आरक्षण पर बाबा साहब की सोच से दलित समाज की दूरी का खतरा

                                                                                                                संजय सक्सेना

Dr. Bhimrao Ambedkar: बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर आजकल दलित राजनीति का संबल बने हुए हैं। बाबा साहब की फोटो लेकर उनके विचारों के नाम पर दलितों को खूब भड़काया और कथित तौर पर अगड़ों से लड़ाया जा रहा है। बाबा साहब के नाम के सहारे संविधान निर्माण को लेकर पिछले कुछ वर्षों में जो सार्वजनिक विमर्श तैयार किया जा रहा है, वह हकीकत से कितना दूर है या कितना पास, यह एक बड़ा सवाल है। जिसे समझने के लिए तथ्यों और राजनीति दोनों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

यह निर्विवाद है कि डॉ. अंबेडकर 29 अगस्त 1947 को गठित संविधान सभा की सात सदस्यीय प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग कमेटी) के अध्यक्ष थे। इस हैसियत से उन्होंने न केवल संविधान के मसौदे को अंतिम रूप देने का नेतृत्व किया, बल्कि लगभग दो वर्ष 11 महीने 18 दिन तक चली संविधान सभा की बहसों में हर अनुच्छेद, हर संशोधन का बौद्धिक बचाव भी किया। कानून, तुलनात्मक संविधानों और प्रशासनिक व्यवस्था की उनकी गहरी समझ इस पूरी प्रक्रिया में केंद्रीय रही, और मौलिक अधिकारों तथा सामाजिक न्याय की भावना को संवैधानिक भाषा देने में उनकी भूमिका को कोई गंभीर इतिहासकार नकारता नहीं है।

बहरहाल, इससे बड़ा सच यह है कि संविधान निर्माण कोई एक व्यक्ति का काम नहीं था, बल्कि संविधान सैकड़ों लोगों के सामूहिक श्रम का परिणाम था। संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार बी.एन. राव ने वह प्रारंभिक मसौदा (फर्स्ट ड्राफ्ट) तैयार किया था, जिसकी समीक्षा कर प्रारूप समिति ने उसे अंतिम रूप दिया। राव ने दुनिया भर के संविधानों का अध्ययन कर एक बुनियादी ढांचा खड़ा किया, जिस पर आगे का काम हुआ।

इसी तरह प्रारूप समिति के अन्य सदस्य अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, के.एम. मुंशी, एन. गोपालस्वामी आयंगर, सैयद मोहम्मद सादुल्ला, डी.पी. खेतान (जिनके निधन के बाद टी.टी. कृष्णमाचारी शामिल हुए) और बी.एल. मित्तर भी अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ थे। अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर को कई विधि विशेषज्ञ संविधान का तकनीकी वास्तुकार तक कहते हैं।

ये भी पढें

विकास कार्यों में देरी पर DM गौरव सिंह सोगरवाल का कड़ा एक्शन

संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पूरी प्रक्रिया का संचालन किया, जवाहरलाल नेहरू का उद्देश्य प्रस्ताव (ऑब्जेक्टिव्स रिजॉल्यूशन) संविधान की मूल दिशा तय करने वाला दस्तावेज बना, और सरदार पटेल ने मौलिक अधिकार तथा अल्पसंख्यक संबंधी समितियों का नेतृत्व करते हुए रियासतों के एकीकरण जैसे जटिल कार्य को भी साथ-साथ संभाला। इस पृष्ठभूमि में यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही होगा कि अंबेडकर संविधान के प्रमुख शिल्पकार थे, न कि एकमात्र निर्माता।

यह भेद बारीक है, लेकिन राजनीतिक विमर्श में अक्सर गायब हो जाता है। पिछले कुछ दशकों में, खासकर बहुजन राजनीति के उभार और फिर BJP जैसी पार्टियों द्वारा दलित-वंचित मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिशों के बाद, लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस, BJP, BSP, RPI और वामपंथी दल भी अंबेडकर को अपनी विचारधारा से जोड़कर पेश करते रहे हैं।

यह होड़ स्वाभाविक रूप से इतिहास के सरलीकरण की ओर ले जाती है, जहां जटिल सामूहिक प्रक्रिया को एक ही नायक की गाथा में बदल दिया जाता है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हर पक्ष अंबेडकर के नाम, प्रतीक और विरासत का इस्तेमाल अपने राजनीतिक-सामाजिक आधार को मजबूत करने के लिए करता है।

सवाल सिर्फ इतना है कि इसमें अंबेडकर के मूल वैचारिक अवदान (संवैधानिक नैतिकता, सामाजिक लोकतंत्र, शिक्षा और संगठन पर जोर) को कितनी गंभीरता से आगे बढ़ाया जा रहा है, और कितना उसे केवल प्रतीकात्मक राजनीति तक सीमित रखा जा रहा है। यह मूल्यांकन हर पर्यवेक्षक अपने राजनीतिक झुकाव के हिसाब से अलग-अलग तरीके से करता है। बात आरक्षण की की जाए तो आरक्षण को लेकर अंबेडकर की सोच भी उतनी ही सूक्ष्म थी, जितनी आज के विमर्श में उसे दिखाया नहीं जाता।

1932 के पूना पैक्ट के बाद, जब गांधी के अनशन के दबाव में अंबेडकर को दलितों के लिए अलग निर्वाचिका (सेपरेट इलेक्टोरेट) की मांग छोड़नी पड़ी, तब आरक्षित सीटों को एक समझौते के रूप में स्वीकार किया गया था। संविधान सभा में अंबेडकर ने विधायी निकायों में अनुसूचित जातियों-जनजातियों के लिए आरक्षण की पुरजोर वकालत की, लेकिन उन्होंने खुद इसे शुरुआत में दस वर्ष के लिए सीमित रखने का प्रस्ताव रखा था, इस उम्मीद के साथ कि सामाजिक समानता आने पर इसकी समीक्षा होगी।

