
पश्चिमी यूपी में सपा का नया सियासी दांव
Tyagi-Brahmin vote: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी यूपी सियासी प्रयोगशाला बनता जा रहा है। राष्ट्रीय लोक दल (RLD) के साथ गठबंधन टूटने के बाद समाजवादी पार्टी अब इस इलाके में अपने दम पर सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। पार्टी ने पहले गुर्जर समाज को साधने की कवायद शुरू की और अब उसकी नजर त्यागी-ब्राह्मण वोट बैंक पर है।
सपा ने इस रणनीति को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी घोसी से पार्टी सांसद राजीव राय को दी है। भूमिहार समाज से आने वाले राजीव राय को पार्टी पश्चिमी यूपी में त्यागी और ब्राह्मण समाज के बीच एक राजनीतिक पुल के तौर पर पेश कर रही है। सवाल यह है कि क्या उनकी पहल सपा के लिए नए सामाजिक समीकरण का आधार बन पाएगी?
त्यागी-ब्राह्मण वोटों पर सपा की नजर
पश्चिमी यूपी की राजनीति में जाट-मुस्लिम समीकरण और किसान राजनीति की चर्चा सबसे ज्यादा होती है, लेकिन त्यागी और ब्राह्मण मतदाता भी कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बुलंदशहर, बिजनौर और आसपास के इलाकों में इन समुदायों की राजनीतिक मौजूदगी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी समीकरण को देखते हुए सपा ने मुजफ्फरनगर से अपनी रणनीति को आगे बढ़ाया है।
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वरिष्ठ सपा नेता प्रमोद त्यागी की ओर से आयोजित त्यागी-ब्राह्मण सम्मेलन में राजीव राय ने शिरकत की और बीजेपी सरकार पर जमकर निशाना साधा। राजीव राय ने किसानों से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए आरोप लगाया कि किसान आंदोलन के दौरान किसानों को अपमानित किया गया और उनके खिलाफ कार्रवाई की गई। उन्होंने गन्ना किसानों की समस्याओं और एथेनॉल नीति को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाए।
PDA में ‘पंडित’ को जोड़ने की कोशिश
सपा प्रमुख अखिलेश यादव की ‘PDA’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक आधारित रणनीति में अब ब्राह्मण समाज को जोड़ने की कोशिश दिखाई दे रही है। पार्टी की कोशिश है कि सामाजिक गठबंधन को विस्तार देकर ऐसा समीकरण तैयार किया जाए, जिसमें मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के साथ सवर्ण समाज का एक हिस्सा भी उसके साथ आए। राजीव राय इसी रणनीति के अहम चेहरे के तौर पर सामने आए हैं। सपा उन्हें शिक्षित, सौम्य और प्रभावशाली वक्ता के तौर पर पेश कर रही है। पार्टी को उम्मीद है कि उनके जरिए सवर्ण समाज के बीच उसकी राजनीतिक पहुंच बढ़ाई जा सकती है।
कभी कांग्रेस, फिर चौधरी परिवार और अब बीजेपी का मजबूत आधार
पश्चिमी यूपी में त्यागी समाज की राजनीतिक पसंद समय के साथ बदलती रही है। लंबे समय तक कांग्रेस के साथ रहने के बाद इस समाज के एक हिस्से ने चौधरी चरण सिंह और अजित सिंह की राजनीति का समर्थन किया। पिछले कुछ चुनावों में त्यागी समाज का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ खड़ा नजर आया है।
हालांकि किसान आंदोलन, स्थानीय राजनीतिक मुद्दों और टिकट वितरण जैसे सवालों को लेकर इस समाज के एक हिस्से में समय-समय पर नाराजगी भी सामने आती रही है। सपा इसी संभावित असंतोष को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रही है।
‘आत्मनिर्भर’ बनना चाहती है सपा
RLD के साथ गठबंधन के बाद पश्चिमी यूपी में सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने दम पर सामाजिक समीकरण तैयार करने की है। पार्टी जानती है कि केवल मुस्लिम वोटों के सहारे बीजेपी को चुनौती देना आसान नहीं होगा। ऐसे में उसे गैर-मुस्लिम और गैर-यादव वोटों में भी सेंध लगानी होगी। यही वजह है कि सपा अब गुर्जर के बाद त्यागी-ब्राह्मण समाज को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।
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पार्टी का लक्ष्य सिर्फ वोट हासिल करना नहीं, बल्कि पश्चिमी यूपी में ऐसा सामाजिक आधार तैयार करना है, जो किसी सहयोगी दल पर उसकी निर्भरता कम कर सके। राजीव राय का कहना है कि बीजेपी ने त्यागी-ब्राह्मण समाज को लंबे समय तक सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया, जबकि राजनीतिक हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व के मामले में उसे अपेक्षित स्थान नहीं मिला। सपा का दावा है कि वह इस समाज को संगठन और चुनावी राजनीति में उचित भागीदारी देगी।
क्या 5-10 फीसदी वोट बदल सकता है पूरा खेल?
सपा की रणनीति की असली परीक्षा चुनावी मैदान में होगी। अगर मुस्लिम और ओबीसी वोटों के साथ त्यागी-ब्राह्मण समाज के वोटों का एक छोटा हिस्सा भी उसके पक्ष में आता है, तो पश्चिमी यूपी की कई करीबी सीटों पर चुनावी गणित बदल सकता है।
मसलन, पांच से 10 फीसदी वोटों का मामूली स्विंग भी उन सीटों पर निर्णायक हो सकता है, जहां बीजेपी और विपक्षी उम्मीदवारों के बीच मुकाबला बेहद करीबी रहता है। इसके साथ ही बीजेपी के परंपरागत वोट बैंक में सेंध का संदेश भी सपा के लिए राजनीतिक रूप से अहम होगा।
लेकिन राह आसान नहीं
हालांकि सपा के सामने चुनौती भी कम नहीं है। त्यागी-ब्राह्मण समाज का बड़ा हिस्सा अब भी बीजेपी के साथ मजबूत राजनीतिक जुड़ाव रखता है। ऐसे में सिर्फ सम्मेलन और राजनीतिक बयानबाजी के जरिए इस वोट बैंक को पूरी तरह अपने पक्ष में करना आसान नहीं होगा।
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