- भ्रष्टाचार के खिलाफ सत्याग्रह जरुरी
- आत्मचितन की प्रवृत्ति बढ़े
- पारिवारिक संस्थाओ मे मचा है उथल पुथल
- साधु संत भी ग्लैमर की बजाय साधना पर दे जोर
- शिक्षा और चिकित्सा मे शुचिता लायें- बंद हो धनादोहन
- व्यवसाई बंद करे मिलावट
- भूमाफिया और शिक्षा माफिया पर लगे लगाम

भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए एक और गांधी की तलाश है। जो ईमानदारी से सत्ता शासन मे बैठ कर कमीशन खोरी और रिश्वत लेनै मे मशगूल हैं उनके खिलाफ जनता को जगा सके और व्यवसाय जगत मे मिलावट खोरी कर जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वालो पर लगाम लगा सके। हमे शिक्षा और भूमाफियो के खिलाफ भी संघर्ष करने वालो की जरुरत है। साथ ही झूठा वायदा कर सत्ता हथियाने वालो के खिलाफ भी महात्मा गांधी की तरह अहिंसक सत्याग्रही की तलाश है। हम तोड़ फोड़ आगजनी के तरीको पर विश्वास नहीं करते पर सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए राजनीतिक शुचिता कायम करने के पक्ष मे हैं। काम कठिन है किंतु असंभव नहीं। असत्य ,अन्याय और भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ा होना ही होगा। अन्यथा लोकतंत्र खतरे मे पड़ जाएगा। आजादी के संघर्ष के बाद मिली ल़ोकतंत्र रुपी गंगा दिनो दिन अत्यंत प्रदूषित होती जारही है। इस गंगा का शुद्धिकरण करना होगा।
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इमर्जेंसी के बाद जेपी आंदोलन मे कुछ उम्मीद बंधी थी, पर चार साल मे ही वह धराशाई होगई। सत्तालोलुपों ने ठीक से शासन चलने नही दिया जनता दल खंड होगया। फिर भ्रष्टाचार का ऐसा तांडव नर्तन हुआ कि सारी संस्थायें आकंठ उसमे डूब गईं। वित्तविहीन मान्यता देकर शिक्षा विभाग को भी भ्रष्टता के शीर्ष पर पहुंचा दिया। प्राईवेटाजेशन कर सरकारी संस्थाओ को बेहतर बनाने की कोशिश बेकार साबित हुई और चिकित्सा मे जांच के नाम पर मरीजो की लूट जारी हो गई। परिणाम स्वरूप शिक्षा और चिकित्सा महंगी होती गई।
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अन्ना आंदोलन मे एंटी काग्रेस मूवमेंट चला। सत्ता बदली पर व्यवस्था ज्यों की त्यों बनी रही।अब एक दूसरे की धोती खिंचौवल शुरू हुई और विपक्ष को नंगा करने और अपनो को सुरक्षा देने का दौर चला। मूल समस्याये ज्यों की त्यो रही। सत्ता नृशंश होती गई,भ्रष्टाचारी निरंकुश। थोड़ा बहुत बदलाव दिखा पर वे ढाक के तीन पात ही सिद्ध हुए। हमारे देश के बुद्विजीवी इससे आहत है,संवेदन शील चिंतित है और राजनीतिक पार्टियां सिर्फ वोट पाने तक सीमित होकर रह गई हैं।
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प्राकृतिक आपदाये चैलेंज बन कर आती रहीं है और आ भी रही हैं। उनसे बचाव के लिए हमे पर्यावरण पर ध्यान देना ही होगा। पारिवारिक संस्थाओ मे तेजी से बदलाव आरहा है। प्रेम विवाह के नाम पर विकृत मानसिकतायें धर्म जाति का वंधन तोड़ कर नये नये प्रयोग करने मे जुटी है। जिसमे पति-पत्नी के बीच रिश्ते बिखरने लगे ,तीसरा भी घटक शामिल होकर सामाजिक विकृति पैदा कर रहा है। युवा असंयमित होरहे हैं और वृद्ध लाचार। फलत: परिवार के परिवार तहस नहस होते जारहे है। आपसी प्रेम घट रहे और स्वार्थ से पारिवारिक विघटन तेजी से बढ़ रहा है।
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साधु संत के प्रति वह आदर भाव नही रहा जो पहले था। तरह तरह के रूप धर कर कथावार्ताये चल रहीं। चारित्रिक शुद्धि पर ध्यान देने के बजाय वस्त्र और ग्लैमर कथा वक्ताओ मे अधिक देखा जारहा,जिसमे आध्यात्मिक जीवन के बजाय चमक दमक की प्रधानता दिखने लगी। इसलिए सकारात्मक संदेश समाज को नहीं मिल पारहा। इस तरह हर तरफ विकृतियो को पनपने का अवसर मिल रहा है। काश इस देश को तपस्वी साधक और ईमानदारी से देश हित की सोचने वाले मिल पाते? एक और गांधी जेसा व्यक्तित्व मिल पाता जो सबको दिशा दे पाता?
