पुलिसिया सत्ता बनाम कानून का राज

Bharat Bhushan Tiwari
अजय कुमार                             
अजय कुमार

बिहार के भोजपुर की वह घटना, जिसमें भरत भूषण तिवारी की पुलिस मुठभेड़ में जान चली गई, आज एक बार फिर से समूचे देश में उस सवाल को जिंदा कर गई है जो बरसों से हमारी न्याय व्यवस्था की बुनियाद को हिला रहा है। जब किसी आरोपी के कथित आत्मसमर्पण के बाद भी उसकी लाश ही सामने आती है, तो यह केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं होती, बल्कि यह कानून के शासन यानी ‘रूल ऑफ लॉ’ के ताबूत में ठोंकी गई एक और कील होती है।

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सोशल मीडिया से लेकर अदालतों की देहरी तक, इस घटना ने जिस तरह के सवाल खड़े किए हैं, वे महज किसी एक मामले तक सीमित नहीं हैं। यह घटना बताती है कि कैसे हमारा पुलिस तंत्र धीरे-धीरे साख खो रहा है और कैसे आम आदमी के जेहन में यह डर घर कर गया है कि पुलिस के पास जाने का मतलब अपनी मुसीबत को दोगुना करना है।

आज स्थिति यह है कि एक सामान्य नागरिक भी किसी अपराध का शिकार होने पर अकेले थाने जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। उसे डर है कि वहां जाकर उसे न्याय मिलने की जगह अपमान मिलेगा। यह ‘सामंती और औपनिवेशिक’ मानसिकता ही है जिसके कारण एक जिम्मेदार नागरिक भी पुलिस के सामने नतमस्तक होने को मजबूर है। हम सबने अपनी जिंदगी में कभी न कभी यह अनुभव किया होगा कि कैसे पुलिसकर्मी मामूली सी बातों पर आम नागरिकों के साथ भाषाई मर्यादाएं तोड़ देते हैं। जब पुलिस का व्यवहार ‘जनसेवक’ के बजाय ‘दमनकारी’ हो जाता है, तो स्वाभाविक है कि लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होती हैं। एनकाउंटर जैसी घटनाएं, जिन्हें अक्सर समाज का एक तबका तात्कालिक न्याय समझकर तालियां पीट देता है, दरअसल न्यायपालिका के अस्तित्व को ही खारिज कर देती हैं।

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कानून के मुताबिक पुलिस का काम अपराध की जांच करना और साक्ष्यों को अदालत के सामने पेश करना है, न कि खुद जज और जल्लाद बन जाना। जब पुलिस वाला ही किसी को अपराधी घोषित करके मौके पर ही फैसला सुनाने लगे, तो वहां संविधान की भूमिका समाप्त हो जाती है। आरोपी को अपना पक्ष रखने का मौका न मिलना, वकील न होना और सीधे जीवन-मृत्यु का फैसला कर दिया जाना यह राज्य द्वारा प्रायोजित आतंकवाद का एक क्रूर चेहरा है।

ऐसे मामलों में न्यायपालिका का स्वतः संज्ञान लेना अनिवार्य है, लेकिन अक्सर देखने में आता है कि कानून की प्रक्रिया इस तरह के मामलों में बेहद सुस्त पड़ जाती है। यह अविश्वास की वह खाई है जो पुलिस और जनता के बीच दिन-प्रतिदिन चौड़ी होती जा रही है। ऐतिहासिक रूप से अगर हम देखें, तो हमारा पुलिस तंत्र आज भी 1861 के उस पुलिस एक्ट के साए में जी रहा है, जिसे अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति के बाद भारतीयों को दबाने के लिए बनाया था। सवा सौ साल से अधिक का वक्त गुजर जाने के बावजूद, हमने अपने पुलिस बल को एक ‘औपनिवेशिक नियंत्रण’ के उपकरण से बदलकर ‘लोकतांत्रिक सेवा’ के ढांचे में ढालने की कोशिश तक नहीं की। आज का अपराध और उसकी प्रकृति पूरी तरह बदल चुकी है, लेकिन हमारी पुलिसिंग का तरीका वही पुराना है। सुधार की अनगिनत रिपोर्टें धूल फांक रही हैं, और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह व्यवस्था एक ऐसी जड़ता में फंसी है, जो न तो जनता का विश्वास जीत पा रही है और न ही कानून का सही अर्थों में पालन करवा पा रही है।

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ऐसे में क्या हमें अपने तंत्र को पूरी तरह बदलने की जरूरत नहीं है? समाजशास्त्री एल्विन टोफ्लर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘फ्यूचर शॉक’ में ‘एडहोक्रेसी’ की वकालत की थी। यह एक ऐसा तंत्र है जो नौकरशाही की तरह भारी-भरकम और जड़ नहीं होता, बल्कि लचीला, परियोजना-केंद्रित और तात्कालिक होता है। इसमें शक्ति का विकेंद्रीकरण होता है और नवाचार के लिए जगह होती है।

आज जब हम एक आधुनिक और आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी भारत की बात करते हैं, तो क्या यह जरूरी नहीं कि हमारा प्रशासन और पुलिसिंग का मॉडल भी वैसा ही आधुनिक, पारदर्शी और जवाबदेह हो? नौकरशाही के बोझ तले दबी पुलिस के बजाय, अगर हम एक ऐसी संरचना की ओर बढ़ें जो तकनीक और विशेषज्ञता पर आधारित हो, तो शायद हम पुलिस के प्रति उस अविश्वास को कम कर सकें जो आज हर आम नागरिक के दिल में है। लोकतंत्र का असली आधार जनता का भरोसा होता है। जब जनता को यह लगने लगे कि संस्थाएं उसकी रक्षा के बजाय उसे प्रताड़ित करने और मनमानी करने में लगी हैं, तो वह तंत्र अंदर से खोखला हो जाता है।

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भरत भूषण तिवारी प्रकरण मात्र एक समाचार नहीं है, यह एक चेतावनी है। यह बताता है कि अगर पुलिस का अमानवीय चरित्र नहीं बदला गया, तो एनकाउंटर का यह ‘अराजक चक्र’ समाज की पूरी नैतिकता को निगल जाएगा। भविष्य के लिए अब यह एक अनिवार्य विमर्श है कि क्या हम पुलिस को केवल एक ‘कोर्सिव मशीन’ (दमनकारी मशीन) के रूप में देखना चाहते हैं, या फिर उसे एक ऐसी संस्था के रूप में विकसित करना चाहते हैं जो लोकतंत्र के चौथे खंभे न्यायपालिका की सहयोगी बनकर काम करे। बदलाव का वक्त आ गया है, क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की साख उसके आखिरी आदमी को मिलने वाले न्याय से मापी जाती है, न कि उसकी पुलिस के ‘एनकाउंटर’ के आंकड़ों से।

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