विनय कटियारः आंदोलन के नायक से उपेक्षित चेहरे तक

Vinay Katiyar
अजय कुमार                             
अजय कुमार

Vinay Katiyar श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन के इतिहास में विनय कटियार का नाम स्तंभ के रूप में दर्ज है, जिन्होंने न केवल इस आंदोलन को वैचारिक और धरातलीय आधार प्रदान किया, बल्कि बजरंग दल के संस्थापक के रूप में कारसेवकों की एक पूरी फौज खड़ी कर दी थी, लेकिन रामलला का भव्य मंदिर अस्तित्व में आने के बाद, विनय कटियार की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ वह हाशिए पर, एकाकी और उपेक्षित नजर आते हैं। उनके इस अलगाव के पीछे केवल राजनीति का बदलता स्वरूप नहीं है, बल्कि उनकी वह बेबाक और अनियंत्रित शैली है, जिसने उन्हें सत्ता के गलियारों में विद्रोही या बेमेल घोषित कर दिया है। यह एक विडंबना ही है कि जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी जवानी उस लक्ष्य को समर्पित कर दी, आज वह उसी लक्ष्य की पूर्णता के बाद स्वयं को अप्रासंगिक महसूस कर रहा है।उधर, आज भी विनय कटियार, न्यास के महासचिव चंपत राय को सबसे बेकार बता रहे हैं और वह यह भी पूछते हैं कि न जाने उनको किसने यहां भेज दिया।

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खैर, विनय कटियार का राजनीतिक पतन या उनका वर्तमान एकाकीपन अचानक नहीं आया है। यह उनके चरित्र की एक ऐसी विशेषता है जो उन्हें एक जन नेता से अलग एक असहज व्यक्ति के रूप में स्थापित करती है। कटियार की सबसे बड़ी ताकत ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई, वह यह भूल जाते हैं कि वे किस मंच पर खड़े हैं और निशाना किस पर साध रहे हैं। राजनीति में अक्सर चुप्पी और रणनीति का महत्व होता है, लेकिन कटियार उस श्रेणी के नेता रहे हैं जो सत्य और कड़वाहट को एक ही तराजू में तौलते हैं। उन्होंने न केवल विपक्ष को अपने तीखे बयानों का निशाना बनाया, बल्कि अपनी ही पार्टी भाजपा और वैचारिक संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रति भी वही आक्रामकता दिखाई, जो एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के लिए होनी चाहिए।

इसी के चलते राम मंदिर निर्माण के दौरान और उसके बाद, कटियार के बयानों ने पार्टी नेतृत्व को कई बार असहज किया। उन्होंने मंदिर निर्माण की प्रक्रिया, न्यास के निर्णयों और चंदे में धांधली जैसे गंभीर आरोप सार्वजनिक मंचों से लगाए। जब कोई नेता अपनी ही पार्टी द्वारा संचालित किसी पुनीत कार्य पर भ्रष्टाचार की उंगली उठाता है, तो उसे पार्टी के भीतर गद्दार या बौखलाया हुआ मान लिया जाता है। कटियार के साथ भी यही हुआ। उन्होंने चंदा चोरी जैसे गंभीर मुद्दे उठाए, लेकिन उनके आरोपों को कभी आधिकारिक तवज्जो नहीं दी गई। उन्हें न केवल अनसुना किया गया, बल्कि उन्हें मुख्यधारा की राजनीति से भी धीरे-धीरे काट दिया गया।

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इसके साथ-साथ कटियार की अनदेखी के पीछे एक गहरा राजनीतिक मनोविज्ञान भी काम कर रहा है। भाजपा जैसे अनुशासित संगठन में, यदि कोई वरिष्ठ नेता, जिसने आंदोलन में अपना सब कुछ दिया हो, वह भी यदि संगठन के भीतर आंतरिक लोकतंत्र या शुद्धता की बात करता है, तो उसे तुरंत किनारे कर दिया जाता है। कटियार ने अपनी बातों को सबूतों के साथ पेश करने का दावा किया, लेकिन क्या व्यवस्था ने कभी उन सबूतों को देखने की जहमत उठाई? संभवतः नहीं। उन्हें अनदेखा करना इसलिए आसान था क्योंकि वे अब उस मैनेजेबल राजनीति का हिस्सा नहीं थे, जिसकी आज के दौर में आवश्यकता है। वे एक ऐसे पुराने स्कूल के नेता हैं, जो आज की कॉर्पाेरेट राजनीति और सॉफ्ट हिंदुत्व के दौर में फिट नहीं बैठते। भाजपा का नेतृत्व यह भली-भांति जानता है कि राम मंदिर आंदोलन का श्रेय उन्हें मिल चुका है, और अब उस आंदोलन के कट्टरपंथी चेहरों की उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी कि विकास और सुशासन के ब्रांड एंबेसडर्स की है।

