अखिलेश की तंज वाली भाषा से सपा को हो रहा है बड़ा नुकसान

akhilesh yadav 780x446 1
संजय सक्सेना

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को राजनीति कें आये करीब 14-15 वर्ष का समय बीता चुका है। 2012 में समाजवादी पार्टी की जीत के बाद तत्कालीन सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव ने अपनी जगह अपने बेटे अखिलेश को सीएम की कुर्सी पर बैठाकर अपनी राजनैतिक विरासत अखिलेश को सौंप दी थी। अखिलेश युवा और पढ़े लिखे थे। इसलिये उम्मीद की जाने लगी कि प्रदेश प्रगति के रास्ते पर आगे जायेगा,लेकिन ऐसा हुआ नहीं।अखिलेश भी हिन्दू मुस्लिम करने लगे।परिणाम यह हुआ की वह 2017 में सत्ता से बाहर हो गये। इसके बाद से अखिलेश लगातार अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं। राजनीतिक गंभीरता उनके पास से चली गई है। अब उनकी सियासत तंज कसने तक सीमित रह गई है। खासकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ऊपर अक्सर अखिलेश तंज कसते रहते हैं। इससे योगी की छवि तो नहीं प्रभावित होती है,लेकिन अखिलेश की बातों में हल्कापन सबको दिखाई देता है। यही वजह है जनता उनको बार-बार ठुकराता जा रही है। बहरहाल, अखिलेश की तंज वाली शैली काफी पुरानी और उनके लिये नुकसानदायक साबित हो रही है।वह अक्सर सीएम योगी से लेकर डिप्टी सीएम बृजेश पाठक और केशव प्रसाद मौर्य सहित कई नेताओं पर कसते रहते हैं।

समाजवादी पार्टी के युवा चेहरा अखिलेश यादव ने 2012 में जब मुख्यमंत्री का पद संभाला तो पूरे प्रदेश में नई उम्मीद जगी। मुलायम सिंह यादव ने बेटे को सत्ता सौंपी तो लगा कि पढ़े-लिखे और आधुनिक सोच वाले नेता प्रगति लाएंगे। लैपटॉप बांटना, सड़कें बनवाना जैसी योजनाओं ने शुरुआत में तारीफ बटोरी। लेकिन जल्द ही आलोचनाएं शुरू हो गईं। गुंडाराज के आरोप लगे और हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण ने उनकी छवि खराब की। 2017 में भाजपा की भारी जीत ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया। सत्ता से बाहर होने के बाद अखिलेश यादव ने आलोचना का सहारा लिया। योगी आदित्यनाथ पर तंज कसना उनकी रणनीति बन गया। कभी बुलडोजर पर चुटकी तो कभी विकास के दावों पर सवाल। इससे उनकी गंभीरता कम हुई और जनता ने उन्हें हल्का समझा। लोकसभा चुनावों में कुछ सफलता मिली लेकिन विधानसभा स्तर पर असफलता बरकरार रही। अखिलेश योगी पर सबसे ज्यादा निशाना साधते हैं। बुलडोजर कार्रवाई को वे गरीबों पर अत्याचार बताते हुए कहते हैं कि यह विकास नहीं तोड़फोड़ है। एक बार उन्होंने कहा था कि योगी तो मठों में रहते हैं, सड़कों पर नहीं दिखते। ऐसे तंजों से योगी की लोकप्रियता पर असर नहीं पड़ा बल्कि अखिलेश की फजीहत हुई। योगी ने जवाब में कहा कि तंज कसने से सत्ता नहीं मिलती, काम से मिलती है। ये तीर उल्टे पड़ रहे हैं।

ये भी पढ़ें

किसी एक देश के पास न होकर विभाजित हो चुका है शक्ति का केंद्रः डॉ. जयशंकर

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक को अखिलेश चपरासी कहकर तंज कस चुके हैं। विधानसभा में उन्होंने पाठक को निशाना बनाते हुए कहा कि वे मुख्यमंत्री के गुलाम बने घूमते हैं। पाठक की चिकित्सा उपलब्धियों पर सवाल उठाते हुए अखिलेश बोले कि वे डॉक्टर हैं या राजनीतिक डॉक्टर। ऐसे व्यक्तिगत हमलों ने अखिलेश को छोटा बनाया। पाठक ने जवाब दिया कि सपा वाले खुद की हार भूल चुके हैं। ये तंज विपक्ष की एकजुटता तोड़ रहे हैं।इसी तरह से उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या पर अखिलेश अक्सर चुटकी लेते हैं। चाय बेचने वाले पृष्ठभूमि को तंज का विषय बनाते हैं। एक रैली में बोले कि केशव चाय की दुकान से सीधे उपमुख्यमंत्री बन गए, लेकिन प्रदेश का विकास कहां हुआ। मौर्या ने पलटवार किया कि अखिलेश राजघराने के चाटुकार हैं। ऐसे व्यंग्य से पिछड़े वर्ग नाराज हो रहा है। अखिलेश की ये शैली वोट खो रही है।

ये भी पढ़ें

शरीर में कौन-कौन से विटामिन की कमी से होती है सुबह की कमजोरी?

