किन परेशानियों से जूझते हैं। इस दर्द को झारखंड सरकार ने महसूस किया है। उनके हितों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने मानसून सत्र में झारखंड प्लेटफॉर्म आधारित गिग श्रमिक (निबंधन और कल्याण) विधेयक, 2025 को विधानसभा से पारित कराया था। जिसे राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने मंजूरी दे दी है।

गिग श्रमिक कल्याण बोर्ड का होगा गठन

अब गिग श्रमिकों के लिए कल्याण बोर्ड का गठन का रास्ता साफ हो गया है। इस विधेयक के लागू होने से नियम का उल्लंघन करने वाले एग्रीगेटर को 10 लाख तक का जुर्माना देना पड़ सकता है। बोर्ड का मुख्यालय रांची में होगा। श्रम विभाग के मंत्री इसके पदेन अध्यक्ष होंगे। इसमें विभागीय सचिव के अलावा पांच अन्य सदस्य होंगे। बोर्ड के सदस्यों का कार्यकाल तीन साल का होगा। बोर्ड के जरिए गिग श्रमिकों का पंजीकरण सुनिश्चित होगा। सर्विस देने वाली कंपनियां या एग्रीगेटर्स का भी पंजीकरण होगा।

गिग श्रमिकों को न्यूनतम पारिश्रमिक मिलेगा

अब कार्य के लिए खर्च किए गये समय और तय की गई दूरी के आधार पर न्यूनतम पारिश्रमिक का निर्धारण होगा। सामाजिक सुरक्षा के लिए समय समय पर योजनाएं तैयार की जाएंगी। कल्याण अंशदान की लागत को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से उपभोक्ता या गिग वर्कर्स पर नहीं डालने दिया जाएगा। सभी एग्रीगेटर्स का पंजीकरण अनिवार्य होगा। एग्रीगेटर द्वारा गिग श्रमिकों को शामिल करने वाले परिचालनों से राज्य में अर्जित वार्षिक टर्न ओवर का 02 प्रतिशत से अधिक या 01 प्रतिशत तक कल्याण अंशदान लिया जाएगा। भारत में अगले पांच सालों में गिग़ वर्कर्स की संख्या हो जायेगी। 2.35 करोड़ नीति आयोग के अनुसार भारत में इनकी संख्या 2029–30 तक  23।5 मिलियन (2।35 करोड़) तक पहुंचने का अनुमान है। अकेले झारखंड में इन वर्कर्स की संख्या 50 हजार से अधिक है। इनके लिए सामाजिक सुरक्षा जैसे मातृत्व लाभ, PF आदि एक बड़ी चिंता है जिसपर भारत सरकार और नीति आयोग काम कर रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत में गीग वर्कर्स की संख्या तेजी से बढ़ेगी, इसलिए उनके सामाजिक सुरक्षा और शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करना जरूरी है।

गिग़ श्रमिक विधेयक लागू करने में राजस्थान आगे

मुख्य रूप से राजस्थान और हाल ही में झारखंड ने गिग श्रमिक विधेयक पारित कर लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है, जहाँ राजस्थान ने 2023 में अपना कानून लागू किया और झारखंड ने दिसंबर 2025 में राज्यपाल की मंजूरी के बाद इसे लागू करने का मार्ग प्रशस्त किया है; इसके अलावा, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में भी ऐसे विधेयक हैं, लेकिन राजस्थान और झारखंड वर्तमान में पूर्ण रूप से लागू करने वाले प्रमुख राज्य हैं जो गिग श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा और कल्याण प्रदान करते हैं।

राजस्थान कानून: राजस्थान प्लेटफ़ॉर्म आधारित गिग वर्कर्स (पंजीकरण एवं कल्याण) अधिनियम, 2023।

स्थिति: यह अधिनियम जुलाई 2023 में पारित हुआ और गिग वर्कर्स के लिए पंजीकरण, कल्याण बोर्ड के गठन और एक विशेष ‘वेलफेयर सेस’ (कल्याण उपकर) के माध्यम से फंड जुटाने का प्रावधान करता है। यह देश में लागू करने वाला पहला राज्य है।

झारखंड: गिग श्रमिक (निबंधन एवं कल्याण) विधेयक, 2025।

स्थिति: दिसंबर 2025 में राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह कानून लागू होने के लिए तैयार है, जिसके तहत गिग श्रमिकों के लिए कल्याण बोर्ड बनेगा और उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाएगी।

कर्नाटक: कर्नाटक में भी गिग वर्कर्स के लिए एक ड्राफ्ट बिल (2024) है, जिसमें बीमा जैसे लाभ शामिल हैं, लेकिन यह अभी राजस्थान या झारखंड की तरह पूरी तरह लागू नहीं हुआ है।

तेलंगाना: तेलंगाना में भी एक ड्राफ्ट बिल 2025 में आया है।

बिहार: बिहार ने भी 2025 में अपना गिग श्रमिक अधिनियम पारित किया है।

संक्षेप में, राजस्थान और झारखंड वर्तमान में गिग श्रमिक विधेयक को सफलतापूर्वक पारित कर लागू करने वाले प्रमुख राज्य हैं, जो इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा प्रदान कर रहे हैं।

गिग वर्कर्स किसे कहते हैं: गिग वर्कर्स वे लोग होते हैं जो पारंपरिक स्थायी नौकरी के बजाय, अस्थायी, लचीले या फ्रीलांस काम करते हैं, अक्सर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स (जैसे Uber, Zomato, Swiggy) के ज़रिए, और विशिष्ट कार्यों या प्रोजेक्ट्स के लिए भुगतान पाते हैं, न कि मासिक वेतन पर। ये स्वतंत्र ठेकेदार होते हैं, जिनके पास कंपनी के साथ दीर्घकालिक अनुबंध नहीं होता, और वे अपनी मर्ज़ी से काम चुनते हैं, लेकिन उन्हें नियमित कर्मचारियों के सामाजिक सुरक्षा लाभ (जैसे स्वास्थ्य बीमा, पेंशन) नहीं मिलते।

मुख्य विशेषताएँ

लचीलापन: घंटों और काम के चयन में स्वतंत्रता।

अस्थायी: अल्पकालिक प्रोजेक्ट या कार्य-आधारित काम (गिग)।

प्लेटफ़ॉर्म-आधारित: अक्सर डिजिटल ऐप्स या वेबसाइट्स के ज़रिए काम मिलता है।

स्वतंत्र ठेकेदार: नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के बजाय स्वतंत्र रूप से काम करते हैं।

उदाहरण: राइड-शेयर ड्राइवर, डिलीवरी एजेंट, फ्रीलांस ग्राफिक डिजाइनर, कंसल्टेंट, सॉफ्टवेयर डेवलपर।

गिग वर्कर्स के फायदे और चुनौतियाँ

फायदे: काम करने की आज़ादी, अतिरिक्त आय का स्रोत, वर्क-लाइफ बैलेंस का मौका।

चुनौतियाँ: आय की अनिश्चितता, नौकरी की सुरक्षा का अभाव, स्वास्थ्य लाभ और अन्य सामाजिक सुरक्षा का न मिलना, और ज़्यादा घंटों तक काम करने का दबाव। संक्षेप में, गिग वर्कर्स डिजिटल युग का एक बढ़ता हुआ वर्कफ़ोर्स है जो पारंपरिक नौकरी के ढांचे से बाहर, अपनी शर्तों पर काम करता है।

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