सरकारी नौकरियों में आरक्षण को उन्होंने प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के औजार के रूप में देखा, आर्थिक कल्याण योजना के रूप में नहीं। आज की स्थिति देखें तो विधायी आरक्षण को बार-बार संवैधानिक संशोधनों से आगे बढ़ाया जाता रहा है, 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग को इसमें जोड़ा गया, और 2019 में आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए भी आरक्षण की नई श्रेणी बनाई गई।

ये भी पढें

G20 समिट के लिए अमेरिका जाएंगे PM मोदी? ट्रंप से मुलाकात की चर्चा तेज

यानी आरक्षण की मूल संकल्पना, जो अंबेडकर के समय जाति आधारित ऐतिहासिक भेदभाव की भरपाई तक सीमित थी, आज कहीं व्यापक और स्थायी रूप ले चुकी है। इसे लेकर भी दो स्पष्ट खेमे हैं। एक पक्ष मानता है कि सामाजिक असमानता अब भी उतनी ही गहरी है, इसलिए आरक्षण की सतत आवश्यकता है; दूसरा पक्ष तर्क देता है कि अंबेडकर की मूल भावना समयबद्ध, लक्षित और समीक्षा योग्य व्यवस्था से आज की व्यवस्था कहीं दूर जा चुकी है।

दोनों तर्कों के अपने आंकड़े और अपने समर्थक हैं, और यह विषय अकादमिक व राजनीतिक रूप से अब भी अनसुलझा है। बात उन नामों की की जाए जो संविधान निर्माण में गहराई से जुड़े रहे, लेकिन आज के लोकप्रिय विमर्श में लगभग गुम हैं बी.एन. राव (जिन्होंने पहला मसौदा तैयार किया), अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, के.एम. मुंशी, एन. गोपालस्वामी आयंगर, टी.टी. कृष्णमाचारी, डी.पी. खेतान, और स्वयं राजेंद्र प्रसाद व सरदार पटेल इन सबका योगदान दस्तावेजी रूप से दर्ज है, लेकिन पहचान की राजनीति और वोट-बैंक केंद्रित विमर्श में इन्हें वह जगह नहीं मिली जो शायद मिलनी चाहिए थी।

यह प्रवृत्ति सिर्फ अंबेडकर के मामले में नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के व्यापक चलन का हिस्सा है, जहां इतिहास को अक्सर सामूहिक स्मृति के बजाय चुनावी लाभ के चश्मे से गढ़ा और परोसा जाता है।कुल मिलाकर अंबेडकर का योगदान वास्तविक, केंद्रीय और अपरिहार्य था।

इसे कम आंकना अन्याय होगा। लेकिन इसे एकांगी नायकत्व में बदल देना भी संविधान निर्माण की सामूहिक, बहुलतावादी प्रक्रिया के साथ अन्याय है। आज जरूरत इस बात की है कि अंबेडकर के विचारों चाहे वे संवैधानिक नैतिकता पर हों या आरक्षण की मूल भावना का ईमानदार अध्ययन हो, न कि केवल उनकी छवि का राजनीतिक दोहन।

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

Google Play Store: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.app.nayalooknews

ये भी पढें

आजमगढ़ में पूजा करा रही पत्नी और दो पंडितों को पति ने गोलियों से भूना

मोहनलालगंज: गणेश मूर्ति विसर्जन के दौरान दो युवक सई नदी में डूबे

बनारस रेल इंजन कारखाना में हिन्दी वाक् प्रतियोगिता

अंजान लिंक से हुई 95 हजार की ठगी, पुलिस ने 70 हजार रुपये लौटाए

कटघरे में चुनाव आयोग

 

 

Spread the love

Lucknow
Politics Uttar Pradesh

AI वीडियो-पोस्टरों से गरमायी यूपी की सियासत

Lucknow: 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की सियासत सोशल मीडिया पर एक नई शक्ल में उतर आई है। समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच अब पारंपरिक भाषण-बाज़ी से आगे बढ़कर AI-निर्मित वीडियो और पोस्टरों की जंग छिड़ गई है, जिसे कई हलकों में AI वॉर कहा जा रहा है। हालिया […]

Spread the love
Read More
homeslider Politics Uttar Pradesh

G20 समिट के लिए अमेरिका जाएंगे PM मोदी? ट्रंप से मुलाकात की चर्चा तेज

PM मोदी दिसंबर में जा सकते हैं अमेरिका, G20 में ट्रंप से मुलाकात के आसार New Delhi : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिसंबर में अमेरिका दौरे को लेकर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। अगर यह यात्रा तय होती है, तो प्रधानमंत्री मोदी फ्लोरिडा में आयोजित होने वाले G20 लीडर्स समिट में हिस्सा ले सकते […]

Spread the love
Read More
Politics Uttar Pradesh

भाजपा राज में सबसे ज्यादा शोषण OBC का

पिछड़े वर्ग को जागरूक कर रही है कांग्रेस Lucknow: पिछड़ा वर्ग विभाग,उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी लगातार बिहार और तेलंगाना में हुए जातिगत जनगणना मॉडल पर ही देश भर में जनगणना – 2027 को बैज्ञानिक जातिगत जनगणना कराने की मांग और डबल इंजन की RSS BJP सरकार में OBC के शोषण और हत्याओं को लेकर प्रदेश […]

Spread the love
Read More