- जीने की नई जद्दोजहद आगे बढऩे की नई जिद
रंजन कुमार सिंह
झारखंड। ‘डोर-टू-डोर सामान पहुंचाने वाले गिग श्रमिकों के लिए सूबे में बड़ी खुशखबरी है। उनके विधेयक को राज्यपाल ने मंजूरी दे दी। विधेयक के अनुसार गिग वर्कर्स को अब न्यूनतम पारिश्रमिक और PF मिलेगा। यदि किसी संस्था ने इस कानून का उल्लंघन किया तो एग्रीगेटर को 10 लाख तक जुर्माना देना पड़ सकता है। रात के 11.40 बजे थे। घर से करीब 1600 किमी दूर मुम्बई के एक होटल में ठहरना पड़ा। नामी-गिरामी होटल हो तो नियम-कायदे भी ज्यादा होते हैं। वहीं हुआ। खाने को कुछ नहीं मिलेगा, हां दूध, ऑमलेट और चाय-कुकीज मिल जाएगी। दिन भर की भागम-भाग के बाद दो निवाला भोजन न मिले तो कैसे काम चलेगा? इसी उहापोह में था, तभी मोबाइल स्क्रीन पर झारखंड सरकार की एक खबर नुमायां हुई। उसे देखकर मैं अनायास मुस्कुरा उठा। वो खबर आज मेरे काम की थी। मेरे जेहन में एकाएक कौंधा कि स्वीगी या जोमैटो से खाना मंगा लिया जाए। मैंने खाना मंगाया, खाया और ये जानने के लिए सरकार का निर्णय जमीनी है या केवल मीडिया के कहकहे। मैंने डिलीवरी ब्वॉय से एक सवाल किया। उसने दो टूक जवाब दिया-‘साहब, हम ठीक रहते हैं तो सब ठीक, घर में, मुझे या किसी को कुछ हो जाए तो परेशानियों का पहाड़। ज्यादा पैसे जमा हो नहीं पाते। जो होते हैं, वो ज्यादा दिन टिक नहीं पाते। तब समझ में बात आई कि राजस्थान और झारखंड सरकार ने इन नए पेशेवरों के लिए कितना सटीक कदम उठाई है।
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बदलते दौर में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म सर्विस ने भाग-दौड़ भरी जिंदगी में बड़ी राहत दी है। मोबाइल पर एक क्लिक करते ही चंद मिनटों में दरवाजे पर दवाइयां, खाने-पीने के सामान और तमाम जरूरी चीजें पहुंच जाती हैं। लेकिन यह किसी ने समझने की कोशिश नहीं की कि जीवन को आसान बनाने वाले ये श्रमिक कितने परेशानियों से जूझते हैं। इनके दर्द को झारखंड सरकार ने महसूस किया। उनके हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने मानसून सत्र में झारखंड प्लेटफॉर्म आधारित गिग श्रमिक (निबंधन और कल्याण) विधेयक, 2025 को विधानसभा में पारित किया, जिसे सूबे के राज्यपाल संतोष गंगवार ने मंजूरी दे दी। राजस्थान और झारखंड वर्तमान में गिग श्रमिक विधेयक को पारित कर लागू करने वाले प्रमुख राज्य हैं, जो इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा प्रदान कर रहे हैं।

गिग वर्कर्स वे होते हैं, जो पारम्परिक (स्थाई) नौकरी के बजाय, अस्थाई, लचीले या फ्रीलांस काम करते हैं। वो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के लिए कार्य करते हैं और वहीं से अपनी मजूरी पाते हैं। जैसे आपने उबर बुक किया तो आपके किराए का कुछ हिस्सा काटकर उबर इनके खाते में भेज देता है। ठीक यही नियम ओला, स्विगी, जोमैटो, फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसे बड़े ऑनलाइन ठेकेदार अपनाते हैं। इनका कोई मासिक वेतन नहीं होता। ये स्वतंत्र ठेकेदार होते हैं, जिनके पास कम्पनी के साथ कोई अनुबंध नहीं होता। मन आया काम पर गए, मन नहीं हुआ तो छुट्टी। बिल्कुल अपनी मर्जी के मालिक और बेलौस। लेकिन इनकी परेशानियों का अम्बार बड़ा है। तबीयत खराब हुई तो कमाई बंद। कृषि कार्य में जुटे तो आमदनी शून्य। घर में कोई परेशानी आई तो काम-धंधा खत्म और कमाई जीरो। लेकिन ये अपनी मजऱ्ी से काम चुनते हैं। कोई सरकार इन्हें नियमित कर्मचारियों की तरह सामाजिक सुरक्षा