‘दादा’ से कैसे बना ‘डालडा’? जानिए भारत के सबसे मशहूर वनस्पति घी की दिलचस्प कहानी

The story behind the name Dalda

The story behind the name Dalda : एक दौर था जब भारतीय रसोई की पहचान ‘डालडा’ हुआ करता था। शादी-ब्याह से लेकर त्योहारों तक, हर खास मौके पर बनने वाले व्यंजनों में डालडा का इस्तेमाल आम बात थी। कई दशकों तक यह वनस्पति घी का पर्याय बना रहा। हालांकि, समय के साथ रिफाइंड तेलों के बढ़ते चलन ने इसकी लोकप्रियता को कम कर दिया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ‘डालडा’ नाम कैसे पड़ा और इसके पीछे किस शख्स का योगदान था? इसकी कहानी भारत के औद्योगिक इतिहास और ब्रिटिश दौर से जुड़ी हुई है।

कासिम दादा ने रखी थी नींव

1930 के दशक से पहले भारत में शुद्ध देसी घी आम लोगों की पहुंच से बाहर था। उस समय महंगाई और आर्थिक परिस्थितियों के कारण सस्ता विकल्प तलाशा जा रहा था। ऐसे में कारोबारी कासिम दादा ने डच कंपनी से हाइड्रोजनेटेड वेजिटेबल ऑयल (वनस्पति घी) आयात करना शुरू किया। उन्होंने इस उत्पाद को ‘दादा वनस्पति’ नाम से भारतीय बाजार में बेचना शुरू किया। कम कीमत और घी जैसा स्वाद होने के कारण यह उत्पाद तेजी से लोकप्रिय होने लगा।

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कैसे बना ‘Dalda’ नाम?

उस समय हिंदुस्तान वनस्पति मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (जो बाद में हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) बनी) भी भारतीय बाजार में वनस्पति घी का उत्पादन शुरू करना चाहती थी।

ब्रिटिश कंपनी Lever Brothers ने कासिम दादा से ‘Dada’ नाम के अधिकार खरीद लिए। कंपनी अपने ब्रांड की अलग पहचान बनाना चाहती थी, इसलिए उसने अपने नाम Lever का पहला अक्षर ‘L’ बीच में जोड़ दिया। इस तरह ‘Dada’ से ‘Dalda’ नाम अस्तित्व में आया। यानी Da + L + Da = Dalda। यही नाम आगे चलकर भारत में वनस्पति घी का सबसे बड़ा ब्रांड बन गया।

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दशकों तक बाजार पर रहा राज

डालडा ने लगभग 25 से 30 वर्षों तक भारतीय बाजार पर मजबूत पकड़ बनाए रखी। इसकी सबसे बड़ी वजह इसकी कम कीमत और आसानी से उपलब्ध होना था। मध्यम वर्गीय परिवारों में इसे देसी घी के किफायती विकल्प के रूप में अपनाया गया। त्योहारों पर मिठाइयां, पूड़ी, पराठे और अन्य व्यंजन बनाने में डालडा का खूब इस्तेमाल होता था। कई लोगों के लिए यह सिर्फ एक ब्रांड नहीं बल्कि रसोई का अहम हिस्सा बन गया था।

रिफाइंड तेलों ने बदल दी तस्वीर

21वीं सदी की शुरुआत में खाद्य तेल बाजार में बड़ा बदलाव आया। मूंगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन, सरसों, तिल और राइस ब्रान जैसे रिफाइंड तेल बड़ी मात्रा में बाजार में आने लगे।

स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और ट्रांस फैट को लेकर चिंताओं के कारण लोगों ने धीरे-धीरे वनस्पति घी की जगह रिफाइंड तेलों को अपनाना शुरू कर दिया। कीमत और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से डालडा की मांग लगातार घटती गई।

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