 

अखिलेश ने भाजपा के अन्य नेताओं पर भी तंज कसे। स्वतंत्र देव सिंह को चमचा ठहराया तो सुरेश राणा पर जातिवादी बयानों का तंज। केंद्र की नीतियों पर मोदी सरकार को घेरते हुए वे कहते हैं कि यूपी सिर्फ चुनावी मैदान है। लेकिन ये सब बिखरे हमले हैं। गठबंधन के दौर में भी कांग्रेस नेताओं पर हल्के तंज कसे। इससे उनकी विश्वसनीयता घटी। अखिलेश की ये शैली सोशल मीडिया के दौर में वायरल तो होती है लेकिन गहरा असर नहीं डालती। युवा वोटर हंसते हैं लेकिन वोट नहीं देते। विश्लेषकों का मानना है कि तंज कसना आसान है लेकिन मुद्दों पर बहस चुनौतीपूर्ण। सपा के भीतर भी ये शैली पसंद नहीं आ रही। चाचा शिवपाल जैसे पुराने नेता असहज हैं।

ये भी पढ़ें 

2011 का रिकॉर्ड दोहराने का मौका, T20 वर्ल्ड कप 2026 में टीम इंडिया का विजेता बनना तय

 

बहरहाल, जनता अब अखिलेश के तंजों से ऊब चुकी है। 2022 विधानसभा चुनाव में सपा की हार ने साबित किया कि व्यंग्य से सत्ता नहीं लौटती। 2024 लोकसभा में कुछ सीटें मिलीं लेकिन प्रदेश स्तर पर कमजोरी बरकरार। ग्रामीण इलाकों में योगी की तुलना में अखिलेश हल्के लगते हैं। सर्वे बताते हैं कि युवा विकास चाहते हैं, तंज नहीं।सपा कार्यकर्ता निराश हैं। अखिलेश के तंजों से भाजपा मजबूत हो रही है। स्वयंवर सिंह जैसे नेता पार्टी छोड़ चुके। नई पीढ़ी वाले नेता मुद्दों पर फोकस चाहते हैं। तंजों ने सपा को हास्य का विषय बना दिया। गंभीर विपक्ष की कमी अब भाजपा के लिए फायदेमंद है। कुल मिलाकर अखिलेश को तंज छोड़ मुद्दों पर आना होगा। शिक्षा, रोजगार, किसान जैसे विषयों पर ठोस योजना दें। तंजों ने उनकी विरासत को कमजोर किया। अगर समय रहते सुधार न किया तो 2027 चुनाव में और झटका लगेगा। जनता गंभीर विपक्ष चाहती है।

Spread the love

Politics Uttar Pradesh

नेहा ने लांघी मर्यादा की लक्ष्मण रेखा, कार्रवाई अपेक्षित

लोकतांत्रिक विरोध में अपशब्दों की अनुमति नहीं अपशब्द सुन रहा प्रशासन क्यों रहा खामोश? मनोज कुमार त्रिपाठी Gorakhpur : ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन आईसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा द्वारा गत दिवस गोरखपुर में एक कार्यक्रम के दौरान मर्यादा की लक्ष्मण रेखा पार करते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री और गुरु गोरखनाथ मंदिर के महंत योगी […]

Spread the love
Read More
Agra
Uttar Pradesh

आगरा में पेट्रोल पंप पर भड़की आग, कर्मचारियों की सतर्कता से टला बड़ा हादसा

Agra: उत्तर प्रदेश के आगरा में मंगलवार को एक पेट्रोल पंप पर उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब टैंकर से पेट्रोल उतारने की तैयारी के दौरान अचानक आग लग गई। घटना प्रतापपुरा क्षेत्र स्थित HP पेट्रोल पंप की बताई जा रही है। पेट्रोल पंप घनी आबादी वाले इलाके में होने के कारण आग की खबर […]

Spread the love
Read More
Crime News Uttar Pradesh

नौतनवा बाईपास पर भीषण सड़क हादसा

काइगर से टकराकर पलटी अर्टिगा, छह घायल राहत की बात यह है कि हादसा बेहद भीषण होने के बावजूद सभी लोग सुरक्षित हैं और बड़ी अनहोनी टल गई है। घायलों को इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया। जहां सभी घायल खतरे से बाहर बताए जाते हैं। उमेश चन्द्र त्रिपाठी Maharajganj: जिले के नौतनवां कस्बे के […]

Spread the love
Read More