बजरंगी नेता विनय कटियार के प्रति इस उपेक्षा ने न केवल उन्हें व्यक्तिगत रूप से तोड़ा है, बल्कि यह एक खतरनाक संदेश भी देता है कि पार्टी में अब इतिहास और संघर्ष की तुलना में उपयोगिता अधिक महत्वपूर्ण है। कटियार आज भी अपने आरोपों पर कायम हैं कि चंदा चोरी हुई है। यदि उनके आरोपों को गंभीरता से लिया गया होता, तो संभवतः आज संघ और भाजपा पर जो नैतिक प्रश्न उठ रहे हैं, उनसे बचा जा सकता था। तेजतर्रार विनय कटियार आज भी मंदिर न्यास में हुई गड़बड़ियों के सबूतों की बात करते हैं, लेकिन कोई उनसे पूछने को तैयार नहीं है। यह चुप्पी डराने वाली है। यह साबित करती है कि राजनीति में सत्य की तुलना में छवि का महत्व कहीं अधिक है। यदि कटियार के आरोपों की जांच होती, तो या तो वे बेदाग साबित होते या फिर वह भ्रष्टाचार उजागर होता जिसे दबाना सत्ता के लिए जरूरी था। राम मंदिर आंदोलन की जिस अग्नि परीक्षा में विनय कटियार ने अपना यौवन झोंका था, आज उसी मंदिर के भव्य प्रांगण में उनकी अनुपस्थिति या उपेक्षा एक टीस की तरह महसूस होती है। कटियार का एकाकीपन केवल एक व्यक्ति का सत्ता से विमुख होना नहीं है, बल्कि यह उस युग की समाप्ति का संकेत है, जिसमें वैचारिक कट्टरता और निडर मुखरता का बोलबाला था।

हाल यह है कि उनकी इस अवांछित ईमानदारी ने उन्हें अपने ही घर में अजनबी बना दिया। जब उन्होंने चंदा चोरी जैसे गंभीर और संवेदनशील विषयों पर सवाल उठाए, तो उन्होंने शायद यह नहीं सोचा था कि वे केवल एक वित्तीय धांधली पर उंगली नहीं उठा रहे, बल्कि वे उस पवित्रता के आवरण को भी नोच रहे हैं जिस पर आज की पूरी सत्ता व्यवस्था टिकी हुई है। उनके द्वारा लगाए गए आरोपों को कभी तवज्जो न मिलना इस बात का प्रमाण है कि सत्ता के गलियारों में सत्य की सुनवाई तभी होती है जब वह सुविधाजनक हो।

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बहरहाल, विनय कटियार का यह अकेलापन उस पीढ़ी के लिए एक चेतावनी है, जो मानती है कि संगठन के लिए किया गया त्याग उन्हें आजीवन सम्मान दिलाएगा। आज स्थिति यह है कि कटियार के पास मंदिर न्यास में हुई तथाकथित गड़बड़ियों के क्या सबूत हैं, इसे जानने की जिज्ञासा किसी को नहीं है। यह उदासीनता किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। जब एक आंदोलन का नायक ही व्यवस्था के भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए और व्यवस्था उसे सुनने के बजाय खामोश कर दे, तो यह समझ लेना चाहिए कि वहां विचार मर चुके हैं और केवल प्रतीक बचे हैं। कटियार आज भी अपनी बात पर अड़े हैं, वे चंदा चोरी को एक कलंक मानते हैं, लेकिन उनकी यह जिद उन्हें पार्टी में बागी के रूप में स्थापित कर गई है।

लब्बोलुआब यह है कि विनय कटियार का राजनीतिक अलगाव इस बात की दास्तां है कि कैसे संगठन अपनी जड़ों को भूलकर नई शाखाओं को सजाने में लग जाता है। कटियार की कमजोरी जिसे आज बताया जा रहा है, वह असल में उनकी वैचारिक ईमानदारी का अतिरेक था, जिसे राजनीति ने एक बोझ समझकर उतार फेंका। उनके पास क्या सबूत थे और क्या वाकई चंदा चोरी हुई थी, यह इतिहास के पन्नों में कहीं खो जाएगा, लेकिन इस बात का मलाल हमेशा रहेगा कि एक ऐसे व्यक्ति के साथ, जिसने अपना सर्वस्व दांव पर लगाया था, अंत में ऐसा व्यवहार किया गया जो एक राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए सबसे बड़ा दंड है।

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