पुलिस नहीं सरकारी वकीलों की कमी से न्याय व्यवस्था लड़खड़ा रही

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संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

Social Media देश में जब भी कोई बड़ा अपराध होता है, सबसे पहले सवाल पुलिस पर उठते हैं। टीवी बहसों से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा इस बात पर होती है कि पुलिस समय पर क्यों नहीं पहुंची, जांच में देरी क्यों हुई, सबूत कैसे छूट गए और आरोपी कब गिरफ्तार होगा। लेकिन जैसे-जैसे मामला अदालत तक पहुंचता है, लोगों की दिलचस्पी कम होने लगती है। यहीं से भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था का वह हिस्सा शुरू होता है, जिस पर सबसे कम चर्चा होती है, जबकि किसी भी मामले का अंतिम परिणाम उसी पर निर्भर करता है। यह हिस्सा है सरकारी अभियोजन व्यवस्था, यानी सरकारी वकीलों की पूरी प्रणाली। हाल के वर्षों में सामने आए कई चर्चित आपराधिक मामलों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या केवल पुलिस पर दोष मढ़ देना न्याय व्यवस्था की असली तस्वीर दिखाता है। किसी भी आपराधिक मुकदमे में पुलिस का काम जांच करना, सबूत जुटाना, गवाहों के बयान दर्ज करना और आरोप पत्र दाखिल करना होता है। इसके बाद पूरा मामला सरकारी वकील और अदालत के हाथ में चला जाता है। अगर मुकदमे की पैरवी कमजोर रही, गवाह समय पर पेश नहीं हुए, इलेक्ट्रॉनिक और फॉरेंसिक सबूतों को सही तरीके से अदालत में नहीं रखा गया या कानूनी दलीलों का प्रभावी जवाब नहीं दिया गया, तो मजबूत जांच भी अदालत में टिक नहीं पाती।

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पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि देश में राज्यों के पुलिस बल के लिए 26.23 लाख पद स्वीकृत हैं, लेकिन वास्तविक तैनाती करीब 20.91 लाख कर्मियों की ही है। यानी 5.31 लाख से अधिक पद खाली पड़े हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि स्वीकृत हर पांच में से लगभग एक पद रिक्त है। संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुसार प्रति एक लाख आबादी पर 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए, जबकि भारत में यह संख्या करीब 153 है। राजधानी दिल्ली जैसे अपेक्षाकृत बेहतर संसाधनों वाले क्षेत्र में भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2025 तक दिल्ली पुलिस में 83 हजार से अधिक स्वीकृत पदों के मुकाबले नौ हजार से ज्यादा पद खाली थे। यह आंकड़े बताते हैं कि पुलिस बल पर दबाव वास्तविक है, लेकिन समस्या यहीं खत्म नहीं होती। असल संकट अदालत के दरवाजे पर शुरू होता है। देशभर की जिला अदालतों में मुकदमों का जो बोझ है, वह लगातार बढ़ता जा रहा है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार जिला और अधीनस्थ अदालतों में कुल लंबित मामलों की संख्या पांच करोड़ से अधिक है। इनमें केवल आपराधिक मामलों की संख्या ही 3.8 करोड़ से ज्यादा है। हर महीने लाखों नए मुकदमे दर्ज होते हैं और लाखों मामलों का निपटारा भी होता है, लेकिन नई फाइलों की रफ्तार इतनी तेज है कि लंबित मामलों का पहाड़ लगातार खड़ा रहता है। इसका सबसे बड़ा असर पीड़ितों, गवाहों और आरोपियों तीनों पर पड़ता है।

समस्या सिर्फ अदालतों में लंबित मामलों की नहीं, बल्कि उन्हें लड़ने वाले सरकारी वकीलों की भी है। कई जिलों में एक सरकारी वकील को एक साथ कई अदालतों की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। उत्तर भारत के कई न्यायिक जिलों में ऐसी स्थिति सामने आई है जहां सीमित संख्या में अभियोजकों को रोज सैकड़ों मामलों की पैरवी करनी पड़ रही है। नोएडा-एनसीआर जैसे तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों में प्रतिदिन सैकड़ों नए आपराधिक मुकदमे अदालतों तक पहुंचते हैं, जबकि उपलब्ध सरकारी वकीलों की संख्या बेहद सीमित है। परिणाम यह होता है कि हर तारीख पर मुकदमे की तैयारी प्रभावित होती है, गवाहों से प्रभावी जिरह नहीं हो पाती, केस डायरी का गहराई से अध्ययन नहीं हो पाता और सुनवाई टलती चली जाती है।हरियाणा के पंचकूला जिला न्यायालयों में भी अभियोजन विभाग में अधिकारियों की कमी को लेकर लगातार चिंता जताई गई है। वहां डिप्टी डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी और असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी के पर्याप्त पद नहीं होने के कारण जूनियर अधिकारियों को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर की अदालतों में भी मुकदमे संभालने पड़ रहे हैं। इससे मुकदमों की गुणवत्ता प्रभावित होने की शिकायतें सामने आई हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जब एक अभियोजक को एक ही दिन में कई अदालतों में उपस्थित होना पड़े तो किसी भी मुकदमे की गहराई से तैयारी कर पाना लगभग असंभव हो जाता है।