नहीं देती। लेकिन राजस्थान सरकार की तर्ज पर झारखंड सरकार ने भी इनकी परेशानी को समझा और एक नया कानून बना दिया। अब कार्य के लिए खर्च किए गये समय और तय की गई दूरी के आधार पर न्यूनतम पारिश्रमिक का निर्धारण होगा। सामाजिक सुरक्षा के लिए समय-समय पर योजनाएं तैयार की जाएंगी। कल्याण अंशदान की लागत को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से उपभोक्ता या गिग वर्कर्स पर नहीं डालने दिया जाएगा। सभी एग्रीगेटर्स का पंजीकरण अनिवार्य होगा। एग्रीगेटर द्वारा गिग श्रमिकों को शामिल करने वाले परिचालनों से राज्य में अर्जित वार्षिक टर्न ओवर का दो प्रतिशत से अधिक या एक प्रतिशत तक कल्याण अंशदान लिया जाएगा। आंकड़ों की मानें तो भारत में अगले पांच वर्षों में गि$ग वर्कर्स की संख्या 2.35 करोड़ हो जाएगी।
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नीति आयोग के अनुसार भारत में इनकी संख्या 2029-30 तक 23.5 मिलियन (2.35 करोड़) तक पहुंचने का अनुमान है। अकेले झारखंड में इन वर्कर्स की संख्या 50 हजार से अधिक है। इनके लिए सामाजिक सुरक्षा जैसे मातृत्व लाभ, पीएफ आदि बड़ी चिंता है। इस पर भारत सरकार और नीति आयोग काम कर रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत में गिग वर्कर्स की संख्या तेजी से बढ़ेगी, इसलिए उनके सामाजिक सुरक्षा और शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करना जरूरी है।

गिग कल्याण बोर्ड का होगा गठन
अब गिग श्रमिकों के लिए कल्याण बोर्ड का गठन का रास्ता साफ हो गया है। इस विधेयक के लागू होने से नियम का उल्लंघन करने वाले एग्रीगेटर को 10 लाख तक का जुर्माना देना पड़ सकता है। बोर्ड का मुख्यालय रांची में होगा। श्रम विभाग के मंत्री इसके पदेन अध्यक्ष होंगे। इसमें विभागीय सचिव के अलावा पांच अन्य सदस्य होंगे। बोर्ड के सदस्यों का कार्यकाल तीन साल का होगा। बोर्ड के जरिए गिग श्रमिकों का पंजीकरण सुनिश्चित होगा। सर्विस देने वाली कंपनियां या एग्रीगेटर्स का भी पंजीकरण होगा।
विधेयक लागू करने में राजस्थान आगे
मुख्य रूप से राजस्थान और हाल ही में झारखंड ने गिग श्रमिक विधेयक पारित कर लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है, जहाँ राजस्थान ने 2023 में अपना कानून लागू किया और झारखंड ने दिसंबर 2025 में राज्यपाल की मंजूरी के बाद इसे लागू करने का मार्ग प्रशस्त किया है, इसके अलावा, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में भी ऐसे विधेयक हैं, लेकिन राजस्थान और झारखंड वर्तमान में पूर्ण रूप से लागू करने वाले प्रमुख राज्य हैं जो गिग श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा और कल्याण प्रदान करते हैं।संक्षेप में, गिग वर्कर्स डिजिटल युग का एक बढ़ता हुआ वर्क-फोर्स है जो पारंपरिक नौकरी के ढांचे से बाहर, अपनी शर्तों पर काम करता है।
मुख्य विशेषताएं
प्लेटफॉर्म कंपनियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे मुनाफे के साथ-साथ अपने वर्कर्स के कल्याण पर ध्यान दें। एल्गोरिदम आधारित रेटिंग और इंसेंटिव सिस्टम कई बार गिग वर्कर्स पर अनावश्यक दबाव डालता है, जिससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।
लचीलापन: घंटों और काम के चयन में स्वतंत्रता।
अस्थायी: अल्पकालिक प्रोजेक्ट या कार्य-आधारित काम (गिग)।
प्लेटफॉर्म-आधारित: अक्सर डिजिटल ऐप्स या वेबसाइट्स के ज़रिए काम मिलता है।
नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के बजाय स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। राइड-शेयर ड्राइवर, डिलीवरी एजेंट, फ्रीलांस ग्राफिक डिजाइनर, कंसल्टेंट, सॉफ्टवेयर डेवलपर।
गिग के फायदे व चुनौतियां
फायदे: काम करने की आज़ादी, अतिरिक्त आय का स्रोत, वर्क-लाइफ बैलेंस का मौका।
चुनौतियां: आय की अनिश्चितता, नौकरी की सुरक्षा का अभाव, स्वास्थ्य लाभ और अन्य सामाजिक सुरक्षा का न मिलना, और ज़्यादा घंटों तक काम करने का दबाव।
सुविधा, संघर्ष और सरकार की जिम्मेदारी
डिजिटल युग में काम की परिभाषा तेज़ी से बदल रही है। स्थायी नौकरियों की जगह अब गिग इकॉनमी लेती जा रही है, जहां लाखों युवा फूड डिलीवरी, कैब सर्विस, ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स, कंटेंट क्रिएशन और फ्रीलांसिंग जैसे कार्यों से जुड़ रहे हैं। भारत में गिग वर्कर्स का वर्कफोर्स लगातार बढ़ रहा है और यह आने वाले वर्षों में रोजगार का बड़ा आधार बनने वाला है। एक ओर गिग वर्क मॉडल युवाओं को लचीलापन, तेज़ कमाई और कम प्रवेश बाधाएं देता है, वहीं दूसरी ओर यह व्यवस्था कई गंभीर सवाल भी खड़े करती है। गिग वर्कर्स न तो पारंपरिक कर्मचारी माने जाते हैं और न ही उन्हें सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिल पाता है। न तय वेतन, न पेंशन, न हेल्थ इंश्योरेंस और न ही जॉब सिक्योरिटी-यही गिग वर्क की सबसे बड़ी सच्चाई है।

कोविड-19 महामारी के दौरान गिग वर्कर्स ने फ्रंटलाइन वॉरियर्स की तरह काम किया, लेकिन संकट के समय सबसे ज्यादा असुरक्षा भी इन्हीं को झेलनी पड़ी। मांग घटते ही आय खत्म हो गई और किसी भी तरह का सुरक्षा कवच उनके पास नहीं था। यह साफ करता है कि गिग इकॉनमी की चमक के पीछे एक बड़ा सामाजिक जोखिम छिपा है। सरकार ने श्रम संहिताओं में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को मान्यता देने की पहल जरूर की है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर अब भी सीमित है। सवाल यह है कि क्या केवल पहचान देना काफी है, या फिर इन्हें न्यूनतम वेतन, बीमा, दुर्घटना कवर और पेंशन जैसी बुनियादी सुविधाएं भी मिलनी चाहिए?
आज जरूरत है एक ऐसी नीति की, जो गिग वर्कर्स को स्वतंत्रता के साथ सुरक्षा भी दे सके। अगर गिग इकॉनमी को भारत की आर्थिक प्रगति का इंजन बनाना है, तो इसके पहियों को चलाने वाले श्रमिकों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। गिग वर्कर्स केवल अस्थायी संसाधन नहीं, बल्कि भविष्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं—और उनकी सुरक्षा, सम्मान और स्थिरता सुनिश्चित करना समय की मांग है।

राजस्थान: प्लेटफॉर्म आधारित गिग वर्कर्स अधिनियम, 2023। यह अधिनियम जुलाई 2023 में पारित हुआ और गिग वर्कर्स के लिए पंजीकरण, कल्याण बोर्ड के गठन और एक विशेष ‘वेलफेयर सेस’ (कल्याण उपकर) के माध्यम से फंड जुटाने का प्रावधान करता है। यह लागू करने वाला पहला राज्य है।
झारखंड: गिग श्रमिक विधेयक, 2025 में राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह कानून लागू होने के लिए तैयार है, जिसके तहत गिग श्रमिकों के लिए कल्याण बोर्ड बनेगा और उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाएगी।
कर्नाटक: गिग वर्कर्स के लिए एक ड्राफ्ट बिल (2024) है, जिसमें बीमा जैसे लाभ शामिल हैं, लेकिन यह अभी राजस्थान या झारखंड की तरह पूरी तरह लागू नहीं हुआ है।
तेलंगाना: सूबे में भी एक ड्राफ्ट बिल 2025 में आया है।
बिहार: प्रदेश ने भी 2025 में अपना गिग श्रमिक अधिनियम पारित किया है।