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यौन अपराधों से जुड़े मामलों की स्थिति भी चिंता बढ़ाती है। दिल्ली में पॉक्सो कानून के तहत दर्ज मामलों में पिछले वर्षों के दौरान निपटारे की गति बढ़ी जरूर है, लेकिन हजारों मामले अब भी लंबित हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे मुकदमों की है जो छह से दस वर्षों से फैसले का इंतजार कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि विशेष अदालतों, प्रशिक्षित अभियोजकों और आधुनिक डिजिटल ढांचे की कमी इस देरी का बड़ा कारण है। बच्चों और महिलाओं से जुड़े मामलों में देरी केवल कानूनी समस्या नहीं होती, बल्कि इसका सीधा असर पीड़ितों के मानसिक स्वास्थ्य और न्याय पर भरोसे पर भी पड़ता है। भारतीय न्याय संहिता , भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता  और भारतीय साक्ष्य अधिनियम लागू होने के बाद अभियोजन व्यवस्था की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। नए कानूनों में डिजिटल सबूत, फॉरेंसिक जांच, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और समयबद्ध प्रक्रिया पर विशेष जोर दिया गया है। अब केवल चार्जशीट दाखिल कर देना पर्याप्त नहीं होगा। अदालत में डिजिटल साक्ष्यों की वैधानिक स्वीकार्यता सुनिश्चित करना, फॉरेंसिक रिपोर्ट की वैज्ञानिक व्याख्या करना और तकनीकी पहलुओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना भी उतना ही जरूरी हो गया है। इसके लिए ऐसे सरकारी वकीलों की आवश्यकता है जिन्हें साइबर अपराध, आर्थिक अपराध, डिजिटल फॉरेंसिक और आधुनिक साक्ष्य कानूनों की विशेष जानकारी हो।

विडंबना यह है कि राज्यों में पुलिस भर्ती की घोषणाएं अक्सर सुर्खियां बनती हैं, लेकिन अभियोजन विभाग में वर्षों से खाली पड़े पद शायद ही कभी सार्वजनिक बहस का विषय बनते हैं। जबकि दोषसिद्धि की दर बढ़ाने में पुलिस और अभियोजन दोनों की समान भूमिका होती है। अगर जांच एजेंसी मजबूत सबूत जुटा भी ले, लेकिन अदालत में उनका प्रभावी उपयोग न हो सके तो पूरा मामला कमजोर पड़ जाता है। यही कारण है कि कई बार लोग केवल पुलिस जांच को दोष देते हैं, जबकि वास्तविक समस्या अदालत में मुकदमे की पैरवी के स्तर पर होती है।विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे पहले राज्यों को अभियोजन विभाग के लिए वैज्ञानिक मानव संसाधन नीति तैयार करनी होगी। सरकारी वकीलों की संख्या दशकों पुराने प्रशासनिक ढांचे के आधार पर तय करने के बजाय प्रत्येक जिले में दर्ज होने वाले मामलों, अदालतों की संख्या और अपराध के प्रकार के आधार पर निर्धारित की जानी चाहिए। जिन जिलों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में नए मुकदमे आते हैं, वहां उसी अनुपात में अभियोजकों की नियुक्ति अनिवार्य होनी चाहिए।

इसके साथ अभियोजन सेवा को एक पेशेवर और विशेषज्ञ कैडर के रूप में विकसित करना भी जरूरी है। नियमित प्रशिक्षण, आधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों की जानकारी, साइबर अपराध की समझ और पीड़ित-केंद्रित न्याय प्रणाली पर विशेष पाठ्यक्रम अभियोजकों की क्षमता बढ़ा सकते हैं। गंभीर अपराधों में पुलिस और सरकारी वकीलों के बीच शुरुआती स्तर से समन्वय भी आवश्यक है। कई विकसित देशों में अभियोजक जांच के शुरुआती चरण से ही पुलिस के साथ काम करते हैं ताकि बाद में अदालत में तकनीकी खामियों के कारण मामला कमजोर न पड़े।महिलाओं के खिलाफ अपराध, संगठित अपराध, साइबर अपराध और बच्चों से जुड़े मामलों के लिए अलग अभियोजन इकाइयां बनाने की जरूरत भी लंबे समय से महसूस की जा रही है। कुछ राज्यों ने विशेष अदालतों और फास्ट ट्रैक अदालतों की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, लेकिन जब तक उनके साथ पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित सरकारी वकील नहीं होंगे, तब तक अपेक्षित परिणाम मिलना कठिन रहेगा। इसी तरह डिजिटल केस मैनेजमेंट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित दस्तावेज प्रबंधन, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की डिजिटल प्रस्तुति और गवाहों के लिए स्मार्ट शेड्यूलिंग सिस्टम जैसी तकनीकों का व्यापक उपयोग मुकदमों की गति बढ़ा सकता है। भारतीय न्याय व्यवस्था का संकट केवल पुलिस बल की कमी नहीं है। यह पुलिस, फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं, सरकारी वकीलों और अदालतों की संयुक्त क्षमता का सवाल है। यदि इस पूरी श्रृंखला की एक भी कड़ी कमजोर होगी तो न्याय मिलने में वर्षों लगेंगे। पांच लाख से अधिक खाली पुलिस पद भरना निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन उतना ही आवश्यक अभियोजन व्यवस्था को मजबूत करना भी है। आखिर किसी भी आपराधिक मुकदमे का असली अंत गिरफ्तारी से नहीं, बल्कि अदालत के अंतिम फैसले से होता है। जब तक अदालत तक पहुंचने वाली इस सबसे महत्वपूर्ण कड़ी को पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित मानवबल और आधुनिक व्यवस्था नहीं मिलेगी, तब तक न्याय की रफ्तार सुर्खियों से कहीं पीछे ही चलती रहेगी।

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